इरफान खान का न होना

राष्ट्रीय हिन्दी मेल, भोपाल ब्यूरो

भावपूर्ण श्रद्धांजलि

राकेश अचल
आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन हकीकत है कि आज पूरी दोपहर सो नहीं पाया। सिने अभिनेता इरफ़ान खान के इंतकाल की खबर ने स्तब्ध कर दिया। कोरोनाकाल में दोपहर के भोजन के बाद गहरी नींद लेने की आदत पड़ गयी है लेकिन पेट भरा होने के बावजूद नींद नहीं आई हर करवट के साथ इरफ़ान की सूरत सामने खड़ी नजर आई। जब इरफ़ान खान ने आना नहीं छोड़ा तो मुझे ही बिस्तर छोडऩा पड़ा।
इरफान खान से सिर्फ एक मर्तबा मिलना हुआ वो भी डाकू पान सिंह फिल्म की शूटिंग के समय लेकिन उससे मिले हुए तो अरसा हो चुका है। तब मैंने पान सिंह की भाषा को लेकर कुछ ऐतराज किये थे। इरफ़ान को सबसे पहले छोटे परदे पर देखा था शायद वो मराठों पर केंद्रित कोई धारावाहिक था। एक दुबला-पतला लेकिन खा आने वाली आँखों वाला लड़का जिसकी आवाज में एक अजीब सी भर्राहट थी। लड़के के अभिनय से ज्यादा उसकी आवाज याद रह गयी। फिर चाणक्य धारावाहिक में उसका नाम सुनने में आया। अमूमन मैं फिल्में कम देखता हूँ किन्तु घर बैठे टीवी पर आने वाली फिल्में देखने में मुझे कोई ऐतराज नहीं रहा। टीवी पर ही मैंने इरफ़ान की अधिकांश फिल्में देखीं और हर फिल्म देखने के बाद मैं उसका मुरीद होता गया यहां तक कि जब उसने सिस्का एलईडी का विज्ञापन किया तो मैं उसे भी देख लेता था यनि इरफ़ान कहीं भी हो कैसी भी भूमिका में हो उसमें आपका ध्यान खींचने की क्षमता थी। बिना शक्ल-सूरत वाला ये अभिनेता इतनी जल्दी हम सबसे रुखसत हो जाएगा सोचा न था। इरफान खान की लगभग सभी फिल्में मैंने देखी हैं। कभी एक बार में तो कभी टुकड़ों में। सलाम बॉम्बे, कमला की मौत, चाणक्य, एक डॉक्टर की मौत, वादे-इरादे, प्रायवेट डिटेक्टीव्ह, बड़ा दिन सच ऐ लांग जर्नी, घात, दी वॉरियर, प्रथा, गुनाह ,काली सलवार, सिपारी, फुटपाथ, धुंध, दी वायपास, हासिल, मकबूल, चरस, आन, शैडो ऑफ टाइम, गरम चॉकलेट से लेकर अंग्रेजी मीडियम तक जाने कितनी फिल्मों में इरफान को काम करते देखा। पीकू में अमिताभ बच्चन के सामने खड़ा इरफ़ान हो या बिल्लू बार्बर का इरफ़ान शायद ही कभी कमजोर नजर आया हो। उसने मौत से भी जंग लड़ी और जिंदगी से भी। उसने जो आसमान अपने लिए तय किया था उसे छुआ भी और खामोशी के साथ चला भी गया लेकिन उसकी खामोशी रुला गयी।
क्रिकेटर बनने का सपना देखने वाले इरफ़ान खान का जन्म राजस्थान में, एक मुस्लिम परिवार में, सईदा बेगम खान और यासीन अली खान के घर पर हुआ था। उनके माता पिता टोंक जिले के पास खजुरिया गाँव से थे और टायर का कारोबार चलाते थे। कहते हैं कि इरफान और उनके सबसे अच्छे दोस्त सतीश शर्मा क्रिकेट में अच्छे थे तथा बाद में, उन्हें साथ में उनके दोस्त को सीके नायडू टूर्नामेंट के लिए 23 साल से कम उम्र के खिलाडिय़ों हेतु प्रथम श्रेणी क्रिकेट में कदम रखने के लिए चुना गया था। दुर्भाग्य से, धन की कमी के कारण वे टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए नहीं पहुँच सके। क्रिकेट हाथ न लगी तो इरफान ने 1984 में नई दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में अध्ययन करने के लिए छात्रवृत्ति अर्जित की और वहीं से अभिनय में प्रशिक्षण प्राप्त किया।
क्रिकेटर बनने से चूका इरफान अभिनेता बना और खूब बना। इरफान उन किस्मत वाले अभिनेताओं में से हैं जिन्हें दौलत से ज्यादा शोहरत मिली। आने-जाने पर किसी का जोर नहीं है लेकिन इरफान कलेजे वाला निकला उसने पांच रोज पहले अपनी अम्मी को विदा किया और फिर खुद विदाई ली। कहते हैं कि रमजान के महीने में चिर यात्रा पर जाने वालों को ऊपर वाला अपनी रहमतों से नवाजता है, इरफान को भी अल्लाह अपनी पनाह में ले। इरफान हम सिनेमा प्रेमियों की यादों में हमेशा जिंदा रहेगा। इरफान का अर्थ ही कृतज्ञ होना है उसने अपने आपको हमेशा अपने नाम के अनुरूप ही बनाए रखा। इरफान का न होना एक बड़े शून्य का होना है।
(लेखक-वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं।)
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