राष्ट्रीय मानवाधिकार संशोधन विधेयक पर मुहर

विपक्ष के हंगामे के कारण तीन बार स्थगित हुई राज्यसभा की कार्यवाही

नयी दिल्ली, 22 जुलाई (वार्ता)। राज्यसभा ने सोमवार की शाम राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग संशोधन विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया जिसमें उच्चतम न्यायालय के अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश के अलावा इस न्यायालय के अन्य सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति को भी अध्यक्ष बनाने और पहली बार किसी महिला को इसका सदस्य बनाने का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही इस विधेयक पर संसद की मुहर लग गयी। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है।
हंगामे और स्थगन के बाद करीब तीन घंटे तक चली बहस के बाद सदन ने इसे पारित कर दिया, लेकिन आम आदमी पार्टी ने इस बात के लिए बहिर्गमन किया कि इस विधेयक में दिल्ली मानवाधिकार आयोग की व्यवस्था नहीं की गयी है, बल्कि उसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में समाहित कर लिया गया है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ई करीम ने इस विधेयक को राज्य सभा की प्रवर समिति के पास भेजने के प्रस्ताव को सदन ने ध्वनिमत से नामंजूर कर दिया। माकपा के के रागेश ने भी अपने संसोधन को वापस ले लिया। गृह मंत्री अमित शाह ने सदस्यों की आशंकाओं का निराकरण करते हुए स्पष्ट किया कि आयोग के अध्यक्ष या सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें किसी भी सरकारी पद पर नियुक्त नहीं किया जाएगा। इस संशोधन विधेयक से अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल पांच वर्ष से घटाकर तीन साल या अधिकतम उम्र 70 वर्ष कर दिया गया है और उन्हें कार्यकाल के बाद पुन: नियुक्त किए जाने का प्रावधान है।
चर्चा का जवाब गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने दिया और बताया कि गत पांच वर्षों में मानवाधिकार के करीब चार लाख मामले दर्ज हुए और 97 प्रतिशत मामले निबटा दिए गये तथा आयोग की वर्ष 2017-18 की रिपोर्ट भी जल्द ही आने वाली है।
राज्यसभा की कार्यवाही तीन बजे तक स्थगित3 कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और वाम दलों के सदस्यों ने कर्नाटक के घटनाक्रम, सोनभद्र में हिंसा और मानवाधिकारों के मुद्दे पर आज राज्यसभा में जोरदार हंगामा किया जिससे सदन की कार्यवाही दो बार के स्थगन के बाद तीसरी बार तीन बजे तक स्थगित करनी पड़ी। सोमवार को जब दो बजे सदन की कार्यवाही पुन: शुरू हुई तो उप सभापति हरिवंश ने गृह राज्य मंत्री हरिवंश को मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) विधेयक 2019 पेश करने के लिए कहा। इस पर तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन ने नियम 95 के तहत व्यवस्था का प्रश्न उठाते हुए कहा कि यह विधेयक शुक्रवार शाम पांच बजकर पांच मिनट पर लोकसभा से आया और शनिवार तथा रविवार अवकाश होने के कारण सदस्यों को इसके लिए जरूरी दो दिन का समय नहीं मिल सका। वह अपना संशोधन भी नहीं पेश कर सके। अन्य सदस्यों के संशोधन भी सदन में वितरित नहीं किये गये। उप सभापति ने इसी बीच राय से विधेयक पेश करने को कहा और उन्होंने हंगामे के बीच ही मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) विधेयक 2019 सदन में चर्चा के लिए पेश कर दिया।