अच्छा हुआ मुझे ‘कोरोना हुआ वरना…

अपनी बात
विजय कुमार दास

मो.9617565371

चीन के वांग शहर में जिस दिन कोरोना वायरस अविष्कार पाया गया था, उस दिन से ही कोरोना वायरस का डर महामारी के रूप में दुनिया भर के सभी देशों में अलग-अलग तरह से फैल गया और वहीं डर वहीं कोरोना वायरस भारत में मुंबई में आया, फिर भारत के सभी राज्यों में फैल गया। धीरे-धीरे जिस तरह कोविड-19 ने अपना पैर पसारा व कल्पवैष्निक महामारी का रूप धारण कर लिया। लेकिन डर इतना की मौत का स्कोर क्रिकेट मैच की तरह टेलीविजन चैनलों में कुछ इस तरह दर्शाया जाना लगा जैसे भारत कोरोना वायरस की जंग में वल्र्ड मैच खेल रहा। स्मरण होगा कि 21 मार्च 2020 को पहले लॉकडाउन के बाद जितनी अफरा-तफरी मची उसका सीधा असर हिन्दुस्तान के 12 करोड़ अप्रवासी मजदूरों पर सीधा असर पड़ा और बेचारे जान बचाने की जद्दोजहद में बिचारे अपने गांव अपने शहर, अपने घर कोई पैदल तो कोई सायकिल से तो कोई रिक्शे से हजारों किलोमीटर की यात्रा पर निकल पड़ा। मीडिया पर यह आरोप गलत नहीं था कि हमने सही खबर की बजाए डर फैलाने में अहम् भूमिका निभाई। लेकिन सही खबर पहुंचाने के नाम पर मीडिया भी वही करता रहा, जो उन्हें अस्पतालों द्वारा परोस दिया जाता था। कुल मिलाकर कहने का यह मतलब है कि कोरोना से ज्यादा कोरोना का डर हिन्दुस्तान में घुस गया और उसके लिए केवल दो ही वर्ग जिम्मेदार है, जिसमें सबसे बड़ा आरोप राजनेताओं पर है। जिन्होंने कोरोना की आड़ में भी राजनीति की है, तथा दूसरा मीडिया के ऊपर आरोप है कि उन्होंने कोरोना का खौफ जबर्दस्त फैलाया है। जो कहीं-कहीं पर सही भी साबित हुआ है। लेकिन हकीकत में किसी पत्रकार को कोरोना मरीज के पास जाकर उसकी स्थिति का आंकलन करने का या उसको दी जा रही इलाज का विश्लेषण करने का अधिकार ही नहीं था। मतलब कोरोना वायरस से जूझते हुए जिन्दगी और मौत के बीच जद्दोजहद का जीवन विवरण जब मीडिया के पास उपलब्ध ही नहीं था तब यह बात कैसे गले उतरती कि हिन्दुस्तान में अस्सी लाख लोगों के टेस्ट हो गये और हजारों लोगों की मौत हो गई। जितनी भी रिपोर्टस आती रही या तो वह सरकारी प्रेस नोट पर आधारित थी या फिर जिलों के कलेक्टर, एसपी मतलब प्रशासन तंत्र के द्वारा परिस्थितिजनक फैसलों पर प्राप्त होती थी। लेकिन बड़ी बात यह थी कि सरकारी तंत्र ने कहीं पर भी डर का फैलाओ नहीं किया बल्कि यूँ कहा जाए कि सरकार ने इस महामारी से निपटने के लिए जितनी न्याय संगत भूमिका निभाई वे इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। परंतु दूसरी ओर निजी अस्पतालों, व्यवसायिक संस्थानों, होटलों में कोरोना वायरस से मौत का डर बताकर जितना शोषण किया है वह किसी अपराध से कम भी नहीं है। हालांकि इसमें कुछ संस्थानों ने अच्छे काम भी किये हैं। हमारी 47 वर्षों की पत्रकारिता का पहली बार एक ऐसी आत्मगिलानी से गुजर रहा था, जिसमें हम कोरोना वायरस के मरीजों की दशा स्थिति और जूझते हुए संकट की घड़ी में उनकी बात रख नहीं पा रहे थे। हमें लगा कि मीडिया भी हकीकत उजागर करने में इस वक्त असहाये की स्थिति में गुजर रहा है। मन में बार-बार यह आता था कि अस्पताल में जाकर कोरोना मरीजों की व्यथा नजदीक से देखा जाए और लिखा जाए ताकि सच बाहर आये। मैंने तो ईश्वर से मांगा कि जब मैं इतनी भीड़ से रोज गुजर रहा हूँ तो मुझे भी कोरोना क्यों नहीं होता। यदि हो जाएगा कम से कम अस्पताल में रहकर मरीजों का सच लिखने का साहस भी करूँगा। ईश्वर ने कुछ ऐसा ही मेरे साथ किया मुझे कोरोना हुआ और सरकारी नियंत्रण के अस्पताल चिरायु में भर्ती होने से पहले प्रमुख सचिव जनसंपर्क शिवशेखर शुक्ला तथा आयुक्त जनसंपर्क सुदाम खाड़े से मैंने सलाह मांगी कि इलाज कहां कराया जाए। उन्होंने एक स्वर में कहा कि बारह सौ पचास, हमीदिया अस्पताल या चिरायु जहां आपकी मर्जी हो बेफिकर होकर जाइये ठीक जरूर हो जाएंगे। लेकिन सच की तहकीकत मैंने चिरायु जाने से पहले कुछ निजी अस्पतालों के संचालकों से बात करके शुरू कर दी। मैंने बताया नहीं कि मैं पत्रकार हूं लेकिन यह जरूर बताया कि कोरोना पॉजिटिव हो गया हूं। मुझे आपके यहां इलाज कराना है तो कितने खर्च का इंतजाम करना होगा। आप यह जानकर चौक जाएंगे कि मेरे इलाज का 15 दिनों का शुल्क किसी भी निजी अस्पताल ने 5 लाख से कम नहीं बताया, बल्कि यूं कहा जाएगा कि मेरे एक मित्र ने बताया कि आप वहां चले जाएं जहां मैंने इलाज कराया है तो अच्छा होगा। तब मैंने उनसे पूछा कि खर्चा कितना आएगा। तो उन्होंने बताया कि 7-8 लाख रुपए में काम हो जाएगा। क्योंकि मैं अभी-अभी ठीक होकर वहां से आएं है। इस पैरेग्राफ का उल्लेख मैं इसलिए कर रहा हूँ कि क्योंकि मैं जानता था कि मौत का डर फैलाने में निजी अस्पतालों की अहम् भूमिका है। यदि मौत का डर न हो तो लोग लाखों क्यों दे, लेकिन गरीब आखिर कहा जाएं। उसके पास तो सरकारी अस्पताल के अलावा कोई ठिकाना ही नहीं है। सो मैंने भी ऐसे किया शुक्ला जी की सलाह मानी और डॉ. अजय गोयनका को फोन लगाया कहा डॉक्टर साहब एम्बुलेंस भेज दीजिए और मेरा इलाज करवा दीजिए। डॉक्टर गोयन का ने बिना पल गवायें शाम ढलते मेरे निवास पर एम्बुलेंस भेज दिया और मैं चिरायु पहुंच गया। हालांकि घर वालों से यह कहकर निकला डरयेगा मत हम लौटकर जरूर आएंगे। मौत से जुझने और हकीकत जानने दोनों जद्दोजहद में हम अंतत: चिरायु पहुंच गया और हकीकत जानने का सफर भी आईसीयू में दाखले के साथ शुरू हो गया। हमें ऑक्सीजन जड़ाया गया हम डर नहीं रहे थे। इसलिए कई बार हम ऑक्सीजन की नली बाहर करके दूसरे मरीजों की तरफ देखते कुछ नहीं होगा और कुछ देर बाद आईसीयू में अजय गोयनका की टीम आ जाती है और सभी मरीजों का ऑक्सीजन लेविल नापती और सबसे कहती है कि कुछ नहीं होगा चिंता मत करिए। आम लोगों के इलाज का आंखों देखा हाल थमा ही नहीं था कि दूसरे दिन हम प्राईवेट वार्ड पहुंच गये और हमारा इलाज आवश्यक इंजेक्शन सब शुरू हो गए। पांच दिनों तक हर शाम हम मौत को प्रणाम करते और दूसरे दिन सुबह नई जिन्दगी पा जाते। ऐसा सिलसिला पांच दिन चला, लेकिन इन पांच दिनों में प्रति दो घंटे के अंतराल में डॉ. अजय गोयनका के टीम की मॉनिटरिंग जनरल वार्ड से वीआईपी वार्ड तक एक समान देखकर पहली बार एहसास हुआ कि सरकार आम जनता में व्याप्त भय को दूर करने के लिए कोरोना का नियंत्रण अपने हाथ में नहीं लेती तो हाहाकार मच जाता और मौत का तांडव कोई रोक नहीं पाता। कोरोना मरीज होने के बाद मैं कुछ इस तरह लिखना चाहता हूं कि राजधानी भोपाल में चिरायु मेडिकल अस्पताल का मृत्यु दर विश्व में सबसे कम है।

नोबेल पुरस्कार के हकदार

यूं कहां जाए कि 0.25 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि चिरायु अस्पताल सरकारी नियंत्रण में तो है, लेकिन उत्कृष्ट व्यवसायिकता (प्रोफेशनलिज्म) इतनी जबर्दस्त है कि मौत के मुंह में समाये लोग भी जिन्दा बच गये। इस बात को अतिश्योक्ति न माना जाए। यह तो एक ऐसे पत्रकार का सच है कि कोरोना मरीज के रूप में सरकार की भूमिका का ईमानदारी से एहसास किया है कि सरकार न हो तो जान ही न बचे और यदि चिरायु अस्पताल की अजय गोयनका की टीम सर्मपित न हो लोगों को नई जिन्दगी भी न मिले। इस अपनी बात का लब्बोलुअब यह है कि डॉक्टर अजय गोयनका और चिरायु अस्पताल की टीम को किसी न किसी अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए, क्योंकि जब स्ट्रीट चिल्र्डन की जिन्दगी संवारने के लिए या फिर बाल श्रमिकों को ढ़ाबे में काम करने से छुड़ाने के लिए नोबेल पुरस्कार दिया जा सकता तो फिर मध्यप्रदेश में जिस चिरायु अस्पताल में निस्वार्थ सेवा भाव से हजारों लोगों की जान बचाई। उस संस्थान को नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। एक पत्रकार के नाते में भारत सरकार और मध्यप्रदेश सरकार दोनों से यह अपील करता हूं कि यदि चिरायु मेडिकल अस्पताल जिसे आपने सबसे कोविड-केयर सेन्टर बनाया है। वहां कि सेवाओं का आंकलन करके डॉ. अजय गोयनका और उनकी टीम को नोबेल पुरस्कार के लिए अनुशंसा भेज सकें तो यह इस वैश्विक महामारी के दौर में डर से दूर रखकर लोगों को जिन्दगी देने की भूमिका के साथ न्याय जरूर होगा।

अपनी बात के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।