भारत में क्यों नहीं होती भ्रष्टाचारों पर सऊदी जैसी कार्रवाई

नईम कुरेशी
पिछले साल दुनिया भर से दो अच्छी खबरें आयीं। एक सऊदी अरब से वहां की इस्लामिक सरकार ने अपने 19 प्रिंसों को भ्रष्टाचार करने व अकूत दौलत जमा करने पर तत्काल जेलों में डाल दिया। सऊदी अरब 50 के करीब मुस्लिम देशों के मुखिया भी माने जाते हैं। कई मौकों पर उन्हें मुस्लिम देशों के आपसी विवादों में राजीनामा भी करते देखा जाता है। भारत में भी इसी तरह भ्रष्टाचारों से कमाई सम्पत्ति जब्त करने का आदेश सम्राट अकबर ने दिया था। प्रिंस अपनी 70 फीसद सम्पत्ति सऊदी सरकार को देकर ही छूट सकेंगे।
इस्लामिक देशों में भी भ्रष्टाचारों के मामले भारत व एशिया के अन्य देशों जैसे ही सुने व देखे जाते रहे हैं पर चीन के बाद सऊदी आदि में इस पर कड़ाई से लागू करने की खबरें आना भारत सरकार के लिये एक चुनौती है। यहां तक कि पाकिस्तान में भी भारत से ज्यादा भ्रष्टाचार पर कार्यवाही देखी गई है। पनामा लीक पेपर कांड के चलते वहां के प्रधानमंत्री तक को अपने पद से हटना पड़ा वो भी 15 दिन के अंदर जबकि हमारे देश में चाहे किसी का नाम पनामा लीक में हो या बोफोर्स कमीशनबाजी में या फिर चारा घोटाला हो या कोयला घोटाला या चावल घोटाला। इन सब में सालों 10 से 20 सालों तक मामले कोर्ट में चलते हैं और फिर भी अधिकतर हमारे माननीय नेतागण उसमें बरी हो जाते हैं। चारा घोटाले को जरूर छोड़ दें, इसमें भी सियासत कुछ ज्यादा देखी जा रही है।
इन्दिरा जी के दौर में नागर वाला काण्ड से लेकर काफी भ्रष्टाचारों के मामले हुये। आज भी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेटे के भ्रष्टाचार से अरबों की कमाई का मामला भी सोनिया के दामाद रोबर्ट बड़ेरा जैसा है पर उस पर कार्यवाही नहीं की गई।
34 फीसद माननीय आरोपी हैं
भारत में भ्रष्टाचारों की जननी यहां की सियासत है। चन्द पार्टियों को छोड़ जिसमें वामपंथी दलों से लेकर आम आदमी पार्टी आदि को छोड़ बाकी सभी पार्टियों पर भ्रष्टाचारों में डूबे हुये होने के आरोप खुलेआम लग रहे हैं। हरियाणा में जरूर वहां न्याय पालिका की सक्रियता से ओमप्रकाश चौटाला मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहते हुये शिक्षक भर्ती काण्ड में दोषी के तौर पर 10 साल की सजा काट रहे हैं। अपने पुत्र व एक दो आय.ए.एस. अफसरों के साथ मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में लगभग 80 फीसद तक सांसद और विधायकगण भ्रष्टाचारों में डूबे हुए हैं पर उन पर कोई कार्यवाही संभव नहीं हो पा रही है। एक दो मामलों को छोड़कर एक दिल्ली के एन.जी.ओ. इस मामले में गहरी छानबीन करते देखे गये। उनकी रिपोर्ट़ों को आये दिन मीडिया में छापा जाता है। जो कहती हैं कि 34 फीसद से भी ज्यादा हमारे माननीय सांसद व विधायकगण भ्रष्टाचारों से डूबे हैं। गम्भीर आपराधिक मामले उन पर दर्ज हैं फिर भी उन पर चुनाव आयोग से लेकर न्यायालय चुनाव लडऩे पर रोक नहीं लगा सके हैं क्योंकि ऐसे लागों को बचाने में केन्द्रीय सत्ता सीधे-सीधे मदद करती देखी जा रही हैं। सी.व्ही.सी., सी.बी.आई. आदि संस्थायें 10-20 फीसद लोगों पर ही कुछ कर पाते हैं।
सियासतदां एकजुट हैं
भ्रष्टाचारों पर जहां सियासतदां सब एकजुट हैं वहीं मीडिया कर्मी व सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय आदि जरूर समय-समय पर इन सियासतदां पर नुक्ताचीनी करते आ रहे हैं पर भारत में जे.पी. जैसा 1974-75 का आंदोलन दोबारा नहीं बन सका। ऐसे आंदोलनों से जरूर इनके खिलाफ जनता में जागरण होता है और भ्रष्टाचारी लोग डर जाते हैं। कुछ पकड़े जाते हैं और कुछ सत्ता से धकेल दिये जाते हैं। पिछले दो महीने पहले ही ‘कानून दिवसÓ के मौके पर प्रधानमंत्री से लेकर कानून मंत्री रवि शंकर तक देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र से भिड़ते दिखाई दिये।
कानून मंत्री ने इस दिवस पर फरमाया कि शासन का काम उनके पास रहना चाहिये, जो शासन के लिये निर्वाचित हैं। इसके जावाब में मुख्य न्यायाधीश ने अच्छा तर्क दिया। नागरिकों के मौलिक अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता। स्वतंत्र न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा की शक्ति के साथ संतुलन स्थापित करने के लिये अंतिम संरक्षण की ताकत दी गई हैं ताकि सरकारें अपने दायरे में रहकर काम करें।
मुख्य न्यायाधीश तक भिड़ चुके
केन्द्र सरकारें सालों से सूबे के हायकोर्ट के जजों की नियुक्तियों में लेट लतीफी से करने के लिये भी खबरों से बनी हुई है। मुख्य न्यायाधीशगण इस मामले में प्रधानमंत्री मोदी से भी भिड़ चुके हैं। राज्यों के हायकोर्ट अनेक मामलों में सूबे के मंत्रियों व आला अफसरों के खिलाफ आदेश देते रहे हैं फिर भी व्यापमं मामले में अभी भी बड़े सियासतदां मध्य प्रदेश में बचे हुये हैं। मेडीकल कॉलेजों में भर्ती मामलों में भी छोटे-छोटे अफसरों पर ही कार्यवाहियां हुई हैं।
सरकारों की प्राथमिकता में भ्रष्टाचार न होकर साम्प्रदायिकता फैलाकर वोट बैंक मजबूत करने की नीति सबसे ऊपर बनी है। देशभर में लाखों नौजवान नौकरियों की लाइनों में लगे-लगे अपनी उम्र के 10-12 साल खो चुके हैं फिर भी वो नौकरियां खरीद नहीं पा रहे हैं। स्कूलों में पीने का पानी व शौच के माकूल इंतजाम नहीं हैं। 80 फीसद सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं तो कहीं नर्स़ें गायब हैं तो कहीं दवायें नहीं हैं पर सियायतदां भ्रष्टाचारों में डूब कर मौजमस्ती की जिंदगी गुजार रहे हैं।