शाबास जनता : विकास जीता, पाखंड हारा

ग्वालियर से
विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास
मो.9617565371

मप्र में 28 विधानसभा उपचुनाव के परिणामों ने आज यह साबित कर दिया है कि जनता को भाषणों से बहलाया-टहलाया जा सकता है, लेकिन मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने जनता को जो समझाने की कोशिश की थी उसे 28 विधानसभा क्षेत्रों सहित मप्र की जनता ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। राष्ट्रीय हिंदी मेल के इस प्रतिनिधि ने पूरे चुनाव के दौरान 18 दिनों तक 26 विधानसभा क्षेत्रों में गांव-गांव तक जाकर यह पता लगाने की कोशिश की थी कि कमलनाथ की सरकार का तख्ता पलट कर ग्वालियर चंबल संभाग के महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शिवराज सिंह चौहान को चौथी बार मुख्यमंत्री बनवाकर भाजपा की सरकार बनाई तो इसमें सौदेबाजी की कौन सी बात थी। भांडेर, मेहगांव, सुरखी, ग्वालियर, मांधाता, पोहरी तथा बाद में सांची ऐसे विधानसभा क्षेत्र थे जहां पर आम जनता यह कहने से नहीं चूकती थी कि मप्र में पाखंड की राजनीति को इन चुनावों में हराया जाएगा। हम तो कई बार यह सुनकर चौंक जाते थे कि आखिर पाखंड की राजनीति कहां से अवतरित हुई है। तो कुछ लोगों ने इस सवाल के जवाब में कहा कि किसी एक व्यक्ति को मात्र राज्यसभा में जाने के लिए पूरी पार्टी को हासिए पर खड़ा कर देना, 15 वर्षों के बाद मिली सरकार को डुबा देना, हजारों लाखों कांग्रेस कार्यकर्ताओं के अरमानों का गला घोटना और फिर ठहाके लगाकर राजनीति करना इसे जनता ने पाखंड माना है यह काम जरूरी नहीं कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह या कमलनाथ ने ही किया होगा। हो सकता है ज्योतिरादित्य सिंधिया की हैसियत को कुत्ते की समाधी से जोडऩे जैसे अनर्गल बयान बाजी ने भी पाखंड परोसने में अहम भूमिका निभाई हो। और आज जब परिणाम आए हैं तो इसी मेहगांव में कांग्रेस उम्मीदवार का हारा हुआ चेहरा देखकर लोगों ने क्या -क्या खुलकर नहीं कहा, लोगों ने कहा राकेश चतुर्वेदी होते तो ओपीएस भदौरिया कहीं टिक नहीं पाते। कमलनाथ जी ने अजय सिंह के कहने पर इस सीट को जान बूझकर गंवाया। तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कहा यह भी तो पाखंड जैसा ही रवैया था जिसकी वजह से कांग्रेेस का कार्यकर्ता आज धराशायी हो गया। और जनता को बेवखूफ समझकर यह कहते पाए गए कि ब्र्राहमणों के वोट से कांग्रेस चुनाव जीत जाएगी, लेकिन ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि जनता ने यह समझने में देरी नहीं की कि पार्टी में आखिरी कील, आखिर जब ठोकी ही जा रही है तो क्यों न अपने महाराज को जिताया जाए। जनता ने यहां यह भी माना की महाराज की प्रतिष्ठा से बड़ी ग्वालियर चंबल संभाग में कोई प्रतिष्ठा नहीं है। इसलिये मैं ग्वालियर से यह रिपोर्ट लिखकर यह कहते हुये जा रहा हंू कि ‘जीत का जश्न छोड़कर जा रहा हंू हिस्सा बनने तभी आऊंगा जब, महाराज आप अतिथि शिक्षकों को नियमित करने के वायदे पर अमल करेंगेे, महाराज आपकों 16000 होमगार्ड के सैनिकों को भी पुलिस के आरक्षक के समान वेतनमान दिलाना होगा सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है, महाराज ब्यावरा जैसे 65000 की आबादी वाले कस्बे में 7 दिनों में पीने का पानी मिलता है इसकी समुचित योजना बनानी पड़ेगी ताकि 2023 आपके लिये सुरक्षित हो, और अंत में मध्यप्रदेश के बेरोजगारों ने कमलनाथ की सरकार से ठगा जाने का गुस्सा आपको जिताने में लगा दिया है यह सोचने का विषय है।Ó जहां तक सवाल है सौदेवाजी का, गद्दारी का, बिकाऊ जैसे आरोपों का तो पब्लिक यह जानती है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया यदि सौदेबाजी से भाजपा की सरकार बनाते तो सीधे मुख्यमंत्री बनकर आते लेकिन उन्होंने कोई शर्त नहीं रखी और कमलनाथ की भ्रष्टतम सरकार को जिसने बल्लभ भवन को दलालों का अड्डा बना दिया था विधायकों को अपमानित करने का एकसूत्रीय कार्यक्रम बना लिया था उस सरकार और पाखंड की राजनीति को समाप्त किया तो महाराज ने क्या बुरा किया। जिन विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस चुनाव जीत गई है वहां हमारा आज चुनावी दौरे का आखिरी पड़ाव था और इस क्षेत्र का नाम है ब्यावरा। मप्र के 10 साल मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह इसी क्षेत्र से चुने जाते रहे हैं, लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ब्यावरा में 65 हजार की आबादी को आज भी सात दिनों में एक बार पानी मिलता है और तो और जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे तब ब्यावरा के लोगों को 15 दिनों में पानी मिलता था। कल्पना कीजिए और जरा सोचिए इस इलाके में मुख्यमंत्री 10 वर्षों तक राज करते रहे वहां के लोग बूंद-बंूद पानी के लिये तरस्ते रहे। इसके बाद भी वे आज भी उन्हें मानते हैं इसलिए कि कभी तो वक्त व्यावरा का भी आएगा लेकिन आज वे पछता रहे हैं कांग्रेस के उम्मीदवार को चुनाव जीताकर। क्योंकि उन्हें पता है कांग्रेस का उम्मीदवार ब्यावरा में पानी का इंतजाम नहीं कर पाएगा। इस प्रतिनिधि से आज लगभग अलग-अलग समूहों के समाजसेवियों ने मुलाकात की तो ब्यावरा में उन्होंने बताया कि ब्यावरा ऐसी जगह है जहां पर सभ्य परिवार के लोग अपनी लड़की देना इसलिए पसंद नहीं करते क्योंकि ना तो यहां पीने का पानी है और ना ही निस्तार का पानी। जरा सोचिए 65 हजार लोगों की जिंदगी बिना पानी के कैसे गुजरती होगी शिवराज सरकार ने कोशिशें की थी और अभी भी कोशिशें जारी हैं। जनता उम्मीद कर रही है कि ब्यावरा से भले ही कांग्रेस का उम्मीदवार जीता हो महाराज-शिवराज की सरकार यहां पानी का इंतजाम जरूर करेगी। खैर यह एक मुद्दा ऐसा है जिससे राष्ट्रीय हिंदी मेल यह स्थापित करना चाहता है कि 28 विधानसभा उपचुनावों के परिणामों में जनता ने चुनाव लड़ा तो भाजपा की तरफ से लड़ा और इसलिए लड़ा क्योंकि वह विकास के मुद्दे पर महाराज-शिवराज के साथ आगे बढऩा चाहती है। इसलिए भांडेर विधानसभा क्षेत्र के एक मतदाता ने जो बात कही है वह नोट करने लायक है। उसने कहा है कि पहली बार मप्र में पाखंड की हार हुई है और विकास के मुद्दे की जीत हुई है। इसलिए इस रिपोर्ट का लब्बो लुआब यह है कि कांग्रेस पार्टी यदि मुद्दों की राजनीति पर आगे बढ़ेगी तो फिर उसे मौका मिल सकता है। और जहां तक सवाल है शिवराज-महाराज की जीत और जश्न का तो यह लिखने में संकोच नहीं है कि जनता को विकास चाहिए बेरोजगारों को रोजगार चाहिए और यह काम नौकरशाही की निरंकुशता से संभव नहीं है। इसमें सुधार की बड़ी गुंजाइश है जो शिवराज-महाराज दोनों मिलकर करें तो परिणाम अच्छे होंगे और 2023 भी आपका होगा।
विशेष रिपोर्ट के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।