कमलनाथ के लिए वाटर लू, शिवराज-महाराज को स्काई ब्लू

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास
मो.9617565371

मध्यप्रदेश में आज संपन्न हुए 28 विधानसभा उपचुनावों के मतदान में उत्साह का अभूतपूर्व नजारा दो बातें लिखने से हमें नहीं रोक पा रहा है। पहली बात तो यह है कि जिस तरह नेपोलियन बोनापार्ट एक बुद्धिमान प्रशासक होते हुए फ्रांस की अपनी अंतिम लड़ाई जिसे उसने ‘वाटर लूÓ मैदान में लड़ा था, इसलिए हार गया था क्योंकि अपनी सेना में किसी की सलाह पर विश्वास ही नहीं करता था। परन्तु आदमी कितना भी तावतवर हो, कोई न कोई गलती अवश्य करता है। वाटर लू मैदान में 1815 में जो हस्र नेपोलियन बोनापार्ट का हुआ, वैसा तो मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का नहीं होने वाला है, परन्तु वाटर लू की तरह हार का सामना उन्हें करना पड़ सकता है। क्योंकि उनके भाषण में इमरती देवी को आइटम कहना और कांग्रेस नेता द्वारा शिवराज को भूखा,नंगा कहना सबसे बड़ी गलती थी। यह बात अवश्य है कि मध्यप्रदेश में सेंट हेलेना की जेल नहीं बनी, जहां कमलनाथ को चुनाव हारने के बाद कैद किया जाएगा। और यहां के लोकतंत्र में अब संभव भी नहीं है, क्योंकि 3 वर्ष के बाद दृश्य बदल जाए और यह मध्यप्रदेश का नेपोलियन बोनापार्ट फिर से युद्ध के लिए खड़ा हो जाए, कौन जानता है। इसलिए इस विशेष संपादकीय में पहली बात का स्पष्ट अर्थ यह है कि मध्यप्रदेश के इन 28 विधानसभा के उप चुनावों ने कमलनाथ को नेपोलियन बोनापार्ट की भूमिका में अनायास खड़ा कर दिया है, जबकि वे ऐसे नहीं थे। अनुभवी प्रशासक, लम्बा राजनीतिक 50 वर्षों का अनुभव क्या नहीं है कमलनाथ के पास, बस सिर्फ एक बात की कमी समझ में सबको यही आई कि मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा का राज उन्हें जब सौंपा था, उसी दिन से उन्होंने सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में कब्जा करने का फैसाला तो किया, परन्तु कांग्रेस की सेना को अपने साथ नहीं रखा, यहीं से पराभव का दृश्य उनकी इस सोच में सखा दिग्विजय ङ्क्षसह के तड़के के साथ शुरू हो गया, जो आज जनता द्वारा मतदान के समय में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने के साथ इस लोकतंत्र के स्वच्छ मैदान को कमलनाथ के लिये वाटर लू का मैदान बना दिया है। हम यह नहीं कहते, न ही सोचते कि यदि कमलनाथ के लिए 28 विधानसभा के उप चुनाव वाटर लू का मैदान साबित हुआ तो वे राजनीति करने लायक नहीं रहेंगे। हम तो इसके उलट यह लिखने को तैयार हैं कि इस हार से मायूस होने की जरूरत नहीं, वक्त फिर लौटेगा यदि कमलनाथ जी ने नेपोलियन बोनापार्ट के चरित्र में डूबे हुए अपने अहंकार को त्यागकर उन सब को अपना लिया, जो उनके अपने नहीं बल्कि जिस दल का वे नमक 50 वर्षों से खा रहे हैं, उनके सिपाही सोचते हैं। विधायकों को प्यार से, विश्वास से पुकारें, असली नारद मुनियों के साथ समय गुजारें, अन्यथा 1815 के वाटर लू को तो नई पीढ़ी नहीं जानती परन्तु इस वाटर लू को आने वाली पीढ़ी कम से कम 10 वर्ष तक नहीं भूल पाएगी, जो बेरोजगारी का दंश झेलते हुए जब सुबह उठता है तो वह कहता है आज किसे कोसें कमलनाथ को या शिवराज को, क्योंकि उसके सामने दोनों बराबर हैं, परन्तु कमलनाथ को वह ज्यादा दोषी मानता है, क्योंकि कमलनाथ ने सत्ता में आने के लिए बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता का लालच वचन पत्र में दिया और भूल गए, और मीडिया को अंडर इस्टिमेट कर बैठे। कमलनाथ यही 32 लाख युवा बेरोजगारों ने 28 विधानसभा के उप चुनावों को वाटर लू का मैदान बनाया है, ऐसा कहा जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। रहा सवाल हमारी दूसरी बात का जिसमें हमें यह लिखने में संकोच नहीं है कि शिवराज-महाराज की जोड़ी ने 28 विधानसभा के इन उप चुनावों को गद्दारी और बिकाऊ के भयंकर काले बादलों के टेग पर लड़ा, जबकि वे जानते थे बिके हुए विधायक तो कांग्रेस के ही थे तो भाजपा यहां दोषी नहीं, परन्तु गद्दार और बिकाऊ वाला आरोप जिसमें टाइगर, कुत्ता, कौवा सब को आना पड़ा। इनका बचना जरा मुश्किल ही था, हार, पराजय की गंध भी नजदीक आ गई थी। परन्तु आखरी-आखरी में जब उन्हें पता चला कि उन्हें जनता को टिकाऊ सरकार चाहिए तो उन्होंने मुद्दों पर बात शुरू कर दी। यही कारण था कि इधर मुद्दों पर बात शुरू हो गई, जनता से विकास की मांग भी बढ़ी, मुफ्त में बिजली का असर, किसानों के दु:ख-दर्द में साथी बनने का परचम, बेरोजगारों का साधने का क्रम, तथा शिवराज का संबल मतदाताओं को सच्चाई के करीब ले जाने की कवायद, सहजता से घुटने टेक-टेककर जनता को नमन्, सिंधिया का महाराज की ख्याति त्यागकर आम जनता से गले मिलना, भाजपा के पांच पांडवों, नरेन्द्र तोमर, नरोत्तम मिश्रा, वीडी शर्मा, कमल पटेल, भूपेन्द्र सिंह का दो-दो सीटों पर व्यक्तिगत सम्पर्क अभियान ने तो बिकाऊ और गद्दारी के आरोपों से छाए काले बादल ही छांट दिए। यूं कहा जाए कि शिवराज-महाराज के लिए इन 28 विधानासभा उप चुनावों में उपरोक्त पांचों पांडवों ने घने कोहरे, काले बादलों का टेग हटाकर बादलों को पूरी तरह साफ करने की कोशिशों में कामयाबी हासिल की है तो किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। और तो और यदि कहां जाये कि ये 28 विधानसभा के उप चुनावों में यदि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए मध्यप्रदेश के 19 जिले वाटर लू का मैदान बन गए और शिवराज-महाराज के लिए ‘स्काई ब्लूÓ की तरह खुला आकाश बन गया, जिसमें शिवराज सरकार खुलकर सांसें 2023 तक ले सकती है, तो इस विशेष संपादकीय से किसी को नाराज या खुश नहीं होना चाहिए, क्योंकि आज का मतदान कहता है कमलनाथ प्रभाव से मुक्त, भाजपा दबाव से मुक्त और सिंधिया तनाव से मुक्त हो गए हैं।

विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।