तमसो मा ज्योतिर्गमय

भारत में हिन्दुओं के इस सबसे खास त्यौहार को सभी धर्मों के लोग समान हर्षोल्लास से मनाते हैं। दीपावली को अंधकार पर प्रकाश की विजय के रूप में मनाया जाता है। दीपावली मर्यादा, सत्य, कर्म और सदभावना का सन्देश देता है, सबके साथ मिलकर मिठाई खाने से आपसी प्रेम को बढ़ाने का संदेश मिलता है तो नए कपड़ों में सजे नन्हें-नन्हें बच्चों को देख लगता है काश हम भी बच्चे होते। पटाखों और दीपों की रोशनी में नहाया वातावरण धरती पर आकाश के होने की गवाही देता नजर आता है। दीपावली शब्द से ही मालूम होता है दीपों का त्यौहार, इसका शाब्दिक अर्थ है दीपों की पंक्ति। ‘दीपÓ और ‘अवलीÓ की संधि से बने दीपावली में दीपों की चमक से अमावस्या की काली रात भी जगमगा उठती है, इसे दीपोत्सव भी कहते हैं, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमयÓ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइएÓ कथन को सार्थक करता है दीपावली। माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे, राजा राम के लौटने पर उनके राज्य में हर्ष की लहर दौड़ उठी थी और उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए। तब से आज तक यह दिन भारतीयों के लिए आस्था और रोशनी का त्यौहार बना हुआ है, इसे दीवाली भी कहते हैं, भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है, दीवाली यही चरितार्थ करती है। दीवाली मनाने के पिछे कई कहानियां हैं पर सब कहानियों से मिली सीख यही समझाती है कि असत्य की उम्र सत्य से कम होती है, कृष्ण के भक्तगण मानते हैं कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था, इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए और इसके साथ इसी दिन समुद्र मंथन के पश्चात लक्ष्मी व धनवंतरि प्रकट हुए थे, हिन्दुओं के साथ अन्य धर्मों के लिए भी यह दिन शुभ माना गया है, जैसे जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही है तो सिक्खों के लिए भी दीवाली महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। अर्थात हम कह सकते हैं कि दीपावली एक ऐसा त्यौहार है, जिसे सभी धर्म के लोग मिलजुल कर मनाते हैं।