जनसंपर्क को अनाथालय समझने की गलती न करें प्ली•ा…


मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार ने सभी सरकारी विभागों से कह रखा है कि कोरोना काल आम जनता के लिए मानव इतिहास का सबसे बुरा काल है और 2020 का वर्ष तो मानव इतिहास में सबसे बुरे वर्ष के रूप में बीता है, और हम उसकी पीड़ा और त्रासदी से आज तक उभर नहीं पाए हैं। प्रदेश में जिन लोगों की कोरोना से मौत हुई, उनके परिवार की दुर्दशा का बयान भी नहीं किया जा सकता, परन्तु इसी कोरोना काल में कुछ निजी अस्पतालों ने मौत का डर दिखाकर कितना लूटा है, यह उनके यहां कोरोना का इलाज कराकर लौटे मरीजों के बिलों से, जिनमें 1-2 पत्रकार साथी भी शामिल हैं, पता चल जाएगा। और दूसरा संवेदनशील मुद्दा यह है कि मुख्यमंत्री जी ने सभी विभागों को निर्देशित किया है कि वे मैदानी अमले को कहें कि कोई भी गरीब आदमी मध्यप्रदेश में भूखा नहीं सोना चाहिए। मुख्यमंत्री की सदाशयता का आम गरीबों को लाभ भी मिला, परन्तु कुछ वर्ग ऐसे भी निकले जिन्होंने गरीबों को खाना खिलाने के नाम पर दुकानदारी शुरू कर दी, जहां चाहे कलेक्टर को, एसपी को 10-15, 20-25 लोगों की सूची पकड़ाई और कहा साहब भूखों को खाना खिलाना है, और इंतजाम करवा लिया। चौंकाने वाली घटना तो यह है कि ऐसी एक-दो फर्जी दुकानें जनसंपर्क भी चली आईं, आए दिन खाना खिलाने के नाम पर गरीबों को आयुक्त/संचालक जनसंपर्क से स्वीकृति मांगने लगे। इसी के चलते एक दिन कोई तथाकथित पत्रकार भी संचालक के कक्ष में गरीबों को खाना खिलाने के नाम पर घुसने लगा तो एक अधिकारी ने उसे देखते ही कह दिया कि जनसंपर्क अनाथालय नहीं है, चलो यहां से प्ली•ा…। -खबरची