चुनावी रंगों से सराबोर बजट-2018 के निहितार्थ

डॉ हिदायत अहमद खान
इसी के साथ किसान अपनी लहलहाती पकी चुकी फसल को खेत से काटकर खलिहान में लाने और अपने अन्नदाता होने के कर्तव्य को पूर्ण करने की तैयारी में जुटता है। इस प्रकार हाली अपार खुशियां लेकर आती है, जिसका संदेश प्रकृति भी देती नजर आ जाती है। इस दृष्टि से मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने अपना अंतिम बजट पेश कर आमजन को खुशियां बांटने का जो प्रयास किया है उसका असर विधानसभा चुनाव में देखने को मिलेगा ही मिलेगा। जबकि विपक्ष की नजर से देखें तो यह बजट झूठ का पुलिंदा है, जिसमें सुनहरे सपनों के सिवाय कुछ नहीं है। इसलिए इस बजट के जरिए शिवराज सरकार मतदाताओं को लुभाने में कामयाब रहेगी कहना फिलहाल मुश्किल है।
दरअसल वित्तमंत्री जयंत मलैया ने बजट 2018-19 सदन में पेश करते हुए आमजन को आश्वस्त तो करने की कोशिश की है कि इसमें सभी का ख्याल रखा गया है, लेकिन सरकार के इस पक्ष की मजबूती लोकहितकारी योजनाओं के सही-सही क्रियांवयन पर छुपी होती है। चूंकि 2018 चुनावी साल है अत: उम्मीद पहले से ही जताई जा रही थी कि शिवराज सरकार सभी वर्गों को खुश करने वाला बजट लेकर आएगी। बहरहाल हमने देखा कि वित्तमंत्री मलैया ने कृषि और शिक्षा व स्वास्थ्य पर केंद्रित करते हुए 2 लाख करोड़ रूपए से ज्यादा का बजट पेश किया।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर किसानों की पूर्ण कर्ज माफी के बगैर बजट उनके लिए कैसे खुशी प्रदान करने वाला हो सकता है। इसके साथ ही सवाल उठ रहे हैं कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ जिन्हें मिलना चाहिए था क्या उन्हें पूरी तरह वो लाभ मिल गया, यदि नहीं तो फिर सरकार ने ऐसा क्या किया जिससे उन्हें घाटे की भरपाई हो गई हो और वो किसी साहूकार या बैंक से कर्ज लेने के लिए मजबूर नहीं होने वाले हैं। दरअसल ग्रामीण अंचलों का गरीब किसान परेशान है और उसे सिंचाई के लिए पानी तो दूर की बात है शुद्ध पेयजल उपलब्ध होना भी दूभर होता आया है। खबरें आती हैं कि दूरस्थ अंचलों के गरीबों को दस-दस किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है, जबकि सरकारें दावा करती हैं कि शहर से गांवों को चमचमाती सड़कों के जरिए जोड़ दिया गया है।
ऐसे में गांव शहर की ओर नहीं बल्कि शहर गांव की ओर जा रहे हैं। ग्रामीणों को तो हर वो सुविधा उपलब्ध कराई जा चुकी है जो एक शहरी को मिलती रही है। इस तरह के झूठे आंकड़ों से परे गरीब किसान आज भी हक की खातिर राजधानी की धूल फांकने को विवश नजर आता है। ऐसे में सरकार की नीतियों और प्रकृति की मार सहता किसान इस बजट से कैसे खुश होगा कहना मुश्किल है। बावजूद इसके कहा यही जा रहा है कि यह बजट कृषि पर फोकस करने वाला साबित हुआ है। इसके तहत बताया जा रहा है कि प्रदेश की विकास दर राष्ट्रीय विकास दर से भी ज्यादा है। कृषि क्षेत्र में तो प्रदेश को पांच बार कृषि कर्मण अवार्ड मिल चुका है। ऐसे में यह समझ से परे है कि किसानों की आय दोगुनी करने में सरकार 2021 का इंतजार क्योंकर कर रही है। खास बात यह है कि प्रदेश में लगातार तीन बार से भाजपा सरकार है और सबसे ज्यादा 14 साल का शासनकाल शिवराज सिंह चौहान के नाम रहा है। इस लंबे अंतराल में भी यदि किसानों को लाभांवित नहीं किया जा सका है तो फिर आगे की बात करना बेमानी नहीं तो क्या है।
गौर करें कि भाजपा सरकार कुल 2,04,642 करोड़ रुपये का चौदहवां बजट लेकर आती है, और उस पर सरकार का घाटा रुपये 26,780 करोड़ दर्शाया जाता है, लेकिन इसी के साथ जब यह बात भी सामने आती है कि करीब 2 लाख करोड़ के कर्ज में पहले से ही राज्य डूबा हुआ है तो सारी उम्मीदों पर मानों पानी फिर जाता है। ये कर्ज वाले आंकड़े यदि सच बयान करते हैं तो प्रत्येक प्रदेशवासी मौजूदा समय में 15 हजार का कर्जदार निकलता है। एक तरफ किसान कर्ज के बोझ तले दबकर अपनी इहलीला समाप्त करने जैसा दर्दनाक कदम उठाता नजर आ जाता है, तो दूसरी तरफ प्रदेश की गरीब जनता के सिर पर कर्ज का बोझ लादने का काम भी बदस्तूर जारी रहता है। इस स्थिति में विपक्ष यदि रोजगार की बात उठाता है और पकौड़ा की याद दिलाता है तो क्या गलत करता है। बहरहाल ये सब कहने और सुनने की बातें हैं, क्योंकि रंगोत्सव होली सामने है और सभी के दु:खों को बांटते हुए खुशिंयां मनाने की ओर समाज को अग्रसर होना चाहिए।

इसके साथ ही युवाओं को चाहिए कि वो इस होली शपथ लें कि वो जो भी करेंगे ईमानदारी से करेंगे और रोजगार के अवसर तलाशने में वो इस बात को नजरअंदाज नहीं करेंगे कि वो काम मांगने की बजाय काम बांटने वाले बनेंगे। इसमें तमाम सांप्रदायिक ताकतों को शिकस्त देते हुए समाज के तमाम वर्गों के साथ मिल-जुलकर रंगों का पर्व मनाने और दिखावे के लिए नहीं बल्कि पूरी ईमानदारी के साथ ‘सबका साथ, सबका विकासÓ को चिरतार्थ करते हुए आत्मसात करेंगे।