राष्ट्रीय हिंदी मेल का 25वां साल मंजिल के लिए हमने ‘मील का पत्थर नहीं देखा

अपनी बात
विजय कुमार दास
मो.9617565371

सन् 1973 की बात है, हम बमुश्किल बीएससी स्नातक की परीक्षा पास करके निकले ही थे कि मेरे पूज्य पिता स्व. महंत नरेन्द्र दास जी वैष्णव ने यह कहा कि तुम्हें चयन करना होगा विरासत या शरारत, तब मैंने शरारत इसलिए चुना क्योंकि मेरी शरारत में पत्रकारिता का जुनून था और वही जुनून राष्ट्रीय हिंदी मेल दैनिक समाचार पत्र के रूप में आज आपके सामने है। यह बात अपने उन हजारों पाठकों और नौकरशाहों तथा राजनीतिक पडिंतों के लिए लिख रहा हूं, ताकि वह यह जान सकें कि राष्ट्रीय हिंदी मेल किसी पूंजीपति घराने का समाचार पत्र नहीं है, इस समूह का जनक एक श्रमजीवी पत्रकार है, जो एक आम आदमी के हमदर्द नौकरशाह स्वर्गीय आरसी नरोन्हा की प्रेरणा से भोपाल में पत्रकारिता करने आया, और राष्ट्रीय हिन्दी मेल स्थापित करने में किसी और का नहीं, उन्हीं पत्रकारों का योगदान है जिन्होंने पत्रकारिता में इसलिए कदम रखा था, क्योंकि उन्हें भी इस जुनून ने पत्रकार बनाया था। आज उन सभी सरस्वती पुत्रों को, जो मुझसे उम्र में बड़े हैं और जीवित हैं, उन्हें प्रणाम करता हूं और जो जीवित नहीं हैं उन्हें मेरा विनम्र श्रद्धासुमन अर्पित हैं। जीवित पत्रकारों में श्री विजयदत्त श्रीधर को सबसे पहले प्रणाम, उन्होंने ही राष्ट्रीय हिंदी मेल दैनिक समाचार पत्र समूह की बुनियाद रखी थी, मैंने ऐसा जुनून आज तक किसी पत्रकार में नहीं देखा, श्री श्रीधर जी ने राष्ट्रीय हिंदी मेल की आधार शिला रखते समय जो दुस्साहस का परिचय दिया था, वही मेरे जैसे साधारण पत्रकार के लिए आज का मील का पत्थर बन गया है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने की कसक अभी बाकी है, क्योंकि हमने मील का पत्थर ही नहीं देखा। राष्ट्रीय हिंदी मेल जब हिंदी मेल के रूप में पाक्षिक समाचार पत्र था, उसके प्रथम संपादक रहे स्व. शिवप्रसाद मुफलिस जी को प्रणाम करते हुए मध्यप्रदेश की राजनीतिक डायरी के लेखक प्रसिद्ध ख्यातिनाम पत्रकार स्व. दाऊलाल साखी जी को नमन् करते हुए यह लिखने का साहस कर रहा हूं कि स्व. साखी जी ने राष्ट्रीय हिन्दी मेल के संपादक के रूप में मुझसे कहा था विजय दास तुम तो समाजवादी विचारधारा की कोख में जन्मे पत्रकार हो, मुझे विश्वास है कि यह राष्ट्रीय हिंदी मेल किसी दिन मप्र का सर्वाधिक चर्चित अखबार जरूर बनेगा। स्व. यशवंत अरगरे एवं एक वर्ष हमारे समूह में अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान मेल के संपादक रह चुके श्री लज्जाशंकर हरदेनिया को भी प्रणाम। कुछ समय के लिए स्व. राजेंद्र नूतन फिर श्री गोपाल जोशी हमारे साथ रहे और पंकज पाठक के संपादक बन कर आते-आते राष्ट्रीय हिंदी मेल सचमुच में एक चर्चित अखबार इसलिए बना क्योंकि इसकी बुनियाद में जांबाज पत्रकार स्व. सिद्धार्थ खरे और आज भी पत्रकारिता जगत के धुरंधर अजीत सिंह, धनंजय प्रताप सिंह, रवि भोई, चंद्रभान सोलंकी, ज्ञानेश उपाध्याय, रवींद्र जैन तथा मलय बैनर्जी का नाम अंकित हो चुका है। यूं कहा जाए कि राष्ट्रीय हिंदी मेल के फाउंडेशन में भी बुनियादी ईंटों को पत्रकारों ने ही लगाया था, इसलिए राष्ट्रीय हिंदी मेल हिंदी पत्रकारिता का एक छोटा समूह जरूर है, जिसने शक्तिशाली लोगों की इमारतों को ध्वस्त करने में भले ही सफलता हासिल नहीं की हो, यह अलग बात है परन्तु यह कहने में संकोच नहीं है कि शक्तिशाली लोग राष्ट्रीय हिन्दी मेल दफ्तर में आकर जब खबरों के साथ मिलते है तो कहते है चाय अच्छी थी। लेकिन सच के नजदीक आकर पत्रकारिता करने में राष्ट्रीय हिन्दी मेल बड़ा है। यह लिखने में मुझे संकोच नहीं है, क्योंकि हम 24 वर्षों का एक लंबा सफर तय करके आपके सामने इसलिए खड़े हैं क्योंकि मंजिल तक पहुंचने के लिए हमने कभी मील का पत्थर देखा ही नहीं, और यही हमारी हिंदी पत्रकारिता का जुनून रहा है। आज यह लिखते हुए मैं मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को धन्यवाद देना चाहता हूं क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में जब आज ही के दिन अर्थात 26 अक्टूबर 1996 को राष्ट्रीय हिंदी मेल का लोकार्पण किया था, तब यह कहकर हमारे सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ाकर दिया कि विजय दास जी मेरे 20 वर्ष पुराने मित्र हैं, मैं उन्हें हताश या निराश नहीं करना चाहता परंतु यह बताना चाहता हूं कि दिग्विजय सिंह ने जिन-जिन अखबारों का लोकार्पण किया है, वे अखबार साधनों के अभाव में या तो चल नहीं पाए या फिर बंद हो गए। दिग्विजय सिंह के इन्हीं शब्दों ने हमें दुस्साहस का साथी बना दिया और हम चल पड़े अकेले तो थे नहीं, कलम के सिपाहियों की ताकत थी और कारवां बन गया। दोस्तों विश्वसनीयता के संकट से जूझते आज प्रिंट मीडिया का समय शायद समाचार पत्रों के मालिकों के विश्वास को कमजोर कर सकता है और हम तो पूंजीपति नहीं हैं, इसलिए हो सकता है कारवां थक जाए परंतु हम यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि राष्ट्रीय हिंदी मेल का कारवां रूकेगा नहीं, क्योंकि हम लोकनायक जयप्रकाश नारायण तथा डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों की कोख से राष्ट्रीय हिंदी मेल को निकालकर अखबार चलाने के लिए पत्रकारिता जगत में कदम रखा है, इसलिए बेईमान नौकरशाहों के खिलाफ लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी, अंजाम यहां तक पहुंचा कि औद्योगिक विकास निगम में आईसीडी का 400 करोड़ का घोटाला करने वाले एमपी राजन को नौकरी छोडऩी पड़ी और पूर्व मुख्य सचिव सुधिरंजन मोहंती को नौ वर्ष तक पदोन्नित नहीं मिली। सरकार ने हमारी खोजपूर्ण रिपोर्ट की सच्चाई की गहराई में जाकर अन्वेेषण किया तो बड़े बड़े उद्योगपतियों के चूल्हे भी हिले थे। खैर यह श्रेय राष्ट्रीय हिंदी मेल ने कभी लिया भी नहीं परंतु ये तो मीडिया के दोस्तों का कमाल था जो सबने सबको बता दिया था और हम चर्चित हो गए। परंतु एकमात्र उदाहरण का जिक्र इसलिए क्योंकि 24 वर्षों के सफर में कांटे तो मिले बहुत परंतु जुझारू पत्रकार साथियों ने राष्ट्रीय हिंदी मेल के पाठकों का, नौकरशाहों का, राजनीतिक हस्तियों का और पुलिसवालों में चुनिंदे ईमानदार अधिकारियों के सहयोग से संंबल जो मिला है, उससे उम्मीद करना गैरवाजिब नहीं होगा कि प्रकाशन यात्रा के 25वें साल का पड़ाव हमें पुन: आप सभी के सहयोग तथा प्यार से और आने वाली नई पीढ़ी के साथ प्रबंध संपादक पृथ्विजय कुमार दास के नेतृत्व में सच्चाई के करीब जाकर पत्रकारिता करने का अवसर हमेशा उपलब्ध कराता रहेगा, तथा कॉर्पोरेट जगत चुनौतियों से मुकाबला करने और आम जनता की आवाज बनने में नया इतिहास रचेगा, क्योंकि अब यह छोटा सा समाचार पत्र समूह पारिवारिक स्वामित्व का दैनिक अखबार बन गया है। न् 1973 की बात है, हम बमुश्किल बीएससी स्नातक की परीक्षा पास करके निकले ही थे कि मेरे पूज्य पिता स्व. महंत नरेन्द्र दास जी वैष्णव ने यह कहा कि तुम्हें चयन करना होगा विरासत या शरारत, तब मैंने शरारत इसलिए चुना क्योंकि मेरी शरारत में पत्रकारिता का जुनून था और वही जुनून राष्ट्रीय हिंदी मेल दैनिक समाचार पत्र के रूप में आज आपके सामने है। यह बात अपने उन हजारों पाठकों और नौकरशाहों तथा राजनीतिक पडिंतों के लिए लिख रहा हूं, ताकि वह यह जान सकें कि राष्ट्रीय हिंदी मेल किसी पूंजीपति घराने का समाचार पत्र नहीं है, इस समूह का जनक एक श्रमजीवी पत्रकार है, जो एक आम आदमी के हमदर्द नौकरशाह स्वर्गीय आरसी नरोन्हा की प्रेरणा से भोपाल में पत्रकारिता करने आया, और राष्ट्रीय हिन्दी मेल स्थापित करने में किसी और का नहीं, उन्हीं पत्रकारों का योगदान है जिन्होंने पत्रकारिता में इसलिए कदम रखा था, क्योंकि उन्हें भी इस जुनून ने पत्रकार बनाया था। आज उन सभी सरस्वती पुत्रों को, जो मुझसे उम्र में बड़े हैं और जीवित हैं, उन्हें प्रणाम करता हूं और जो जीवित नहीं हैं उन्हें मेरा विनम्र श्रद्धासुमन अर्पित हैं। जीवित पत्रकारों में श्री विजयदत्त श्रीधर को सबसे पहले प्रणाम, उन्होंने ही राष्ट्रीय हिंदी मेल दैनिक समाचार पत्र समूह की बुनियाद रखी थी, मैंने ऐसा जुनून आज तक किसी पत्रकार में नहीं देखा, श्री श्रीधर जी ने राष्ट्रीय हिंदी मेल की आधार शिला रखते समय जो दुस्साहस का परिचय दिया था, वही मेरे जैसे साधारण पत्रकार के लिए आज का मील का पत्थर बन गया है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने की कसक अभी बाकी है, क्योंकि हमने मील का पत्थर ही नहीं देखा। राष्ट्रीय हिंदी मेल जब हिंदी मेल के रूप में पाक्षिक समाचार पत्र था, उसके प्रथम संपादक रहे स्व. शिवप्रसाद मुफलिस जी को प्रणाम करते हुए मध्यप्रदेश की राजनीतिक डायरी के लेखक प्रसिद्ध ख्यातिनाम पत्रकार स्व. दाऊलाल साखी जी को नमन् करते हुए यह लिखने का साहस कर रहा हूं कि स्व. साखी जी ने राष्ट्रीय हिन्दी मेल के संपादक के रूप में मुझसे कहा था विजय दास तुम तो समाजवादी विचारधारा की कोख में जन्मे पत्रकार हो, मुझे विश्वास है कि यह राष्ट्रीय हिंदी मेल किसी दिन मप्र का सर्वाधिक चर्चित अखबार जरूर बनेगा। स्व. यशवंत अरगरे एवं एक वर्ष हमारे समूह में अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान मेल के संपादक रह चुके श्री लज्जाशंकर हरदेनिया को भी प्रणाम। कुछ समय के लिए स्व. राजेंद्र नूतन फिर श्री गोपाल जोशी हमारे साथ रहे और पंकज पाठक के संपादक बन कर आते-आते राष्ट्रीय हिंदी मेल सचमुच में एक चर्चित अखबार इसलिए बना क्योंकि इसकी बुनियाद में जांबाज पत्रकार स्व. सिद्धार्थ खरे और आज भी पत्रकारिता जगत के धुरंधर अजीत सिंह, धनंजय प्रताप सिंह, रवि भोई, चंद्रभान सोलंकी, ज्ञानेश उपाध्याय, रवींद्र जैन तथा मलय बैनर्जी का नाम अंकित हो चुका है। यूं कहा जाए कि राष्ट्रीय हिंदी मेल के फाउंडेशन में भी बुनियादी ईंटों को पत्रकारों ने ही लगाया था, इसलिए राष्ट्रीय हिंदी मेल हिंदी पत्रकारिता का एक छोटा समूह जरूर है, जिसने शक्तिशाली लोगों की इमारतों को ध्वस्त करने में भले ही सफलता हासिल नहीं की हो, यह अलग बात है परन्तु यह कहने में संकोच नहीं है कि शक्तिशाली लोग राष्ट्रीय हिन्दी मेल दफ्तर में आकर जब खबरों के साथ मिलते है तो कहते है चाय अच्छी थी। लेकिन सच के नजदीक आकर पत्रकारिता करने में राष्ट्रीय हिन्दी मेल बड़ा है। यह लिखने में मुझे संकोच नहीं है, क्योंकि हम 24 वर्षों का एक लंबा सफर तय करके आपके सामने इसलिए खड़े हैं क्योंकि मंजिल तक पहुंचने के लिए हमने कभी मील का पत्थर देखा ही नहीं, और यही हमारी हिंदी पत्रकारिता का जुनून रहा है। आज यह लिखते हुए मैं मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को धन्यवाद देना चाहता हूं क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में जब आज ही के दिन अर्थात 26 अक्टूबर 1996 को राष्ट्रीय हिंदी मेल का लोकार्पण किया था, तब यह कहकर हमारे सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ाकर दिया कि विजय दास जी मेरे 20 वर्ष पुराने मित्र हैं, मैं उन्हें हताश या निराश नहीं करना चाहता परंतु यह बताना चाहता हूं कि दिग्विजय सिंह ने जिन-जिन अखबारों का लोकार्पण किया है, वे अखबार साधनों के अभाव में या तो चल नहीं पाए या फिर बंद हो गए। दिग्विजय सिंह के इन्हीं शब्दों ने हमें दुस्साहस का साथी बना दिया और हम चल पड़े अकेले तो थे नहीं, कलम के सिपाहियों की ताकत थी और कारवां बन गया। दोस्तों विश्वसनीयता के संकट से जूझते आज प्रिंट मीडिया का समय शायद समाचार पत्रों के मालिकों के विश्वास को कमजोर कर सकता है और हम तो पूंजीपति नहीं हैं, इसलिए हो सकता है कारवां थक जाए परंतु हम यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि राष्ट्रीय हिंदी मेल का कारवां रूकेगा नहीं, क्योंकि हम लोकनायक जयप्रकाश नारायण तथा डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों की कोख से राष्ट्रीय हिंदी मेल को निकालकर अखबार चलाने के लिए पत्रकारिता जगत में कदम रखा है, इसलिए बेईमान नौकरशाहों के खिलाफ लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी, अंजाम यहां तक पहुंचा कि औद्योगिक विकास निगम में आईसीडी का 400 करोड़ का घोटाला करने वाले एमपी राजन को नौकरी छोडऩी पड़ी और पूर्व मुख्य सचिव सुधिरंजन मोहंती को नौ वर्ष तक पदोन्नित नहीं मिली। सरकार ने हमारी खोजपूर्ण रिपोर्ट की सच्चाई की गहराई में जाकर अन्वेेषण किया तो बड़े बड़े उद्योगपतियों के चूल्हे भी हिले थे। खैर यह श्रेय राष्ट्रीय हिंदी मेल ने कभी लिया भी नहीं परंतु ये तो मीडिया के दोस्तों का कमाल था जो सबने सबको बता दिया था और हम चर्चित हो गए। परंतु एकमात्र उदाहरण का जिक्र इसलिए क्योंकि 24 वर्षों के सफर में कांटे तो मिले बहुत परंतु जुझारू पत्रकार साथियों ने राष्ट्रीय हिंदी मेल के पाठकों का, नौकरशाहों का, राजनीतिक हस्तियों का और पुलिसवालों में चुनिंदे ईमानदार अधिकारियों के सहयोग से संंबल जो मिला है, उससे उम्मीद करना गैरवाजिब नहीं होगा कि प्रकाशन यात्रा के 25वें साल का पड़ाव हमें पुन: आप सभी के सहयोग तथा प्यार से और आने वाली नई पीढ़ी के साथ प्रबंध संपादक पृथ्विजय कुमार दास के नेतृत्व में सच्चाई के करीब जाकर पत्रकारिता करने का अवसर हमेशा उपलब्ध कराता रहेगा, तथा कॉर्पोरेट जगत चुनौतियों से मुकाबला करने और आम जनता की आवाज बनने में नया इतिहास रचेगा, क्योंकि अब यह छोटा सा समाचार पत्र समूह पारिवारिक स्वामित्व का दैनिक अखबार बन गया है। न् 1973 की बात है, हम बमुश्किल बीएससी स्नातक की परीक्षा पास करके निकले ही थे कि मेरे पूज्य पिता स्व. महंत नरेन्द्र दास जी वैष्णव ने यह कहा कि तुम्हें चयन करना होगा विरासत या शरारत, तब मैंने शरारत इसलिए चुना क्योंकि मेरी शरारत में पत्रकारिता का जुनून था और वही जुनून राष्ट्रीय हिंदी मेल दैनिक समाचार पत्र के रूप में आज आपके सामने है। यह बात अपने उन हजारों पाठकों और नौकरशाहों तथा राजनीतिक पडिंतों के लिए लिख रहा हूं, ताकि वह यह जान सकें कि राष्ट्रीय हिंदी मेल किसी पूंजीपति घराने का समाचार पत्र नहीं है, इस समूह का जनक एक श्रमजीवी पत्रकार है, जो एक आम आदमी के हमदर्द नौकरशाह स्वर्गीय आरसी नरोन्हा की प्रेरणा से भोपाल में पत्रकारिता करने आया, और राष्ट्रीय हिन्दी मेल स्थापित करने में किसी और का नहीं, उन्हीं पत्रकारों का योगदान है जिन्होंने पत्रकारिता में इसलिए कदम रखा था, क्योंकि उन्हें भी इस जुनून ने पत्रकार बनाया था। आज उन सभी सरस्वती पुत्रों को, जो मुझसे उम्र में बड़े हैं और जीवित हैं, उन्हें प्रणाम करता हूं और जो जीवित नहीं हैं उन्हें मेरा विनम्र श्रद्धासुमन अर्पित हैं। जीवित पत्रकारों में श्री विजयदत्त श्रीधर को सबसे पहले प्रणाम, उन्होंने ही राष्ट्रीय हिंदी मेल दैनिक समाचार पत्र समूह की बुनियाद रखी थी, मैंने ऐसा जुनून आज तक किसी पत्रकार में नहीं देखा, श्री श्रीधर जी ने राष्ट्रीय हिंदी मेल की आधार शिला रखते समय जो दुस्साहस का परिचय दिया था, वही मेरे जैसे साधारण पत्रकार के लिए आज का मील का पत्थर बन गया है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने की कसक अभी बाकी है, क्योंकि हमने मील का पत्थर ही नहीं देखा। राष्ट्रीय हिंदी मेल जब हिंदी मेल के रूप में पाक्षिक समाचार पत्र था, उसके प्रथम संपादक रहे स्व. शिवप्रसाद मुफलिस जी को प्रणाम करते हुए मध्यप्रदेश की राजनीतिक डायरी के लेखक प्रसिद्ध ख्यातिनाम पत्रकार स्व. दाऊलाल साखी जी को नमन् करते हुए यह लिखने का साहस कर रहा हूं कि स्व. साखी जी ने राष्ट्रीय हिन्दी मेल के संपादक के रूप में मुझसे कहा था विजय दास तुम तो समाजवादी विचारधारा की कोख में जन्मे पत्रकार हो, मुझे विश्वास है कि यह राष्ट्रीय हिंदी मेल किसी दिन मप्र का सर्वाधिक चर्चित अखबार जरूर बनेगा। स्व. यशवंत अरगरे एवं एक वर्ष हमारे समूह में अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान मेल के संपादक रह चुके श्री लज्जाशंकर हरदेनिया को भी प्रणाम। कुछ समय के लिए स्व. राजेंद्र नूतन फिर श्री गोपाल जोशी हमारे साथ रहे और पंकज पाठक के संपादक बन कर आते-आते राष्ट्रीय हिंदी मेल सचमुच में एक चर्चित अखबार इसलिए बना क्योंकि इसकी बुनियाद में जांबाज पत्रकार स्व. सिद्धार्थ खरे और आज भी पत्रकारिता जगत के धुरंधर अजीत सिंह, धनंजय प्रताप सिंह, रवि भोई, चंद्रभान सोलंकी, ज्ञानेश उपाध्याय, रवींद्र जैन तथा मलय बैनर्जी का नाम अंकित हो चुका है। यूं कहा जाए कि राष्ट्रीय हिंदी मेल के फाउंडेशन में भी बुनियादी ईंटों को पत्रकारों ने ही लगाया था, इसलिए राष्ट्रीय हिंदी मेल हिंदी पत्रकारिता का एक छोटा समूह जरूर है, जिसने शक्तिशाली लोगों की इमारतों को ध्वस्त करने में भले ही सफलता हासिल नहीं की हो, यह अलग बात है परन्तु यह कहने में संकोच नहीं है कि शक्तिशाली लोग राष्ट्रीय हिन्दी मेल दफ्तर में आकर जब खबरों के साथ मिलते है तो कहते है चाय अच्छी थी। लेकिन सच के नजदीक आकर पत्रकारिता करने में राष्ट्रीय हिन्दी मेल बड़ा है। यह लिखने में मुझे संकोच नहीं है, क्योंकि हम 24 वर्षों का एक लंबा सफर तय करके आपके सामने इसलिए खड़े हैं क्योंकि मंजिल तक पहुंचने के लिए हमने कभी मील का पत्थर देखा ही नहीं, और यही हमारी हिंदी पत्रकारिता का जुनून रहा है। आज यह लिखते हुए मैं मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को धन्यवाद देना चाहता हूं क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में जब आज ही के दिन अर्थात 26 अक्टूबर 1996 को राष्ट्रीय हिंदी मेल का लोकार्पण किया था, तब यह कहकर हमारे सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ाकर दिया कि विजय दास जी मेरे 20 वर्ष पुराने मित्र हैं, मैं उन्हें हताश या निराश नहीं करना चाहता परंतु यह बताना चाहता हूं कि दिग्विजय सिंह ने जिन-जिन अखबारों का लोकार्पण किया है, वे अखबार साधनों के अभाव में या तो चल नहीं पाए या फिर बंद हो गए। दिग्विजय सिंह के इन्हीं शब्दों ने हमें दुस्साहस का साथी बना दिया और हम चल पड़े अकेले तो थे नहीं, कलम के सिपाहियों की ताकत थी और कारवां बन गया। दोस्तों विश्वसनीयता के संकट से जूझते आज प्रिंट मीडिया का समय शायद समाचार पत्रों के मालिकों के विश्वास को कमजोर कर सकता है और हम तो पूंजीपति नहीं हैं, इसलिए हो सकता है कारवां थक जाए परंतु हम यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि राष्ट्रीय हिंदी मेल का कारवां रूकेगा नहीं, क्योंकि हम लोकनायक जयप्रकाश नारायण तथा डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों की कोख से राष्ट्रीय हिंदी मेल को निकालकर अखबार चलाने के लिए पत्रकारिता जगत में कदम रखा है, इसलिए बेईमान नौकरशाहों के खिलाफ लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी, अंजाम यहां तक पहुंचा कि औद्योगिक विकास निगम में आईसीडी का 400 करोड़ का घोटाला करने वाले एमपी राजन को नौकरी छोडऩी पड़ी और पूर्व मुख्य सचिव सुधिरंजन मोहंती को नौ वर्ष तक पदोन्नित नहीं मिली। सरकार ने हमारी खोजपूर्ण रिपोर्ट की सच्चाई की गहराई में जाकर अन्वेेषण किया तो बड़े बड़े उद्योगपतियों के चूल्हे भी हिले थे। खैर यह श्रेय राष्ट्रीय हिंदी मेल ने कभी लिया भी नहीं परंतु ये तो मीडिया के दोस्तों का कमाल था जो सबने सबको बता दिया था और हम चर्चित हो गए। परंतु एकमात्र उदाहरण का जिक्र इसलिए क्योंकि 24 वर्षों के सफर में कांटे तो मिले बहुत परंतु जुझारू पत्रकार साथियों ने राष्ट्रीय हिंदी मेल के पाठकों का, नौकरशाहों का, राजनीतिक हस्तियों का और पुलिसवालों में चुनिंदे ईमानदार अधिकारियों के सहयोग से संंबल जो मिला है, उससे उम्मीद करना गैरवाजिब नहीं होगा कि प्रकाशन यात्रा के 25वें साल का पड़ाव हमें पुन: आप सभी के सहयोग तथा प्यार से और आने वाली नई पीढ़ी के साथ प्रबंध संपादक पृथ्विजय कुमार दास के नेतृत्व में सच्चाई के करीब जाकर पत्रकारिता करने का अवसर हमेशा उपलब्ध कराता रहेगा, तथा कॉर्पोरेट जगत चुनौतियों से मुकाबला करने और आम जनता की आवाज बनने में नया इतिहास रचेगा, क्योंकि अब यह छोटा सा समाचार पत्र समूह पारिवारिक स्वामित्व का दैनिक अखबार बन गया है।