विडम्बना देखिए मोदी के देश में आंदोलन बड़ा-‘किसान’ छोटा हो गया…

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास
मो.9617565371

भारतीय लोकतंत्र में जब-जब किसान, मजदूर, नौजवान और महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ, भारत जागा, उठा और लड़ा और जंग में जीता, परन्तु देश की आन, बान, शान को कभी शर्मशार नहीं होने दिया। कहने को कहा जा सकता है 60 दिनों से लगातार बरसात और ठंड दोनों की भयंकर मार झेलते हुए हरियाण-पंजाब के किसानों से हमदर्दी का राग अलापने वाले आंदोलनकारी नेताओं ने जो इतनी लंबी लड़ाई लड़ी, वह ऐतिहासिक है परन्तु यह तथाकथित किसान आंदोलन क्यों बन कर रह गया, एक खोज का विषय है। स्मरण हो कि देश में पहले जितने भी ऐसे आंदोलन हुए, उसमें 5 स्टार इंतजाम कभी नहीं रहा, यूं कहा जाए कि आंदोलनों में आंदोलनकारियों को भूख, प्यास, तपन, बुखार और आंदोलन के परिणामों की तड़प के साथ ही संघर्ष करना होता था, परन्तु यह कैसा और पहला अजूबा किसानों का आंदोलन, जिसमें आंदोलन के सभी नेता बड़े हो गए और किसान बेचारा फिर भी छोटा ही रह गया। आश्चर्य एवं चौंकाने वाली घटना तो यह थी कि पंजाब-हरियाणा के किसान आंदोलन की गंूज पूरे देश में इसलिए जगह नहीं ले पाई, क्योंकि देश का 80 प्रतिशत किसान इस तथाकथित किसान आंदोलन के समर्थन में खड़ा ही नहीं हुआ, क्योंकि वह समझने की कोशिश कर रहा था कि आंदोलनकारी सिंघु बार्डर पर, फरीदाबाद में तो फिर आवाजें केवल कनाडा और इंग्लैण्ड से अधिकतर महिलाओं द्वारा उठ रही है और शायद इन्हीं विदेशों में बढ़ी पंजाब-हरियाण के परिवारों की आवाजों ने यह आंशिक रूप से प्रमाणित भी किया कि पंजाब का किसान आंदोलन कनाडा और इंग्लैण्ड से भेजे गए पैसे के दम पर ही कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर द्वारा लाए गए 3 किसान कानूनों को बिना पढ़े एक ऐसी कार्य योजना के साथ बदनाम किया जा रहा था, जिसका असर आने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव से लेकर भविष्य के सभी चुनावों पर इतना भयानक पड़े कि ‘मोदीÓ की उलटी गिनती शुरू हो जाए। लेकिन चूंकि प्रधानमंत्री मोदी और नरेन्द्र तोमर ने जो धैर्य का परिचय दिया, उससे यह लिखने में संकोच नहीं कि 100 प्रतिशत राजनीति से प्रेरित किसान आंदोलन पूरी तरह अब ध्वस्त हो गया है। 26 जनवरी 2021 भारत के 72वें गणतंत्र दिवस की वर्षगांठ थी, जहां पूरा देश ही नहीं, पूरा विश्व भारत के सैन्य बल को प्रणाम करता है, गर्व महसूस करता है और इसकी एक झलक पाने को पूरा विश्व सुबह 9 बजे अपना-अपना टीवी चैनल खोल लेते है। लेकिन 26 जनवरी 2021 का वह दिन जब किसानों के पीछे अघोषित रूप से काम कर रहे षडय़ंत्रकारियों ने किसानों को हिंसा की आग में झोंककर उन्हें तो बदनाम किया ही और भारतीय लोकतंत्र का झंडा जिसे हम सब भारतीय सर उठाकर गर्व की मुद्रा में निहारते हैं, वह तिरंगा उस समय शर्मसार हुआ, जब लाल किले के शिखर पर तिरंगे की जगह आंदोलनकारियों ने अपना झंडा लहरा दिया। आंसू गैस के गोले, पुलिस कर्मियों से झड़प, वह सब कुछ किया, जो नहीं किया जाना था। वायदे के मुताबिक यदि 26 जनवरी के दिन किसानों के नेता अहिंसक प्रदर्शन करते तो शायद प्रधानमंत्री 3 किसान कानूनों में संशोधन की बात पर विचार करते, परन्तु अब तो जरूरी यह है कि कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर पूरी ईमानदारी से उपरोक्त तीनों किसान कानूनों को लागू कराकर अपने पुरूषार्थ का प्रदर्शन करें और देश के किसानों को छोटा होने से बचाएं, और उन्हें समझाएं कि नए किसान कानून किसानों के फायदे का क्यों है। वरना यदि हिंसा गणतंत्र दिवस के दिन हुई है तो इसकी आग पश्चिम बंगाल, उसके बाद पूरे देश में फैलने लगे तो चौंकाने वाली घटना नहीं होगी। इसके पीछे अराजकता फैलाने वाले लोगों को मौका ही मिलेगा। इसलिए जरूरत है एकतरफा फैसले का, किसान दो भाग में नहीं बंटे हैं, आंदोलन के मठाधीशों ने हिस्सों में बंटवारा कर लिया है, इस परिदृश्य को समझने भर की जरूरत है।
विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।