शिव की ‘फेस सेविंग तो ज्योतिरादित्य की ‘फेस लिफ्टिंग

राजेश सिरोठिया
चार महीने से टलते आ रहे मुंगावली और कोलारस के उपचुनावों के नतीजे आखिर आ ही गए। शिवतंत्र और शिवगणों की मेहनत के बावजूद चुनावी नतीजे कांग्रेस की ‘सीट सेविंगÓ वाले कहे जा सकते हैं। हार का मलाल चेहरे पर लाए बगैर शिवराज ने अपने ‘फेस सेविंगÓ के लिए माकूल दलीलों का तानाबाना पहले ही बुन लिया था। मुंगावली और कोलारस को भाजपा के बड़े गढ्ढे वाला इलाका बताते हुए उन्होंने उसे काफी हद तक पाट लेने के दावे के साथ कामयाब और गले उतरने वाली पटकथा दिल्ली के मोदी दरबार में पेश कर दी है। भाजपा ने जिस महासंग्राम की तरह अपने फौज फाटे के साथ चुनाव लड़ा उसने शिवराज की लाज बचा ली है। कांग्रेस के लिए राहत और उत्साह की बात यह है कि भाजपाई प्रचार तंत्र के बवंडर को थामते हुए उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा बचा ली है। पिछले चार चुनावों में जीत के चौके के साथ कांग्रेस के नेता अजय सिंह चित्रकूट में जीत के नायक बनकर उभरे तो सिंधिया ने पहले अटेर और फिर कोलारस व मुंगावली में भाजपा के सीधे वार को झेलते हुए महानायक के बतौर अपनी फेस लिफ्टिंग कराने में कामयाब रहे। जीत हार के स्थानीय फेक्टर से लेकर प्रत्याशी चयन तक का मसला भाजपा में समीक्षा और मीमांसा की मांग करता रहेगा। बहरहाल छह महीने के दोनों कांग्रेसी विधायकों को जीत की मुबारकबाद के बावजूद भाजपा को नवंबर 2018 के विधानसभा के आमचुनावों में कोलारस और मुंगावली के गढ्ढों को फिर से भरने की कवायद में जुटना होगा। मुंगावली को स्मार्ट सिटी बनाने का दावा तो कोलारस के ग्रामीण इलाकों में पसरे भीषण पेयजल संकट की चुनौती से निपटना होगा। चुनावी वादों की दावत परोसने की घोषणाएं कसौटी पर होंगी। यह बात भी गौर करने लायक होगी कि नवंबर 2018 में इन क्षेत्रों में न तो संगठन का इतना बड़ा फौजफाटा होगा और न उन मंत्रियों की टोली, जो शिवराज के मुताबिक भाजपा के गढ्ढों को भरने में मददगार साबित हुए हैं। फिर बात सिर्फ कांग्रेस के कब्जे वाली सीटों के गढ्ढों को भरने तक ही सीमित नहीं है। ‘अबकी बार दो सौ पारÓ के नारे को मुंगावली और कोलारस में बुलंद करके नवंबर 18 के चुनावों का बिगुल फूंकने वाली भाजपा के मुखिया शिवराज सिंह चौहान को अब कांग्रेस के कब्जे वाले क्षेत्रों के ही नहीं सूबे के भाजपाई मंत्रियों के इलाके से लेकर भाजपा विधायकों की कामयाबी के पहाड़ों की जगह बने नाकामी के गढ्ढों को भरने की चुनौती से रूबरु होना पड़ेगा। यानि 2008 और 2013 में जिन शिवराज ने सफलता के हिमालयी शिखरों को छुआ था, उन्हें अपनी ताकत वहां बन चुके गढ्ढों को भरने में लगानी होगी। बात सिर्फ गढ्ढों को पाटने की नहीं है उन्हें भरने के साथ ही फिर से कामयाबी के शिखर बनाने की चुनौती से भी रूबरु होना होगा। खुद भाजपा और संघ द्वारा कराए गए आतंरिक सर्वे की रिपोर्ट उनके पास है। भाजपा के पास मौजूद सीटों में से केवल सत्तर क्षेत्र ही ऐसे हैं जहां शिखर और पहाड़ी अभी भी बची हुई है। बाकी 95 सीटों पर गहरे गढ्ढे खुद चुके हैं। फिर भाजपा का लक्ष्य दो सौ पार का है। यानि अपने गढ्ढे भरने के साथ ही कांग्रेसी शिखरों को ढहाने का काम भी करना होगा। तभी तो अबकी बार दो सौ पार का दावा सच होगा। 130 सीटों को जीतने लायक बनाने के लिए सात महीने का ही वक्त बचा है। यानि शिवराज का पराक्रम कसौटी पर है। उन्हें अपनी 95 सीटों के गढ्ढे भरने के जतन के साथ ही कांग्रेस की सीटों के आंकड़़े को 30 के नीचे धकेलने के उपक्रम में भी जुटना होगा। या फिर लक्ष्य को घटाकर डेढ़ सौ या सवा सौ पार तक सीमित करके जीत सकने लायक सीटों पर फोकस करके अपनी जंग लडऩा होगी। यहां यह भी याद रखना होगा कि लगातार जीत के जोश से सराबोर कांग्रेस के कार्यकर्ता 2013 की तरह पस्त हौसलों के साथ नहीं बल्कि बुंलदी भरे जोशो खरोश के साथ भाजपा का मुकाबला करेंगे। यदि ज्योतिरादित्य सिंधिया के चेहरे को सामने रखकर चुनाव कांग्रेस लड़ती है तब चुनौती और भी कठिन होने वाली है। शिवराज 2008 से 2013 तक कांग्रेस के लिए गढ्ढे खोदकर उसे दफन करते आए हैं, लेकिन आने वाले सात महीनों में उन्हें सिर्फ और सिर्फ भाजपा के गढ्ढे भरने में जुटना होगा। वो यह सब कर सकेंगे या नहीं? क्या वो सात महीने बाद भी भाजपा के लिए जिताऊ चेहरा बने रहेंगे या नहीं? क्या कांग्रेस जीत की हेट्रिक जडऩे वाले सिंधिया को बतौर सीएम फेस प्रोजेक्ट करेगी या नहीं? ये तमाम सवाल तो भविष्य के गर्भ में हैं और इनके जवाब तो भाजपा और संघ के साथ नरेंद्र मोदी और अमित शाह को खोजना है। ज्योतिबाबू का फैसला भी राहुल गांधी को करना है। लेकिन यह तय है कि दिल्ली में 2014 से सत्ता से महरूम कांग्रेस 15 साल से मप्र में वनवास झेल रही है जाहिर है कि सत्ता की चासनी के लिए वह भाजपा को कड़ी चुनौती देने वाली है।