मुश्किल में हैं मंत्री, लेकिन शिवराज सरकार स्थाई चाहिये

शिवराज को 9, सिंधिया को 10 कमलनाथ को 8 और एक का पता नहीं

संडे डायरी
विजय कुमार दास
मो.9617565371

मध्यप्रदेश में 28 विधानसभा के उप चुनावों को लेकर घमासान मचा हुआ है। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच में जब चायना वाल खड़ी हुई तो कमलनाथ का सूर्य अस्त हो गया। तथा सरकार चली गई, लेकिन शिवराज की सरकार बनते ही ज्योतिरादित्य सिंधिया को यह कहकर टारगेट किया जा रहा है कि लोकतंत्र की हत्या हो गई है। मतलब, यह सारे आरोप सिंधिया के ऊपर इसलिये नहीं लग सकते क्योंकि सिंधिया ने कमलनाथ सरकार की वायदा खिलाफी के विरोध में लोकतंत्र के हितों के लिये कमलनाथ की सरकार को डूबो कर शिवराज की नई सरकार बनाई। ज्योतिरादित्य ङ्क्षसधिया का यह कहना गलत नहीं है कि कमलनाथ की सरकार भ्रष्टाचार में डूबी और विधायकों का अपमान ही लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपमान था। क्योंकि जनता ने जिन विधायकों को चुना था उन विधायकों को दो कौड़ी का बनाने के लिये कमलनाथ की सरकार में नौकरशाहों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इसी का परिणाम निकला की बेंगलुरु गये 22 विधायकों को मनाने के लिये जब पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय ङ्क्षसह बेंगलुरु पहुंचे तो उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा और अंतत: भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन गई। लेकिन जनता के माथे पर चुनाव का टीका लग गया। और यह टीका कर्ज के बोझ से लदी हुई मध्यप्रदेश की जनता के लिये अब भारी पडऩे लगा है। इसके लिये कमलनाथ को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। हमने इस संडे डायरी में इस बात का जिक्र करने की कोशिश की है कि 28 विधानसभा के उपचुनावों में जनता ही चुनाव लड़ रही है। लेकिन उसके सामने न तो कमलनाथ है ना ज्योतिरादित्य ङ्क्षसधिया है और ना ही शिवराज सिंह चौहान है। यह लिखने में संकोच नहीं है कि 28 विधानसभा क्षेत्रों में से 9 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां अधिकतर जनता को स्थाई सरकार से मतलब है। वे बार-बार होने वाले चुनाव से क्रोधित हो रहे हैं। वे कहते हैं यदि इस बार हमने शिवराज सिंह चौहान को हरा दिया तो आने वाले समय में इस बात की क्या गारंटी है कि कमलनाथ सौदेबाजी नहीं करेंंगे। मतलब नेताओं को चाहिये कि वे जनता को मूर्ख ना समझें, क्योंकि जनता अब तोल-मोल और किसी बड़े बोल के चक्कर में बिल्कुल नहीं है। लेकिन जब हमने 10 ऐसे विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया जहां विकास और सिंधिया बहुत बड़े मुद्दे हैं। यहां पर ज्योतिरादित्य सिंधिया को कोई गद्दारी से नवाजे, जनता पसंद नहीं करती उसे तो क्षेत्र का विकास चाहिये और महाराजा की इज्जत पर कोई अंगुली उठा दे ऐसा उन्हें बर्दाश्त नहीं है। रहा सवाल 7 विधानसभा क्षेत्र ऐसे भी निकले हैं जहां कमलनाथ की वजह से नहीं बल्कि वहां जो मंत्री चुनाव लड़ रहे हैं उनके खिलाफ गुस्सा नजर आता है। और यहां पर जनता चुनाव लड़ती दिखाई दे रही हैं, क्योंकि वह खामोश है। रोचक प्रसंग यह है कि इस 7 विधानसभा क्षेत्रों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया जब आते हैं तो तालिया खूब बजती हैं। जब इन्हीं क्षेत्रों में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का दौरा होता है तो इन क्षेत्रों में तालियों के साथ नगाड़े भी बजते हैं। यंू कहा जाये कि जनता मंत्रियों के खिलाफ है कमलनाथ या सिंधिया के खिलाफ नहीं है। इसलिये इस संडे डायरी में हम अपने चुनावी दौरे का आज की तारीख में जो विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं उसका लब्बो लुआब यह है कि शिवराज सिंह सरकार के 6 मंत्री जो चुनाव लड़ रहे हैं वे मुश्किल में भी है। और जहां तक पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का सवाल है उनका दम पूरा लग रहा है, लेकिन अंदर गांव की खबर है कोई गद्दार कहे या बिकाऊ कहे, उनके ग्राम पंचायत में पानी कौन पहुंचायेग, सड़कें कौन बनायेगा, स्कूल कौन चलायेगा, दवाईयां कौन पहुंचायेगा इन सब सवालों के उत्तर में वह कहने लगे हैं कि सरकार टिकाऊ हो, स्थाई तो ही बेहतर होगा। आपको जानकर यह आश्चर्य होगा कि ग्रामीण अंचलों में भी किसान, मजदूर मतदाताओं ने कैलकुलेटर से कैलकुलेट कर लिया है कि कमलनाथ को 20 सीटें भी मिल जायेंगी तो भी सरकार तो शिवराज की ही रहेगी। इसलिये बेहतर है स्थाई सरकार की सोची जाये। और यही बात भाजपा के कार्यकर्ता अब घर-घर पहुंचा रहे हैं, कांग्रेस के कार्यकर्ता मतदाताओं के घरों से दूर है। महाराजाा सिंधिया के निर्णय को न्यायसंगत कहा जाये क्योंकि महाराजा अपनी जनता के विकास के साथ कभी अन्याय नहीं करेंगे। यह चर्चा गर्म है। मतलब यह है कि स्थाई सरकार का स्थाई भाव आज की तारीख में इन चुनावी महासमर में कायम है। लेकिन कल परिदृष्य क्या होगा यह लिखना और कहना मुश्किल है। परन्तु शिवराज सिंह के चेहरे पर 9 सीटें सिंधिया के चेहरे पर 10 सीटें और कमलनाथ के चेहरे पर 8 सीटों की संभावनाओं पर जनता का ध्यान है ऐसा महसूस हो रहा है। जबकि एक सीट ऐसी है जहां पर बहुजन समाज पार्टी का दावा जरूर है परन्तु कहीं निर्दलीय हाथ मार जाये तो आश्चर्य नहीं होगा। इस संडे डायरी का अंतिम वाक्य यह है कि यदि नेताओं ने अपनी जुबान पर लगाम नहीं लगाया जो यकीन मानिये 7 की तीन हो सकती हैं, 9 की 6 हो सकती हैं और 10 की 8 होने में समय नहीं लगेगा। इंतजार कीजिए ये पब्लिक है सब जानती है। फैसला जो भी होगा मध्यप्रदेश के हक में ही होगा।
संडे डायरी के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।