सरकार पर भरोसा करिए, कोरोना को हराइए

मौत तो डराएगी, लेकिन यदि आप नहीं डरे तो जिंदगी मिलेगी दोबारा…

आपबीती
विजय कुमार दास
मो.9617565371

दोस्तों नमस्कार, मप्र में हजारों-हजार कोरोना मरीज हैं, लेकिन जिनकी इच्छा शक्ति प्रबल है, वे जंग जीत जाते हैं और जो डर जाते हैं या जिन्हें डरा दिया जाता है वे बेचारे हारकर मौत को गले लगाते हैं। मैं 69 वर्ष की उम्र के इस पड़ाव में पत्रकारिता के जुनून से अपने आपको उस समय रोक नहीं सका, जब मुझे मैदानी रिपोर्टिंग के लिए 18 दिन तक लगातार 28 विधानसभा क्षेत्रों के महासंग्राम को नजदीक से जाकर ही लिखना पड़ा। ईश्वर एवं मां सरस्वती की कृपा थी कि मेरे अनुमान सही निकले और एक योद्धा की तरह इस उम्र में अपने आप को युद्धवीर भी समझने लगा, लेकिन इसी बीच किसी भीड़भाड़ में कोरोना की चपेट में आ गया। दीपावली के दिन घर पहुंचा, दूसरे दिन तबियत खराब हुई अर्थात 15 नवम्बर की दोपहर शिवराज सरकार की स्वास्थ्य टीम ने आकर मेरे परिवार के सभी सदस्यों का कोरोना टेस्ट किया, मैं पॉजिटिव पाया गया। फिर होना क्या था, जिंदगी बचाने की जद्दोजहद घंटे भर बाद ही शुरू हो गई। राजधानी के 2-3 बड़े निजी अस्पतालों में संपर्क भी किया, लेकिन इलाज की फीस सुनकर रोंगटे खड़े हो गए। कारण स्पष्ट था एक पत्रकार के लिए इस संकट के दौर में फाइव स्टॉर इलाज करने की ताकत ही नहीं थी, लेकिन जान बचाने की जिजीविषा उससे ऊपर थी, इसलिए सब निजी अस्पतालों की सौदेबाजियों को छोड़कर मैंने शिवराज सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर आंख मंूदकर भरोसा किया और चिरायु मेडिकल कालेज के अध्यक्ष अजय गोयका को फोन लगाया। डॉ. गोयनका ने 15 नवम्बर की शाम ढलते मेरे चार इमली निवास पर एम्बुलेंस भेज दिया। मैंने सूटकेश और 10 दिन का सारा इंतजाम करके अपना लगेज तैयार कर रखा था। एम्बुलेंस आई, मैं एम्बुलेंस में सवार हुआ, मेरी पत्नी, मेरे बेटे, मेरी बेटी, मेरे दामाद, मेरी बहन और बहनोई, दोनों भांजे, मेरी नातिन गेट पर मुझे विदा करने आए तब मैंने बताया कि मैं चिरायु जा रहा हंू, सबने एक स्वर में कहा- छत्तीसगढ़ महतारी की कृपा है, पीताम्बरा माई और शारदा माई की कृपा है, हनुमान जी की अनुकंपा है और आपके हजारों दोस्तों की शुभ कामनाएं हैं, स्वस्थ होकर जल्दी लौटिएगा। बस यहीं से जिंदगी और मौत का सफर मेरा कुछ इस तरह शुरू हुआ जैसे मैं कुछ समय के लिए पर्यटन करने चिरायु जा रहा हंू। समय रात्रि 8 बजकर 40 मिनट चिरायु में मेरा प्रवेश रिसेप्शन पर डॉ. गोयनका की टीम और सीधी कार्यवाही मुझे आईसीयू में दाखिल कर दिया गया। सांसें भरी हुई थीं, आक्सीजन का स्तर गिरा हुआ था लेकिन इलाज में इतनी फुर्ती कि मुझे डॉक्टरों ने कोरोना के डर से इतना दूर कर दिया कि आप समझ नहीं सकते उस समय की मेरी दशा। हेल्थ टीम ने कहा- अब आप चिरायु के कब्जे में हैं। निश्चिन्त हो जाइए आपको कुछ नहीं होगा। यही हुआ कि मन से डर चला गया और मेरा इलाज एक सामान्य वायरल की तरह मेरा ट्रीटमेंट शुरू हो गया। लेकिन दूसरे दिन दोपहर तक इतनी सारी खबरें इधर-उधर से आईं बार-बार मुझे यह सुनाई दिया कि इस उम्र (मतलब 69 साल) में कोरोना हो जाए तो बचना मुश्किल है। लेकिन मैं हारा नहीं, मैने गूगल खोला और यूट्यूब ऑन कर दिया। मैंने पूछा 70 साल की उम्र में कितने लोग कोरोना की जंग जीत चुके हैं तो एक वीडियो क्लीपिंग मिली जिसमें मैंने देखा कि मप्र की ही कोई 90-95 साल की महिला पॉजिटिव थी, वह कोरोना पराजित कर चुकी है फिर क्या था मेरा हौसला बढ़ गया, मैंने तय किया ईश्वर से प्रार्थना की और कहा कि मेरे पास तो इस बूढ़ी महिला के हिसाब से 20-22 साल उपलब्ध होना चाहिए। और यह सोचकर मेरी अंदर की ऊर्जा दुगनी हो गई। दोपहर 4 बजे करीब आईसीयू में डॉ. गोयनका की टीम आई आक्सीजन का स्तर और श्वांस की गति नापते ही कहा- प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट हो जाएं। आप समय पर आ गए हैं, इलाज बढिय़ा होगा। शर्त रखी कि कोई फोन नहीं, कोई स्टोरी नहीं सिर्फ इलाज। बहादुर बनकर लड़ो, चिरायु तुम्हे मरने नहीं देगा। दोस्तों कहने के लिए शब्द नहीं है। चिरायु अस्पताल में डॉ. गोयनका की पूरी टीम जान जोखिम में डालकर लोगों की जान बचाती है। मेरा दावा है कोविड का इससे बेहतर इलाज शायद ही कहीं और होगा और होगा तो डर और भय के साथ। इसलिए डर से दूर रहकर सामान्य मरीज की तरह इलाज कराएं, मौत पास नहीं आएगी, जिंदगी मिलेगी दुबारा, हालांकि दूसरे दिन से जब रेमडीशिविर इंजेक्शन और एंटी बायोटिक शुरू हुए तब पता चला कि वायरस फेफड़ों में उतर आया है और इसका इलाज लम्बा चलेगा। बस यहीं से जिंदगी पाने की जिजीविषा और मौत से जूझने की ताकत शुरू होती है। दिनभर हजारों दोस्तों की शुभकामनाओं, ईश्वर से प्रार्थना एक शक्ति के रूप में मुझे प्राप्त होती थी तो थोड़ी देर के लिए मुझे लगता था कि मुझसे ज्यादा चिंतित मेरे शुभचिंतक हैं, मेरे मित्र हैं, मेरा परिवार है। फिर पता चला कि राज्यसभा सदस्य महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया, गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा, कृषि मंत्री कमल पटेल, कांग्रेस नेता सुरेश पचौरी तथा छत्तीसगढ़, मप्र की समूची नौकरशाही, सैकड़ों पत्रकार मित्रों ने मेरी जिंदगी के लिए ईश्वर से दुआएं मांगी और वे पूरी तरह सफल भी हुए, लेकिन इन प्रार्थनाओं से मेरे मन में किंचित डर भी पैदा हुआ, यह सोचकर कि मेरी चिंता इतनी ज्यादा हो रही है तो कुछ न कुछ गड़बड़ होगा, लेकिन उनकी ङ्क्षचता मेरे लिए शक्तिपुंज स्थापित हो गई। दोस्तों मैं अपना अनुभव कुछ इस तरह साझा करना चाहता हंू ताकि लिख सकंू कि कोरोना मरीजों डरिए मत, सिर्फ और सिर्फ सरकार पर भरोसा करिए, परिवार को कमजोर मत होने दीजिए, रहा सवाल मेरी जिन्दगी के 11 दिनों के अनुभव का तो उसमें रोमांचित करने वाले अनुभव भी रहे, वरिष्ठ पत्रकार एन.के. सिंह और वीरेन्द्र सिन्हा तो मोबाइल पर ही सुबह- शाम आक्सीजन देते रहे। डर अपनी जगह था। रात को सोते समय मौत को प्रणाम करता था और कहता था प्लीज अभी अंदर मत आना मुझे बहुत सारे काम करने हैं। राष्ट्रीय हिन्दी मेल को बड़ा करना है, संस्थान का कर्ज उतारना है। यकीन मानिए मौत दरवाजे पर ही रूक जाती रही होगी, क्योंकि सुबह जब डॉ. गोयनका अपनी टीम के साथ आते तो नई जिंदगी की खबर लेकर आते कहते ‘यू आर फिट एंड फाइन, डोंट वरी, यू विल फाइट आउट कोरोना डिफनिटलीÓ, और यह क्रम उस समय तक चला, जब तक मैं डिचार्ज नहीं हुआ। यकीन मानिए दो-दो घंटे की हेल्थ टीम द्वारा मानीटरिंग किसी निजी अस्पताल में संभव ही नहीं थी। सातवें-आठवें दिन जब मैं कमरे से बाहर निकला तो पूर्व मंत्री आरिफ अकील और कमलेश्वर पटेल के मुस्कुराते चेहरे तथा मेरे वर्क आउट के साथ चलने वाले कई मरीजों के चेहरे पर खुशी देखकर मुझे यकीन हो गया कि चिरायु से मैं जिंदा ही घर लौटूगा। इस संकट की घड़ी में मुझे उन दोस्तों का भी संबल मिला, जिन्होंने अखबार चलाने के लिए मुझे आर्थिक सहयोग दिया है। उन्होंने कहा- स्वस्थ होकर लौटिए पहले- फिर हिसाब कर लेंगे। एक-दो कर्जदारों ने कहा भैया चेक साइन करके भेज दो, मैंने कहा संभव नहीं है लौटकर आऊंगा तभी चेक में साइन होगा, तब वे भी पलटे और कहा- नहीं आप स्वस्थ होकर आइए फिर हिसाब कर लेंगे। कुल मिलाकर पाठकों के नाम मेरे पत्र का लब्बोलुआब केवल इतना ही है कोरोना से डरिएगा नहीं तो बच जाएंगे जरूर और फिर आखिरी में यही कहता हंू कि कोरोना महामारी ने एहसास कर दिया है कि सरकार की अहमियत क्या है… और चिरायु जैसे अस्पताल के समर्पित योद्धाओं की भूमिका आपकी जान बचाने के लिए कितनी महत्वपूर्ण है।
आपबीती के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।