बहुत- बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले… दिग्विजय नहीं आये, कमलनाथ का सफर अधूरा

संडे डायरी

विजय कुमार दास
मो.9617565371

मध्यप्रदेश के शीर्ष कांग्रेस के बुजुर्ग नेता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ जिन अरमानों को लेकर 2 दिनों से ग्वालियर सफर पर पहुंचे थे, उनके सारे अरमान धरे के धरे रह गये। कमलनाथ ने सोचा था कि ग्वालियर ‘रोड-शो’ के बहाने एक बार फिर से ग्वालियर के ‘महाराजा’ ज्योतिरादित्य सिंधिया को ललकारेंगे और ‘महल’ की दिवारों तथा पर्दों को हिला कर आयेंगे। परन्तु उनका भाग्य कहिये या दुर्भाग्य इस सफर में उनके प्रिय पात्र छोटे भाई पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने दूरी बना ली, वे ग्वालियर रोड-शो के समय कमलनाथ के साथ कही भी दिखाई नही दिये। यंू कहा जाये कि जिस दिग्विजय के सहारे आज तक वे सिंधिया परिवार को गरियाते रहे वही दिग्विजय उनसे दूर क्यो रहे यह बात शायद कमलनाथ भी नही समझ पाये। मिर्जा गालिब की यह गजल आज कमलनाथ के लिये सटीक बैठती है ‘हजारों ख्वाहीस एैसी कि हर ख्वाहीस पर दम निकले, बहुत निकले मैरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले’। एैसी स्थिति में आखिर कमलनाथ जी क्या करते। दिग्विजय आये नही अलबत्ता उनके समर्थक नदी बचाने के नाम पर रेत सत्याग्रह में जुटे हुए थे, यह बात अलग है पूर्व मंत्री डॉ. गोविन्द सिंह नदी बचाओं अभियान को छोड़कर कमलनाथ के कांग्रेस बचाओ अभियान में दिखाई तो दिये परन्तु उनका ध्यान नदियों से बहने वाली पानी और रेत पर फिर भी मोबाइल से जुड़ा रहा। यह तो था कुछ दिग्विजय कमर्थकों का हाल परन्तु दिग्विजय सिंह के वे समर्थक जिन्हें ग्वालियर-चंबल के 16 विधान सभाओं में टिकट चाहिये उन लोगों ने शक्ति प्रदर्शन के नाम पर खूब भीड़ जुटाई, रोड-शो में गाडिय़ां इतनी कि कभी किसी रैली में आज तक कमलनाथ जी ने नही देखी होगी। परन्तु वे समझ नही पाये कि ये सारे कारों का काफिला विधानसभा में कांग्रेस टिकट पाने वालों की थी और इनमें ज्यादा दिग्विजय सिंह के ही समर्थकों का जलवा था। एैसी स्थिति मेें दिग्विजय सिंह ने यह साबित कर दिया है कि ग्वालियर-चंबल में आज की तरीख में जो भी बची-खुची कांग्रेस है उसमें दिग्विजय ही है और कोई नही भले ही वे रोड-शो से कोसों दूर हैं। रहा सवाल ‘महल’ की दीवारों को हिलाकर कुछ तूफान खड़ा करने के इरादे से ‘रोड-शो’ का असर तो, इस मामले में यही कहा जा सकता है कि कमलनाथ जी ने जैसा सोचा था वैसा कुछ भी नहीं हो पाया। कमलनाथ जी ने महल से या ज्योतिरादित्य सिंधिया से सवाल पूछने की हिम्मत में भी कंजूसी दिखाई, जिस तरह के ‘मीडिया’ के प्रश्नों का जवाब वह ग्वालियर की ‘मीडिया’ के सामने देते हुए कह रहे थे कि उन्हें पता हैं कि यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं, मतलब यह था कि वे शंका जाहिर कर रहे थे जो पत्रकार तीखे सवाल कर रहा है वह सिंधिया का आदमी है। हम यहां बता दें कमलनाथ जी पत्रकार ना तो सिंधिया के होते है, ना आपके होते हैं, पत्रकार असल में आप जैसे बुजूर्ग नेताओं से इसलिए रू-ब-रू होता है ताकि आप अच्छी खबर बनायें, जनता में कुछ अच्छी बात जाये, परंतु राजनीति में भी पत्रकारों को घसीट कर अपने आपको आप जैसे नेता खुद कमजोर क्यों बनाते हैं समझ में नहीं आता। आप बार-बार कहते हैं शिवराज 15 वर्षों का हिसाब दे, आपसे 15 महीनों का हिसाब ना मांगा जाये तो आखिर ‘मीडिया’ कौन सी नई बात आप से कहे, आप ही बताइये। आप कहते हैं 28 में से 28 जीतेंगे चलो माना 28 जीत लोगे फिर 10-20 चले जायेंगे तो क्या होगा। मुद्दे की बात मीडिया पूछे तो कह दो यह तो भाजपा का है, या शिवराज कह दें कांग्रेस का है, यकीन रखिये मध्यप्रदेश की मीडिया में बड़े-बड़े दुकानदार नही है जैसा कुछ दिल्ली में हैं, कुछ मुम्बई हैं, जो कभी-कभी आकर यहां तांडव करते हैं और उनके सामने आपकी मुद्रा मुद्राराक्षस की तरह होती है। इसलिए मध्यप्रदेश की मीडिया का कोई मुकाबला नही है यह हम गर्व से कहते हैं। कुछ गलत तो सभी जगह है, उनमें सबको घसीटने की बजाय मूल पत्रकारों से जुडिय़े जैसा सेन्ट्रल प्रेस से एक बार जुड़कर देखा। अहसास किया होगा क्या मिला, आप भले ही बाद में सेन्ट्रल प्रेस क्लब नही आये कोई मलाल नही सारे मीडिया साथी 24ङ्ग7 आज भी काम पर हैं, कोरोना में भी 24ङ्ग7 काम ही कर रहे है। लेकिन आप सोचिये कोविड- 19 महामारी के दौर में ‘मीडिया’ के किसी भी हित में आपके मुह से एक शब्द भी नही निकले और आप कहते है मुझे पता है किसके कहने से सवाल पूछा जा रहा है, यही एक दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है आप जैसे शीर्ष राजपुरुष के बड़े दिल के छोटी सोच का जो आज ‘मीडिया’ के साफ चरित्र को दूषित होने की स्थिति में पहुंचने का भागीदार बन रहा है। बताइये ग्वालियर-चंबल में विकास जीरो, लेकिन पूर्व रेल मंत्री स्व. माधव राव सिंधिया ने पूरे देश में रेल सेवा के स्तर को विश्व स्तरीय बनाया तो उसका बखान भी होना चाहिये था आपका कद बढ़ जाता। शिवराज पर लाखों करोड़ों के निवेश पर सवाल है परन्तु मध्यप्रदेश के स्थानीय उद्योग पतियों की दुर्गति के लिए कौन जिम्मेदार है यह भी एक बड़ा सवाल जिसका हल आप चाहते तो 15 महीने में निकाल सकते थे। आपको ‘आइफा’ बड़ा लगा अच्छी बात थी परन्तु बेरोजगारी तो त्रासदी के शिकार ही रही। खैर वोट और नोट की सरकार का मुद्दा आपने छेड़ा है, यह मुद्दा अभी नही 2023 में जरूर कारगर हो सकता है। आप 28 में से चाहे जितनी सीटें जीत जायें दिल से पूछिये सरकार ‘महल’ की रहेगी या आपकी यदि आप सही उत्तर दे सके ‘मीडिया’ वाले भी माहौल बनाने में जुटेंगे परन्तु आपमें ‘मीडिया’ को टारगेट किया तो ‘मीडिया’ का कोई गेट नही यह बात अवश्य समझ लीजियेगा। जहां तक सवाल है ग्वालियर-चंबल में आप जिस महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया के (राजनीति) ‘महल’ की दीवारों को हिलाने आये थे वहां पर जो चिर स्थायी रवैया है उससे यही संकेत मिले हैं कि दीवार तो छोडिय़ें महल के पर्दें भी नही हिले है मतलब मिर्जा गालिब ने सही लिखा है ‘बड़े बे-आबरू होकर तेरे कूचे से निकले हम’। इसलिये यह लिखने में संकोच नही है कि बकौल आपके ‘शिवराज-महाराज’ झूठ की राजनीति कर रहे है, तो आपको भी यह सोचना ही होगा कि आपने भी झूठी राजनीति का सहारा क्यों लिया है, दिल से मन से पूछिये आप जैसा योग्य अनुभवी राजपुरुष इस गति पर कैसे पहुच गया। जिसने कभी हार नही देखी आज तक।

संडे डायरी के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।