नैतिकता नहीं तो अनैतिकता पर सही कमलनाथ जी हटिए प्लीज…

विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास
मो.9617565371

मध्यप्रदेश की राजनीति में यह भी एक इतिहास होगा कि कांग्रेस छोड़कर महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में शामिल 22 विधायकों को पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ एवं दिग्विजय सिंह ने गद्दार और बिकाऊ कह-कह कर कोहराम मचा दिया और 28 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनावों के परिणाम आए तो गद्दार-बिकाऊ की तोहमत को जनता ने वोटों से इस तरह धोया, जैसे इस गद्दार और बिकाऊ होने का दाग राजनीति की साजिश का एक हिस्सा था। या यूं कहा जाए कि 28 विधानसभा उपचुनावों में जनता ने महाराजा-शिवराज की जोड़ी को गाली देने वालों के खिलाफ यह स्थापित कर दिया कि गद्दार-बिकाऊ वे नहीं, बकौल ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के दोनों बड़े नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ही गद्दार हैं। इसलिए जनता ने शिवराज-महाराज को जिताने के लिए बढ़-चढ़ कर मतदान भी किया। चुनाव परिणामों के बाद से सभी बड़े बयानवीरों के मुंह पर ताले डल गए हैं, परंतु कांग्रेस का मैदानी कार्यकर्ता मायूस हो गया है, उसे लगने लगा है कि अब आने वाले 10 वर्ष तक उन्हें फिर से डंडे खाने पड़ेंगे। खैर राजनीति स्थिर कभी नहीं होती, इसलिए कांग्रेस में भी बदलाव का एक दौर जल्दी आने वाला है। राष्ट्रीय हिन्दी मेल टीम का चुनाव परिणामों के बाद एक सामयिक सर्वेक्षण है जो चौंकाने वाला है। हमारे सर्वेक्षण में यह पता लगाने की कोशिश की गई है कि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का वजूद कांग्रेस के लिए कितना लाभकारी है। 40 प्रतिशत अराजनीतिक लेकिन कांग्रेस समर्थकों का कहना है, (इस वर्ग में सबसे ज्यादा युवा हैं) की नैतिकता के आधार पर तो कमलनाथ को दोनों पदों अर्थात प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। इस वर्ग ने तो यहां तक कहा कि वैसे भी कमलनाथ और दिग्विजय सिंह 75 के आस-पास पहुंच चुके हैं, उन्हें युवा पीढ़ी पर विश्वास करके नेतृत्व की दूसरी कतार तुरंत खड़ी कर देनी चाहिए। चाहे नर्मदा प्रसाद प्रजापति हों, या जीतू पटवारी हों, चाहे बाला बच्चन हों, या फिर तरुण भानोत- कांग्रेस में ऊर्जावान नेताओं की भरमार है, जो चाहते हैं कि कांग्रेस को नैतिकता के साथ वैकल्पिक राजनीति के लिए तैयार किया जाए। इनका मानना है कि नैतिकता यदि 5 दशकों से राजनीति में सत्ता का सुख भोगने वाले उपरोक्त दोनों नेताओं में नहीं होगी तो कांग्रेस को अंधेरे में रखने के लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के भीतर ‘टांग खींचनेÓ वाला कार्यक्रम आज ही चला है ऐसा नहीं, पहले भी चला। जब सुरेश पचौरी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे और 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनना तय था परंतु 72 निर्दलीय उम्मीदवारों ने कांग्रेस का 12 बजा दिया और तब कांग्रेस की सरकार नहीं बन पायी, परंतु पचौरी ने नैतिकता का बल दिखाने में एक पल नहीं गंवाया और अपने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे की तुरंत पेशकश हाईकमान के सामने रख दिया। इस तरह की नैतिकता कांग्रेस में हमेशा से कायम रही, लेकिन यह इतिहास बन गया कि कमलनाथ ने आज तक इस्तीफे की पेशकश तक नहीं की है। 40 प्रतिशत वर्ग ऐसे भी हैं जिन्हें अभी भी कमलनाथ-दिग्विजय की हल्दी गांठ पर भरोसा है, वे कहते हैं कांग्रेस में यदि इनका त्याग पत्र आया तो कांग्रेस नहीं बचेगी, इन्हें बने रहने दो। परंतु 20 प्रतिशत ऐसा भी वर्ग है, जिसे कड़वी बात कहने से परहेज नहीं है। वे कहते हैं नैतिकता गई भाड़ में, अनैतिकता पर ही सही, कमलनाथ जी हटिए तभी नए नेतृत्व को कांग्रेस मजबूत बनाने के लिए मौका मिलेगा। वरना 30 वर्ष का केन्द्र में सांसद और मंत्री का अनुभव, 2 वर्ष से अधिक पीसीसी अध्यक्ष का अनुभव, 15 महीने मुख्यमंत्री का पद, क्या नहीं दिया कांग्रेस हाईकमान ने आपको फिर भी हार गए तो अब स्वयं आगे आकर त्याग पत्र देने में शर्म किस बात की है। यह बात जरूर हो सकती है कि केन्द्र का नेतृत्व कमजोर है, इसलिए इस्तीफा जरूरी नहीं है। परंतु यह 20 प्रतिशत वर्ग ऐसा है, जो चाहता है कि विपक्षी भूमिका में कांग्रेस मजबूती से जनता की आवाज बने लेकिन जरूरी यह भी है अब दौडऩे वाले नेताओं को आगे लाया जाए, हांफने वाले को आराम करने दिया जाए। इस वर्ग ने यहां तक कहा है कि कांग्रेस नेता अपने-अपने पुत्र मोह से दूर रहेंगे तभी कांग्रेस का कल्याण संभव है, वरना माटी के गमले को हिमालय पर्वत में रखकर कोई शूरमा नहीं बनने वाला, इस बात को भी कांग्रेस के राहुल गांधी ने समझ लिया होगा। इस विशेष रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह है कि कांग्रेस के अंदर सुगबुगाहट तेज हो गई है। ‘कमलनाथ जी हटिए तो आगे बढ़ेगी कांग्रेस वरना 10 साल जय श्रीराम।Ó पार्टी की सेवा हनुमान भक्त सभी कांग्रसियों को करना पड़ेगा।
विशेष रिपोर्ट के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।