8500 पटवारियों को हड़ताल का अधिकार नहीं


पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह व उच्च् शिक्षा, खेल एवं कल्याण मंत्री जीतू पटवारी ने गलत क्या कहा ?

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास

भोपाल, 5 अक्टूबर। अविभाजित मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्य सचिव आर.सी. नरोन्हा जब बस्तर जिले के कलेक्टर थे,तब मुझे एक वाक्या याद आता है कि भारी बरसात में कलेक्टर था,घने जंगलों के भीतर से आधी रात को जगदलपुर लौट रहे थे। तब रास्ते में एक बूढ़ी औरत ने उनकी जीप को रोका।
कलेक्टर साहब ने गाड़ी रोकी और उस बूढ़ी औरत से पूछा कहो क्या बात है? उस औरत ने अपनी भाषा में कहा कि साहब मेरा गांव बहुत दूर है, मुझे मेरे गांव तक छोड़ दो। कलेक्टर साहब को दया आई और उस बूढ़ी औरत को जीप में बैठाया, जब उसका गांव नजदीक आया तो उसे उतार दिया। बूढ़ी औरत, कलेक्टर साहब की दया से इतनी खुश हुई कि जीप से उतरकर उसने कहा साहब आपको बहुत-बहुत आर्शीवाद। मेरी भगवान से प्रार्थना है कि भगवान आपको पटवारी बना दे। उल्लेखनीय है कि आर.सी.नरोन्हा के कलेक्टरी के दौरान कलेक्टरों के पास जीप हुआ करती थी। तब कलेक्टर अपने जिले के उस छोर तक दौरा करते थे,जहां पर पटवारी के अलावा कोई और नहीं जा पाता था। इस घटना का उल्लेख करना मैंने इसलिए उचित समझा कि पटवारी को गांव में तब भी और आज भी भगवान माना जाता है। मतलब आपकी जमीन जायदाद पटवारी चाहे तो किसी के भी नाम कर दे। और आप सूप्रीम कोर्ट तक लड़ते रहो, यह होती है पटवारी की ताकत। चार दशकों की पत्रकारिता के अनुभव को साझा करते हुए मैंने मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपनी संपादकीय के माध्यम से 10 बार अगाह किया कि पटवारी, आरआई, नायब तहसीलदार और तहसीलदार यह नौकरशाही का दूसरा स्वरूप है। जिसमें लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार की शिकायत आज़ादी के बाद से आज तक कायम है,इसे कोई मिटा नहीं सका। मैं बधाई देता हूं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, मंत्री जीतू पटवारी दोनों को कम से कम इन्होंने साहस तो किया कि पटवारी, आरआई, नायब तहसीलदार और तहसीलदार का समूह भ्रष्टाचार में लिप्त है। इसे दूर करना जरूरी है। आज राजस्व मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के बंगले में पटवारियों का धरना-प्रदर्शन पूरी तरह असंवैधानिक था। क्योंकि 8500 पटवारियों को हड़ताल और धरना करने का ह$क ही नहीं है।
रहा सवाल अनुभव और दीर्घकालीक सेवारत पटवारियों का , तो उनको तो अपने गिरेवान में ही झांकना चाहिए कि जब छापे पड़ते हैं तो पटवारियों के यहां लाखों-करोड़ों क्यों मिलते हैं? भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस पटवारी समूह के खिलाफ ठोस कदम उठाया होता तो सरकार नहीं जाती! लेकिन अब मुख्यमंत्री कमलनाथ को तय करना होगा कि सरकार की छवि बनाने वाला यह समूह,सरकार की छवि बिगाडऩे के लिए कितना जिम्मेदार है? यदि भ्रष्टाचार को खत्म करना है तो मुख्यमंत्री जी मेरा आपसे अनुरोध है कड़े प्रावधान कर दीजिए, वरना किसी दिन आपको भी कोई बूढ़ी महिला या गरीब किसान यह आशीर्वाद देने लगेगा कि कमलनाथ जी आपने हमारा नामांतरण करा दिया है, ऋण पुस्तिका दिलवा दी है और कर्ज माफ कर दिया है। तो भगवान आपको पटवारी बना दें।
मेरी यह संपादकीय पटवारी, आरआई, नायब तहसीलदार या तहसीलदार के खिलाफ नहीं है। लेकिन उनकी कार्यशौली और व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर उठी बड़ी-बड़ी उंगलियां जिसमें आपके पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, मंत्री जीतू पटवारी शामिल हैं। तो उस पर गंभीरता से विचार कर लीजिए। मैं तो कहता हूं कि पटवारी बिना पैसे लिए काम नहीं करते। आरआई, नायब तहसीलदार और तहसीलदार पैसे के बिना फाईलों में हाथ नहीं लगाते। जैसा कि दिग्विजय सिंह ने कहा है तो फिर भ्रष्टाचार की बजाए नियमों में ही प्रावधान कर दिया जाए कि हर काम के इतने पैसे लगेंगे, ताकि हर आम आदमी मानसिक रूप से तैयार रहे। और भ्रष्टाचार भी खत्म हो जाए लेकिन ऐसा करना संभव नहीं है। लेकिन जो संभव है, वह यह है कि 70 प्रतिशत आबादी जो पटवारी, आरआई, नायब तहसीलदार और तहसीलदार के चक्कर लगा-लगाकर थक जाती है उसके लिए 24 घंटे से ज्यादा किसी भी नामांतरण या प्रमाण-पत्र, ऋण पुस्तीका या सीमांकन के लिए समय नहीं लगना चाहिए, ऐसा कानून बना दिया जाए। एक कदम आगे बढ़कर यह लिखने में भी संकोच नहीं है कि निचले स्तर की नौकरशाही को यदि आपने भ्रष्टाचार से मुक्त कर दिया तो आपकी सरकार को 10 साल तक कोई छू नहीं सकता। यह बात आज लिखने में भी संकोच नहीं है कि यदि शिवराज सिंह चौहान इस समूह को भ्रष्टाचार मुक्त कर देते तो शायद वह आज गली-गली यह कहते नहीं घूमते कि मेरे अपने लुट रहे हैं। संपादकीय का लब्बेलुआब यह है कि अमीर लोगों के द्वारा उपहार या आर्थिक सहयोग लेना कभी भ्रष्टाचार और बदनामी का कारण नहीं बनता। लेकिन जब छोटे-छोटे लोग, गरीब आदमी,बेरोजगार नौजवान तथा आम आदमी पटवारी से लेकर तहसीलदार तक महीनों चक्कर लगाता है। और कई बार तो ऐसा होता है कि नामांतरण या सीमांकन नहीं होने की स्थिति में भ्रष्टाचार के कारण लोग दहशत में आते हैं, स्वर्ग सिधार जाते हैंं, और उनके बच्चे बेचारे चक्कर लगाते रहते हैं। फिर भी पटवारी भगवान बना रहता है। इसलिए अब जरूरत है, या तो ट्रेन पटरी से पूरी तरह उतर जाए या फिर पटरी इतनी मजबूत हो जाए कि कभी पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी को पटवारियों को भ्रष्ट कहने का मौका ही नहीं मिले। रहा सवाल जीतू पटवारी मंत्री के रूप में माफी मांगे इस मांग को लेकर सरकार झुके तो शर्त यह होना चाहिए कि पटवारी से लेकर तहसीलदार तक शपथ पत्र पर सरकार को वचन दें कि आज से वे एक भी रूपए का भ्रष्टाचार नहीं करेंगे। और किसी से काम के लिए पैसे नहीं मांगेंगे। स्वच्छता में यदि इंदौर नंबर-1 है,और भोपाल नंबर-2 है तो पटवारी से लेकर तहसीलदार तक के अमले को भगवान होने का भ्रम मिटाने का काम कमलनाथ सरकार को करना होगा। तो मध्यप्रदेश में इसमें भी नंबर-1 आ जाएगा। वरना प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी ने जो कहा है वो करके दिखाइए।

विशेष रिपोर्ट के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।