शिवराज को मौका दो कमलनाथ को चौंका दो…

मध्यप्रदेश का विकास चाहिए : 68 प्रतिशत लोगों की राय, इसलिए अब कहने लगे

बड़ा मलहरा से
विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास
मो.9617565371

मध्यप्रदेश के 28 विधानसभा उपचुनावों को लेकर राष्ट्रीय हिंदी मेल टीम ने चुनाव घोषणा होने के बाद से लेकर आाज की तरीख तक जितने भी ऑकलन और सर्वे किए उसमें मतदाताओं के रूझान का उतार-चढ़ाव बहुत देखा। प्रचार अभियान के शुरूआत में ऐसा लग रहा था कि मप्र की 28 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में कोरोना संक्रमण की वजह से आम जनता में कोई खास उत्साह नहीं रहेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राष्ट्रीय हिंदी मेल की टीम ने 26 विधानसभा क्षेत्रों में ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट तैयार की है, लेकिन यह वाक्या चौंकाने वाला है कि चुनाव अभियान के शुरूआती दौर में महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया का राजनैतिक ग्राफ 88 प्रतिशत के आसपास था, मतलब वहां की जनता महाराज को ही अपना सब कुछ समझ बैठी थी। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव अभियान परवान चढऩे लगा, वैसे-वैसे ही महाराजा के ग्राफ में तेजी से गिरावट दिखाई देने लगी, जिसकी वजह वे खुद नहीं थे, बल्कि उनके 16 समर्थक भाजपा के उम्मीदवार थे, जिन्होंने प्रचार अभियान में अमर्यादित भाषाओं का जमकर इस्तेमाल भी किया और महाराजा कुछ समय के लिए अपने आप को असहाय की मुद्रा में सफलता के लिए रास्ता ढूंढते भी नजर आए। जब यह सूचना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक पहुंची और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने महसूस किया कि मप्र में भाजपा के कुछ नेता सिंधिया के बढ़ते प्रभाव से असहज होते जा रहे हैं, तब फरमान जारी हुआ। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को तथा केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा, गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा, कृृषि मंत्री कमल पटेल, नगरीय विकास मंत्री भूपेंद्र सिंह अपने-अपने घरों से बाहर निकले और ग्वालियर-चंबल की हर सीट पर जाएं, हुआ भी वही। कमल पटेल को मालवा-निमाड़ भेजा गया तथा बाकी नेताओं ने ग्वालियर-चंबल संभाग में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का मुकाबला करने के लिए ईंट से ईंट बजा दी। सिंधिया का ग्राफ जो 88 प्रतिशत से 43 प्रतिशत पर पहुंच गया था, वह फिर से वापस अब 58 प्रतिशत पर आकर टिक गया है। इसके बावजूद भी हमारी टीम ग्वालियर-चंबल संभाग में सभी 16 उम्मीदवारों को सफल होते नहीं देख पा रही है। एक अनुमान के हिसाब से 16 सीटों पर भाजपा और कांग्रेस में 55 और 45 का अंतर जान पड़ता है फिर भी ग्वालियर-चंबल की 8 सीटें प्रद्युम्न सिंह तोमर, मुन्नालाल गोयल, ओपीएस भदौरिया, एदल सिंह कंसाना, गिर्राज डंडौतिया, सुरेश धाकड़, इमरती देवी और जजपाल सिंह जज्जी-इन 8 उम्मीदवारों को सिंधिया के बढ़े हुए ग्राफ का फायदा मिल सकता है, जबकि 4 उम्मीदवार ऐसे हैं, जो पूरी तरह नरोत्तम मिश्रा और वीडी शर्मा के आभा मंडल की वजह से जातिगत गणित का फायदा उठाएंगे, लेकिन यहां पर टक्कर बराबरी की है। जौरा विधानसभा क्षेत्र में युवा मतदाताओं में 100 में से 28 लोगों का कहना है कि वे भाषणों से अब ऊब गए हैं, उन्हें तो ऐसी सरकार चाहिए जो स्थाई हो, इसलिए वे कहने से नहीं चूकते, फिलहाल शिवराज की सरकार रहना चाहिए। ग्वालियर-चंबल संभाग में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के सक्रिय होने का असर ब्यावरा की एक सीट पर कांग्रेस को फायदा तो पहुंच रहा है, लेकिन पास की दूसरी सीट बमौरी में कांग्रेस को नुकसान होगा। आज शाम 5 बजे तक राष्ट्रीय हिंदी मेल टीम की तहकीकात सच्चाई के नजदीक जाकर भाजपा के नरेंद्र तोमर, नरोत्तम मिश्रा, वीडी शर्मा द्वारा खुला समर्थन मिलने के बाद 9 विधानसभा क्षेत्रों में सफल होने का अनुमान है क्योंकि इन 9 विधानसभा क्षेत्रों में महाराजा सिंधिया और शिवराज का अंडर करेंट भी महसूस किया गया है। लेेकिन यह वाक्या चौंकाने वाला भी है कि ज्योतिरादित्य के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने विरोधियों की फौज भी खड़ी करने में सफलता हासिल की है। इसलिए पिछले 4 दिनों से ज्योतिरादित्य सिंधिया के आचरण में जो बदलाव आया है, उसका असर भी यह है कि जिन सीटों पर कांटे की टक्कर थी, वहां पर सिंधिया और शिवराज की केमेस्ट्री की वजह से कांग्रेस-भाजपा बराबर की स्थिति में पहुंच गए हैं। यूं कहा जाए कि भाजपा में सामूहिक नेतृत्व का लाभ उठाने की कोशिश भाजपा के लिए एक अच्छी पहल साबित हो सकती है। इसी के चलते भाजपा ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अब पूरी तरह मुखौटा बना दिया है। इसके बावजूद ग्वालियर-चंबल संभाग में मात्र 10 सीटें ऐसी हैं, जिसमें भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया है। बाकी 4 सीटों पर कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ अकेले का प्रदर्शन कामयाबी की ओर है। एक सीट पर दिग्विजय सिंह और एक सीट पर बसपा ने दम दिखाया है, जहां तक सवाल है कि ग्वालियर-चंबल संभाग को छोड़कर अन्य 12 सीटों पर तो यहां का मिजाज अजीबोगरीब है। 50 प्रतिशत लोग खुलकर कह रहे हैं कमलनाथ को वापस आने दो, लेकिन 50 प्रतिशत ऐसा वर्ग है, जो साफ-साफ कहता है यदि मप्र का विकास देखना है तो मप्र की सरकार और केंद्र की सरकार दोनों एक दल की होनी चाहिए। रायसेन जिले की विधानसभा क्षेत्र सांची और सागर जिले की विधानसभा क्षेत्र सुरखी दोनों में मतदाताओं का स्वर एक समान है। 60 प्रतिशत मतदाता कहते हैं शिवराज को मौका दो, कमलनाथ को चौंका दो, मतलब 100 में से 60 बुजुर्ग मतदाताओं का मत है कि शिवराज की सरकार को परमानेंट कर दो नहीं तो फिर से चुनाव का कोहराम झेलना पड़ेगा। राष्ट्रीय हिंदी मेल की टीम का 26 विधानसभा क्षेत्रों में अलग-अलग दौरे करने के बाद जब हम सागर से सांची पहुंचे हैं, तब पर्यटन के होटल में बैठकर यह खबर लिखते हुए संजीदा हैं कि 10 तारीख को चुनाव परिणाम शिवराज सरकार को परमानेंट करने का परिणाम दे सकता है। अनुमान कितना भी गलत होगा तो भी शिवराज-सिंधिया की जोड़ी 28 में से 14 सीटों के करीब सबसे ज्यादा है, जबकि 14 अन्य सीटों पर कमलनाथ-दिग्विजय दोनों मिलकर कोई बड़ा कमाल नहीं कर रहे हैं। इसके बावजूद भी जनता कहती है कि विपक्ष भी मजबूत होना चाहिए। इस विशेष रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह है कि मप्र का विकास चाहने वाले लोगों की संख्या बाहर से कितना भी आक्रोश दिखाए लेकिन अंदर ही अंदर यह कह रही है कि शिवराज को मौका दो, कमलनाथ को चौंका दो। मतलब स्पष्ट है कि आंधी-तूफान आया या फिर आसमान फटा, तभी कमलनाथ सरकार बना पाएंगे, वरना मतदान के पहले मतदाताओं से जो सुगंध मिल रही है, उसमें शिवराज-महाराज का ही फ्लेवर फाइनल है।

विशेष रिपोर्ट के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।