शिवराज-सिंधिया के मुकाबले में थक नहीं रहे कमलनाथ में दम तो बहुत है, लेकिन चढ़ाई केले के पेड़ पर

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास
कैम्प ग्वालियर
मो.9617565371

मध्यप्रदेश में 28 विधानसभा सीटों के उपचुनाव लोकतंत्र की अग्रि परीक्षा का भी दौर है, क्योंकि इसमें भाग लेने वाले सभी योद्धा सिर्फ सरकार के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। उन्हें हारने और जीतने से कोई मतलब नहीं है। यूं कहा जाए कि मध्यप्रदेश की सरकार अब केले के पेड़ की तरह हो गई है। जिसमें हड्डी नहीं है, मात्र 28 केले लगे हुए हैं और यही 28 केले, केले के पेड़ की असली ताकत हैं, मतलब मप्र सरकार को यदि अब चलना है तो इन्हीं 28 केलों के भरोसे ही चलना होगा। वरना वह दिन दूर नहीं कि यदि भारतीय जनता पार्टी ने शिवराज-महाराज के दम पर भी स्थाई सरकार नहीं बनाई तो फिर इन 28 केलों का क्या होगा, कोई नहीं जानता।
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ आज जितनी बातें आमसभाओं में सीना तान कर कर रहे हैं, उतनी बातें यदि जब वे मुख्यमंत्री थे, उस समय ईमानदारी से पूरी कर लेते तो मप्र सरकार केले का पेड़ नहीं बनती। हमारा आशय यह है कि 2018 दिसंबर में मप्र का आम चुनाव सत्ता परिवर्तन का था और वह सत्ता परिवर्तन व्यवस्था को चुस्त-दुरस्त करने के लिए जनता ने कांग्रेस को एक बार मौका दिया और मुख्यमंत्री के रुप में 9बार के सांसद केंद्रीय मंत्री रह चुके अनुभवी बुजुर्ग नेता व बकौल राहुल गांधी खूबसूरत कमलनाथ को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार भी किया। लेकिन 15 वर्षों से वनवास काट रहे कांग्रेस के नेताओं ने, जो मंत्री बन चुके थे, उन्होंने मप्र की कांग्रेस सरकार को केले का पेड़ बना दिया और जितने फल लगे थे, उसे बोरियों में भर-भरकर अपने घर भर लिए, ऐसा कहना ज्योतिरादित्य सिंधिया का है, जिसने कांग्रेस की सरकार बनवाई थी। उनके कहने का मतलब भी साफ है कि 28 फल केले के पेड़ में बचे थे, उसे भी लेकर सिंधिया चले गए। लेकिन अब जब तक सरकार नहीं बनी है, तब तक सरकार बनने के लिए अब 28 केलों पर ही दांव लगेगा। जो सिंधिया के पास पहले से ही है। मतलब आने वाली सरकार भी केले के पेड़ की तरह होगी। किसी भी सरकार को हमारी इस संपादकीय में केले के पेड़ लिखने के व्यंग्य का केवल इतना ही अर्थ है कि वह जमाना लद गया जब कांग्रेस के नेता कटहल का पेड़ लगाते थे और खुद नहीं खाते थे। उसका फायदा अगली पीढी ही उठाती थी, जिस पीढ़ी ने उस कटहल का लाभ लिया है उसमें स्व. अर्जुन सिंह, स्व. श्यामाचरण शुक्ला, स्व. पीसी सेठी और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ऐसे नाम हैं, जिन्हें कहा जा सकता है कि इन्होंने कटहल के पेड़ के फल का भरपूर उपयोग किया और एक हद तक कांग्रेस मुक्त मप्र होने के पहले एक बार कांग्रेस ने कमलनाथ को भी मुख्यमंत्री बनाकर यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि एक बार फिर से मध्यप्रदेश में कांग्रेस के लिए कमलनाथ कटहल का पेड़ लगाएं, लेकिन 15 महीनों में हर जगह उन्होंने केले के पेड़ की खेती कर डाली। इसलिए न वे किसान नेता बन पाए और न ही कुशल व्यापारिक नेता ही बन पाए। इसीलिए उनकी सरकार रेत के महल की तरह ढह गई। यह संपादकीय उस स्थान पर बैठकर लिखी जा रही है जहां कमलनाथ ने सरकार वापस बनाने के लिए कई चक्कर लगाए, लेकिन जब कोई नेता अपने दोस्त को छोड़कर चाहे वह अच्छा हो या बुरा, या बड़े भाई की तरह हो उसे छोड़कर मैदान में उतरता है तो कोई विश्वास नहीं करता, यह स्थिति ग्वालियर-चंबल के 16 विधानसभा क्षेत्रों में कमलनाथ को लेकर बन गई है, लिखने में कोई गुरेज नहीं है कि शिवराज-महाराज के मुकाबले में थक नहीं रहे हैं कमलनाथ, लेकिन केले के पेड़ पर सवार होकर सत्ता हथियाने की कोशिश उनकी इसलिए अधूरी रहेगी, क्योंकि जो सरकार डूब गई उसमें भी जो सरकार बनने वाली है उसका भी चरित्र केले के पेड़ की तरह है, मतलब केले के पेड़ में जिस तरह हड्डी नहीं होती, ठीक उसी तरह अब सरकार बनने वाली है। कहने का मतलब साफ है कि केले के पेड़़ पर चढ़ाई कमलनाथ की सफल हो जाती है तो यह मप्र के इतिहास में लोकतंत्र का नौवां आश्चर्य होगा। स्मरण होगा कि जब से चुनाव शुरू हुए हैं, तब से लेकर अभी तक मतलब कमलनाथ की जुबान से निकले हुए शब्द नालायक से लेकर डबरा में इमरती देवी को आइटम कहे जाने तक बहस का मुद्दा बन रहा है। अर्थात कमलनाथ के विकास के एजेंडे पर कोई बहस नहीं हो सकती, उधर दूसरी ओर शिवराज सिंह चौहान बिना सिंधिया के ग्वालियर-चंबल को छोडि़ए पूरे मप्र में अब आने वाली पीढ़ी के लिए सत्ता का पेड़ कटहल की तरह लगाने का दम दिखा रहे हैं। इन दोनों का मानना है कि आने वाली नई पीढ़ी को केले के पेड़ की तरह सवारी करने से बचाया जाए और स्थाई सरकार के भाव को युवा पीढ़ी के माध्यम से जन-जन तक, गांव-गांव तक, शहरों की गली-गली तक पहुंचाई जाए। इसलिए ये दोनों नेता और साथ में त्रिमूर्ति नरेंद्र सिंह तोमर, नरोत्तम मिश्रा और वीडी शर्मा स्थाई सरकार का संदेश लेकर जिस अंदाज से मतदाताओं तक पहुंच रहे हैं, उसमें कमलनाथ के भाषणों का जनता पर कोई असर नहीं है, यह भी स्पष्ट होने लगा है। इस विशेष संपादकीय का लब्बोलुआब यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की तारीफ करनी पड़ेगी कि वे अकेले मैदान पर हैं और पांच पांडवों से युद्ध करते थक नहीं रहे हैं। परंतु जीत की संभावना इसलिए कम है, क्योंकि वे सरकार बनाने के लिए केले के पेड़ के ऊपर कर रहे हैं चढ़ाई। मतलब यदि अपनी भाषण शैली में सुधार कर लें तो मामला फिफ्टी-फिफ्टी हो सकता है। आगे समझदारी कमलनाथ में कम नहीं है, लेकिन भाजपा के पांच पांडव ग्वालियर-चंबल संभाग में कमलनाथ से ज्यादा समझदार हैं। संभाग में शिवराज-सिंधिया के साथ चट्टान की तरह एकजुट हैं और समझदार भी ज्यादा हैं।
विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।