मध्यप्रदेश हो या देश आइटम नहीं चलेगा…

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास
मो.9617565371

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का एक बयान, जिसमें उन्होंने डबरा विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की उम्मीदवार महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती इमरती देवी का नाम लिए बिना उन्हें आइटम कहकर संबोधित किया था तो उनका वह भाषण हिंदुस्तान में 1975 के आपातकाल की तरह इतिहास के काले पन्नों में दर्ज हो गया है। राष्ट्रीय हिंदी मेल की यह विशेष संपादकीय संपूर्ण दावे के साथ यह लिखने को मजबूर है कि राजनीति की अभद्रता का इससे बड़ा कोई कड़वा सच नहीं हो सकता। भविष्य में 100 वर्षों तक अब इस प्रदेश और देश में राजनीति करने वाले बड़े नेता किसी दलित, गरीब और संघर्ष की उपज से सफल हुई महिला नेता को आइटम नहीं कह पाएगा। कमलनाथ जी ने सफाई भले ही अपने आक्रामक अंदाज में दी हो, यह उनका स्वभाव हो सकता है, परंतु यह सच है कि कमलनाथ के मुंह से निकला आइटम इतना बड़ा मुद्दा बन गया है कि मप्र से लेकर पूरे देश में कमलनाथ ने कांग्रेस को बैकफुट पर लाकर खड़ा कर दिया है। डबरा में कमलनाथ की सभा के पहले तक कांग्रेस बराबरी पर थी, मतलब चुनावी ऑकलन कहने लगे थे कि कमलनाथ 28 में से 28 मांग रहे हैं, 14 तो मिल ही जाएंगे परंतु अब ऐसा नहीं होगा।

कमलनाथ के एक बयान ने उनकी खुद की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। हां, यह बात अवश्य है कि कांग्रेस हाईकमान की ओर से अर्थात राहुल गांधी की तरफ से आइटम वाले भाषण पर जब असहमति जताई गई, तब यदि कमलनाथ सार्वजनिक रूप से माफी मांग लेते तो उनका कुछ भी नहीं बिगड़ता, लेकिन जिस तरह लंकेश ने अंत तक माफी नहीं मांगी और लंका जल गई, उसी तरह कमलनाथ जी ने भी माफी नहीं मांगी। हालांकि सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी ने कमलनाथ को बहुत समझाया था, लेकिन कमलनाथ यह कहकर बच निकले कि राहुल गांधी को वे अपने भाषण को लेकर सब कुछ समझा चुके हैं और माफी मांगना उनकी शान के खिलाफ है। इसी के चलते मप्र में कांग्रेस जो सीना तानकर गद्दार और बिकाऊ जैसे शब्दों का उपयोग कर रही थी, उनके बड़े-बड़े नेताओं ने मुंह पर पट्टी बांध ली है। और तो और राहुल गांधी-प्रियंका गांधी फैसला कर चुके हैं कि बिहार में कांग्रेस की स्थिति को मजबूत करना है तो फिर मध्यप्रदेश में न तो रोड-शो होगा और न ही राहुल गांधी की आमसभाएं। कुल मिलाकर आइटम बाले बयान ने कमलनाथ को भारी संकट में डाल दिया है। वे अकेले पड़ चुके हैं, लेकिन डूबते को तिनके का सहारा काफी होता है। इस लिहाज से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कमलनाथ के साथ खड़ा होना बड़ी बात है। हमारी संपादकीय कांग्रेस की राजनीति से संबंधित नहीं है। लेकिन लोकतंत्र में जिन नेताओं का स्वरूप मठाधीश का रूप ले चुका है, उन्हें यह जताने के लिए जरूर महत्वपूर्ण है कि अब जनता को उस नेता के प्रति विश्वास चाहिए, जिन वायदों को लेकर वह सरकार बनाता है या सरकार बनाने के लिए संघर्ष करता है। इस विशेष संपादकीय का लब्बोलुआब यह है कि लोकतंत्र में चुनाव हर पांच साल में आते रहेंगे, जाते रहेंगे, हार और जीत होती रहेगी लेकिन राजनीति में जनता से नेताओं का रिश्ता अटूट होता है, जो चारित्रिक मर्यादाओं की सीमा लांघने से टूटने लगता है, उसे बचाना चाहिए। हमें यह लिखने में भी गुरेज नहीं है कि ग्वालियर-चंबल के ज्योतिरादित्य सिंधिया जिन्हें महाराजा का खिताब हासिल है, वे अपने भाषणों में आक्रोश दिखाकर धरती-आसमान हिलाने की कोशिश कर रहे हैं, वह भी ठीक नहीं है। इसलिए महाराज प्लीज अपने गले को बीमार मत करिए, आमसभाओं में हाथ जोडि़ए, जनसैलाब आपके साथ खड़ा हुआ है, बताने की जरूरत नहीं कि आप महाराजा हैं। यह भी बताने की जरूरत नहीं कि सरकार आपने बनाई है, सबको पता है और सब चाहते हैं, जो सरकार आपने बनाई है, वह चिर स्थाई रहे और जनता का विकास हो। इसलिए हमारा मत है कि कोई गद्दार कहे या बिकाऊ कहे, जनता को उससे फर्क नहीं पड़ेगा, फर्क तो केवल इस बात से पड़ेगा कि आप हाथ जोडि़ए, मुस्कुराइए और जनता से कहिए- महाराजा के नाम पर मप्र को बचाइए। हो सकता है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को या पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को इस संपादकीय के शब्दों से असहमति हो, लेकिन 28 विधानसभा उप चुनाव ही अंतिम नहीं है, इस बात को दोनों पक्ष याद रखें तो बेहतर होगा।
विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।