सबसे बड़े गणतंत्र का अर्थतन्त्र खतरे में ?

ओमप्रकाश मेहता
भारत का अन्नदाता फांसी पर झूलने को मजबूर है तो आम आदमी भिखारी की मुद्रा अपनाने को विवश है। आज एक तरफ देश का युवा रोजगार के लिए दर-दर भटक रहा है तो व्यापारी जीएसटी को लेकर परेशान है, यही स्थिति आम नौकरी पेशा वर्ग की है, कुल मिलाकर राजनेताओं को छोड़कर कोई भी इस देश में सुखी-समृद्ध नहीं है और कई राज्यों के साथ केन्द्र सरकार की भी यह स्थिति है कि वह पचास हजार करोड़ का कर्ज लेने की फिराक में है और साथ ही यह केन्द्र सरकार भी अब यह मानने को विवश है कि देश की आर्थिक रफ्तार कम हुई है।
दुनिया को दिखाने के लिए तो हम अपने आप को ‘सम्पन्नÓ राष्ट्र कहते हुए बड़ी-बड़ी बातें करते है, कभी कहते है कि ”विश्व की पाँचवीं अर्थव्यवस्था बन जाएगा भारतÓÓ, ”2018 में युके और फ्राँस को पछाड़ सकता है भारतÓÓ लेकिन वास्तविकता क्या है यह वह भारतवासी जानता है, जिसे अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए दिन में तारे नजर आते है। हमारे आधुनिक भाग्य विधाता विश्वमंदी की आड़ में अपने ही देश के आम आदमी पर नित-नए कितने जुल्म ढा रहे है, इसके बारे में कभी किसी ने सोचा भी है, वैसे ही आठ दिसम्बर, 2016 से की गई नोटबंदी से देश का आम आदमी परेशान था और उसके बाद जीएसटी ने बाकी रही-सही कसर पूरी कर दी और अब बैंक महाघोटाले ने बैंकिंग अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ कर रख दी वैसे ही एनपीए के कारण बैंकों की आर्थिक स्थिति चरमरा रही थी, अब तो लगने लगा है कि देश के रईसों को भारत बिल्कुल भी रास नहीं आ रहा, पिछले चंद सालों में देश में अकूत दौलत कमाकर करीब सात हजार भारतीय करोड़पति विदेशों में जा बसे है, 2017 में देश से बाहर जाने वाले रईसों की संख्या में सोलह फीसदी का इजाफा हुआ है, खैर ये रईस तो खुद दौलत कमाकर विदेश गए, किंतु माल्या-मोदी जैसे लोग तो बैंकों को कंगाल कर खुद कुबेर बन विदेश पलायन कर गए। यदि हम सिर्फ पिछले तीन साल का ही आंकड़ा देखें तो 2015 में चार हजार, 2016 में छ: हजार और 2017 में सात हजार अर्थात सिर्फ तीन साल में ही सत्रह हजार भारतीय धन कुबेर विदेशों में जा बसे, इनमें से छ: हजार तुर्की में, चार हजार ब्रिटेन में, चार हजार फ्राँस में और तीन हजार रूस में जा बसे है। आज सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि विश्वस्तर पर जो अर्थतंत्र को लेकर सर्वेक्षण किए जा रहे है उनमें भारत की स्थिति बेहतर बताई जा रही है, भारत ही क्या कहा तो यह जा रहा है कि विश्व अर्थव्यवस्था की दृष्टि से 2018 का वर्ष सर्वश्रेष्ठ है। भारत आठ फीसदी की रफ्तार पकड़ेगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन लुभावने सर्वेक्षणों के काले बादल देखकर भारतीय का मन मयूर नाचने लगता है और अच्छे दिन की उम्मीद में रात भर नाचने के बाद वह सुबह अपने पैरों की दुर्गति देखकर रोने को मजबूर हो जाता है। अब हर भारतीय के मन-मस्तिष्क में एक ही सवाल है कि ये सर्वेक्षण वास्तविकता की जमीन से जुड़े क्यों नहीं होते, ये सब आसमानी सुल्तानी क्यों होते है? चार साल पहले जो ‘अच्छे दिनÓ के सपने दिखाए गए थे, वे सपने ‘दिवास्वप्नÓ बनकर क्यों रह गए? देश की जनता को सरकार के नए बजट से काफी उम्मीदें और आकांक्षाऐं थी, वे भी सब बजट आने के बाद धूल-धूसरित हो गई। जबकि आज की वास्तविकता यही है कि आम आदमी को अपना और अपने परिवार का जीवन बसर करना मुश्किल हो रहा है। भारत का अन्नदाता फांसी पर झूलने को मजबूर है तो आम आदमी भिखारी की मुद्रा अपनाने को विवश है। आज एक तरफ देश का युवा रोजगार के लिए दर-दर भटक रहा है तो व्यापारी जीएसटी को लेकर परेशान है, यही स्थिति आम नौकरी पेशा वर्ग की है, कुल मिलाकर राजनेताओं को छोड़कर कोई भी इस देश में सुखी-समृद्ध नहीं है और कई राज्यों के साथ केन्द्र सरकार की भी यह स्थिति है कि वह पचास हजार करोड़ का कर्ज लेने की फिराक में है और साथ ही यह केन्द्र सरकार भी अब यह मानने को विवश है कि देश की आर्थिक रफ्तार कम हुई है। वर्ष 2016-2017 में देश की जीडीपी महज 7.1 फीसदी हो रही। जबकि यह वर्ष 2015-16 में 8 फीसदी थी इसके साथ ही अब तो यह भी उजागर हो गया है कि 2015-16 में भारतीय कुल जमा सम्पत्ति के 58 फीसदी हिस्से पर एक फीसदी अमीरों का कब्जा था जो 2016-17 में 73 फीसदी सम्पत्ति पर हो गया है। विश्व के 79 विकासशील देशों में भारत का स्थान साठवें म पर है। ग्र्रामीण भारत की स्थिति तो सबसे बदतर है, बताया गया है कि एक ग्रामीण भारतीय मजदूर की मजदूरी राशि को एक कार्पोरेट कर्मचारी के वेतन तक पहुंचने में 941 साल लग जाएगें। कुल मिलाकर आज देश में कोई भी वर्ग आर्थिक दृष्टि से अपने आपको सहज नहीं पा रहा है और अब बैंक महाघोटाले ने तो उस उक्ति को चरितार्थ कर दिया है जिसमें कहा गया है कि ”पहले ही मियां बावले, ऊपर से पीली भंगÓÓ अर्थात दाने-दाने को मोहताज हर देशवासी पहले से ही है, और अब नोटबंदी, जीएसटी और बैंक घोटाले ने देश की आर्थिक स्थिति को और गहरे में दफन होने को मजबूर कर दिया है।