अब यह मत समझिये कि देश राम भरोसे हो गया है, राम को भी काम की सरकार चाहिए..


विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास

भारत में अयोध्या और अयोध्या में भगवान राम को अपना अधिकार क्षेत्र स्थापित करने में पूरे 200 बरस लग गए और अन्त: आज सर्वोच्य न्यायालय के एतिहासिक फैसले ने रामलला को एक इंसान मानते हुए उनका मालीकाना हक लौटाने बाला एतिहासिक फैसला सुना दिया। भारतीय जनता पार्टी इस फैसले से स्वाभाविक है गर्व की अनुभूति से उछल रही है लेकिन उनके उछलने में मस्जिद बनाने के लिए मुसलमानों को 5 एकड़ भूमि का अधिकार भी सर्वोच्च न्यायालय के एतिहासिक फैसले का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मतलब सर्वोच्च न्यायालय के पंच-परमेश्वरों का यह मानना कि हिन्दुस्तान का मुसलमान अपनी धार्मिक संवेदनाओं के लिए इस देश में कभी भी अधिकार विहिन नहीं होगा। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ना तो हिन्दुओं की जीत है और न मुसलमानों कि हार। लेकिन फैसले का सिंहावलोकन जब भी भारतीय जनता पार्टी करेगी और कांग्रेस पार्टी उस पर प्रतिक्रिया जाहिर करेगी तो दबी जुबान से ही सही दोनों दलों को तथा देश के सभी राजनैतिक दलों को यह मानना ही पड़ेगा कि हिन्दुस्तान में राम का नाम अटूट आस्था का नाम है जिसे आने वालो हजारो-लाखों वर्षों तक कोई मिटा नहीं पाएगा, लेकिन संपादक की इस कलम में एक दिलासा है कि क्या भारत वर्ष अब केवल राम के भरोसे ही रह जाएगा या फिर नेताओं का यह नारा बदल जाएगा। कि ‘कमस राम की खाते हैं मंदिर यही बनाएंगेÓ अब इस नारे पर सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्ण विराम लगा दिया है। अब तो मंदिर भी केन्द्र सरकार बनाएगी और मस्जिद की केन्द्र को ही बनाना पड़ेगी और तभी अयोध्या से राम-राज पूरे देश में फैलेगा। क्योंकि हमारी आपकी सबकी ओर विशेषकर सभी राष्ट्रीय नेाताअें की पहली आवश्यकता है। सामाजिक संतुलन और धार्मिक सद्भाव कायम रहे तथा साथ-साथ नफरत के माहौल का कहीं कोई स्थान नहीं रहे। इसलिए में आज लिखता हूँ कि मेरा देश और मेरा प्रदेश अब राम भरोसे हो गया है। ऐसा मत समझिये नरेन्द्र मोदी जी और कमलनाथ जी कि पुलवामा और राम मंदिर के इस बड़े फैसले के बाद सरकार को और अब कोई काम नहीं करना पड़ेगा और सरकार राम भरोसे चलेगी। सच तो यह है कि अस्मिता की लड़ाई अब खत्म हो गई है अब तो कमलनाथ की सरकार की तरह शुद्ध के लिए युद्ध पूरे देश में लागू होना चाहिए। सबसे ज्यादा चुनौति तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने है उनका तो वक्त अब शुरू होता है आज से उन्हें देश कि आर्थिक दुर्दशा का अंदाजा पूरा पूरा लग जाएगा तो उनके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे देश की आर्थिक स्थिति के चरमराते हुए चेहरे का शिकार इस देश के 28 करोड़ युवा बैरोजगार हो गए हैं। जिनको आधार बनाकर अब प्रधानमंत्री भी आज विदेशों में घूम-घूम कर कहते हैं कि भारत एक युवा देश बन गया है और इन युवाओं को राष्ट्रीयकृत बैंक केन्द्र सरकार की नीतियों के अनुरूप एक धेला भी देने की तैयार नहीं है। क्योंकि बैंकों में पैसा गायब है और केन्द्र सरकार नोटबंदी की वर्षगांठ मना रही है। ग्रामीण अर्थ व्यवस्था चौपट है। दाल, सब्जी, तेल, नमक, शक्कर ओर गरीब आदमी की हर आवश्यकता जो नगदी में चलती थी वो अब क्कड्ड4ह्लद्व की दुकान में चली गई है। घर में कोई बीमार पड़ जाए तो बेचारा सौ-सौ रुपए के लिए तरस जाता है।
जहाँ तक सवाल है किसानों का अब वो फसल कम उगाता है और कर्ज ज्यादा लेता है। हम दावे करते है आत्मनिर्भता की और चल रहे हैं लेकिन सच्चाई यह कि किसान मर रहे हैं क्योंकि विकास की और अग्रसर होने की मानसिकता समाप्त होती जा रही है। यही हाल उद्योगों का है बड़े उद्योगपति अमीरों की मेरिट लिस्ट बनाते हैं और छोटे-छोटे उद्योग अपनी जमीन जायदात निलामी में डाल देते हैं। देश में आपने आयुष्मान लाये तो बीमारियों से ज्यादा दवाइयों का कारोबार बढ़ गया है। पढ़े लिखे डॉक्टर-इंजीनियरों का विदेशों में पलायन हम कब रोक पाएंगे। राम मंदिर की सफलता एक इतिहास बन गया है इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन इतना जरूर समझ लिजिए कि राम को भी काम चाहिए
वर्ना… जय हिंद

विशेष संपादकीय के लेखक
इस समाचार पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।