कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के लिए लड़ा था चुनाव

कांग्रेस के लिए नहीं, इसलिए पराजय नजदीक

शिवराज- महाराज ने लड़ा भाजपा के लिए…

ग्वालियर से विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास
मो.9617565371

ध्यप्रदेश में 28 विधानसभा के उप चुनावों में कांग्रेस के कमलनाथ ने मध्यप्रदेश का दोबारा मुख्यमंत्री बनने के लिये ही चुनाव लड़ा था, उन्होंने कांग्रेस के लिये चुनाव नहीं लड़ा। यदि कमलनाथ कांग्रेस के लिये चुनाव लड़ते तो उनकी पराज्य की संभावना कम थी लेकिन ग्वालियर-चंबल संभाग में कांग्रेस के हर उम्मीदवार के खिलाफ इसी लिये नाराजगी है क्योंकि कमलनाथ ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के ऊपर गद्दार होने का और विधायकों पर बिकाऊ होने का आरोप लगाया। लेकिन टिकट बांटते समय कमलनाथ ने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि जो काम ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम पर 22 विधायकों ने किया था वहीं काम कमलनाथ के नाम पर भाजपा से आये 8 उम्मीदवारों ने किया और एैसी 8 सीटें जहां पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के नाते कमलनाथ ने भाजपा से आयातित उम्मीदवारों को कांग्रेस की टिकट दे दी वहां बंटाधार हो गया। राष्ट्रीय हिन्दी मेल के इस प्रतिनिधि ने ग्वालियर-चंबल संभाग में ही उन सीटों का आंकलन किया जहां पर कांग्रेस से आये 22 विधायक में से 16 विधायकों ने जिनमें कई मंत्री भी है भाजपा के दल से चुनाव लड़ गये और उनकी तैयारी उसी दिन से शुरू हो गई थी जिस दिन से उन्होंने महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस का दामन दिविजय के कारण छोड़ा था। यह लिखने में गुरेज नहीं है कि जिन भाजपा के उम्मीदवारों के उपर गद्दार और बिकऊ होने का टेग लगा हुआ था वहीं भाजपा से आये कांग्रेस उम्मीदवारों ने उस टेग की धुलाई कर दी। जब भाजपा का उम्मीदवार गांव में वोट मांगने गया तो कुछ समय के लिये नाराजगी मतदाताओं की उन्हें मिली लेकिन जब भाजपा के उम्मीदवारों ने यह समझाने में सफलता हासिल की कि कांग्रेस का उम्मीदवार तो भाजपा से खरीदा गया है तो गद्दार कौन है उनके इस जवाब से संतुष्ट होकर ग्वालियर-चंबल संभाग के विधानसभा क्षेत्रों में ऐसे 9 विधानसभा क्षेत्र है जहां पर भाजपा के उम्मीदवारों को दो प्रकार के लाभ हुये पहला तो यह कि हम गद्दा नहीं है, हम तो विकास करना चाहते हैं इस बात को जनता ने मान लिया दूसरी और कांग्रेस के उम्मीदवार से पूछा गया कि भैया तुम भी तो इधर बिकाऊ बनकर आये हो तुम्हारे पास क्या जवाब है तो कांग्रेस का उम्मीदवार उत्तर देने की स्थिति में इसलिये नहीं था क्योंकि कोई पुराना कांग्रेसी कांग्रेस के उम्मीदवार के साथ खड़ा ही नहीं था। कांग्रेस के पुराने नेताओं का कहना है कि कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के लिये चुनाव लड़ा था कांग्रेस के लिये नहीं। यदि कांग्रेस के लिये कमलनाथ चुनाव लड़ते तो पुराने कांग्रेसियों को पहले टिकट देते और जीत निश्चित होती, लेकिन उन्होंने एैसा नहीं किया। भाजपा से आये लोगों को सबसे बड़ा कांग्र्रेसी मान लिया और उन लोगों को पीछे धकेल दिया जिन लोगों ने 50 वर्षों से ज्यादा सिंधिया परिवार के खिलाफ लड़ाई लड़ी और यह बात ना तो कमलनाथ को समझ में आई और दिग्विजय सिंह को। उदाहरण के बतोर यदि आप दतिया जिले की भांडेर सीट की बात करें तो वहां पर पूर्व गृह मंत्री महेन्द्र बौद्ध के अलावा किसी भी कांग्रेस नेता का साफ-सुथरा जलवा नहीं है महेन्द्र बौद्ध ने कमलनाथ से कहा था कि मैरा कसूर बताईये 6 बार कांग्रेस ने मैरी टिकट काटी इस बार तो मैरा जितना तय था लेकिन बाहर आदमी फूलसिंह बरैया को दिग्विजय सिंह के कहने पर इसलिये टिकट दे दिया क्योंकि मैरे साथ सुरेश पचौरी का ठप्पा लगा था। महेन्द्र बौद्ध ने कहा जिस दिन कांग्रेस की टिकट डिकलियर हुई उस दिन दिग्विजय सिंह के स्वागत में हमने हजार लोगों को बुलाया, खाना खिलाया और आम्बेडकर की मूर्ति का अनावरण कराया और एक घंटे बाद ही हमारी टिकट कट गई और दिग्विजय सिंह दतिया से ठहाके लगाते हुये निकल गये यह कहते हुये महेन्द्र बौद्ध के लिये मैं कुछ करूंगा। महेन्द्र बौद्ध का कहना है कांगे्रस का मैदानी कार्यकर्ता या समर्पित नेता या मैरे जैसा जुझारू जिसकी पत्नी जिला पंचायत की सदस्य, जिसकी बैटी जिला पंचायत की सदस्य पूरे जिले में कांग्रेस का परचम लहराने वाला में अकेला आदमी कमलनाथ जी ने निपटा दिया और यह सीट मैरी वजह से भाजपा के खाते में चली गई क्योंकि मैं बसपा का उम्मीदवार बना। एैसे कई उदाहरण देखने को मिले ग्वालियर-चंबल संभाग में जहां भाजपा से आयातित कांग्रेस के उम्मीदवारों ने कांग्रेस का ही काम लगा दिया। इसमें मुन्ना लाल गोयल वाली सीट भाजपा इस लिये जीतेगी क्योंकि सतीश सिकरवार भाजपा से कांग्रेस में गये थे इसलिये वहां पुराने कांग्रेसी नाराज थे। ठिक इसी तरह इमरती देवी का विधानसभा क्षेत्र जहां पर भाजपा से आये कांग्रेस उम्मीदवार ने कांग्रेस का नुकसान पहुंचा। इससे आगे यदि चले तो बमौरी में कांग्रेस कन्हैयालाल अग्रवाल के कारण हारेगी एैसे संकेत है कुछ सीटों पर जहां ग्वलियर-चंबल संभाग में कांग्रेस ने जानबुझकर कमजोर उम्मीदवार उतार दिया एैसी एक सीट है जिसे जौरा विधानसभा क्षेत्र में पुराने कांग्रेसियों से बीना पूछे कांग्रेस ने गवा दी। सहीं हाल मालवा-निमाड़ और बुन्देलखंड में भी था गोविन्द सिंह राजपूत को हराने के लिये सुरखी में साहब ने भाजपा के पारूल साहू को बुला लिया इस लिये यह सीट कांग्रेस को मिलते-मिलते चली गई बताते हैं और इसी तरह कांग्रेस ने सांवेर विधानसभा क्षेत्र में अपनी पकी पकाई सीट को तुलसीराम सिलावट को थाली में परोस कर दे दिया। इन सभी उदाहरणों का एक ही मतलब है की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया मिलकर भारतीय जनता पार्टी के लिये चुनाव लड़ा और कांग्रेस से आये महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने आपको तैयार कर लिया कि उन्हें केवल भाजपा के लिये ही वोट मांगना है सिंधिया वैसा ही करते नजर आये सिंधिया का असर यदि निमच में हरदीप डंग के पास पहुंचा तो अनुपपूर में बिसाहूलाल की नैया पार हो गई। इस विशेष रिपोर्ट का लब्बो लुआब यह है कि यदि कमलनाथ मुख्यमंत्री बनने के लिये चुनाव लडऩे की बजाय कांग्रसे के लिये चुनाव लड़ते तो वे संभावनाओं के नजदीक होते लेकिन कमलनाथ ने 28 विधानसभा क्षेत्रों का समूचा चुनाव किसी कंपनी के सीओ के तरह लड़ा। खैर जो कुछ हुआ परिणाम कल निकल जायेंगे, लेकिन राजनीतिक अर्मादाओं ने जो सीमा लांघी है अब उससे सब को वापस लौटना पड़ेगा ताकि नकुलनाथ, जयवद्र्धन, महाआर्यमन और कार्तिकेय सिंह की पीढ़ी को इस बात का अहसास हो जाये कि पार्टी ही सर्वोपरि है। कमलनाथ के बारे में एैसा लिखना एक दु्रस्साहसिक पत्रकार होने का प्रणाम हो सकता है। लेकिन सच यही है कि 8 सीटें भाजपा को सिर्फ वे ही मिल रहे हैं जहां पर भाजपा से जाकर लोगों ने कांग्रेस का टिकट झटक लिया। और सात सीटें एैसी है जहां पर कमलनाथ द्वारा कमजोर उम्मीदवारों का चयन, पुराने समर्पित कांग्रेसियों की उपेक्षा कमलनाथ को पराज्य के नजदीक ले जा रहा है। यह तो 10 तारीख के परिणाम के बाद पता चलेगा कि मध्यप्रदश्ेा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके सखा ज्योतिरादित्य सिंधिया के मुकाबले में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की गठजोड़ राजनीति ने क्या गुल खिलाया है लेकिन खबर की सच्चाई यह है कि कमलनाथ ने अपने आपको दूसरी बार मुख्यमंत्री बनाने के लिये चुनाव लड़ा तो कांग्रेस हासिये पर चली गई है।
विशेष रिपोर्ट के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।