त्रिपुरा में लेफ्ट को सबक सिखाती भाजपा की शानदार जीत

पूर्वोत्तर के तीन राज्य त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी गठबंधन का प्रदर्शन वाकई आंख खोलने वाला रहा है। त्रिपुरा राज्य में दो तिहाई सीटों के साथ बड़ी विजय के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ ही साथ पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं की जितनी भी तारीफ की जाए कम होगी। इस मायने में हिन्दुस्तान की सियासत में यह बेहद खास दिन है, जबकि त्रिपुरा में 25 साल से कायम लेफ्ट फ्रंट सरकार को हार का मुंह देखना पड़ा है। दरअसल त्रिपुरा लेफ्ट फ्रंट का वो अभेद्य किला रहा है जिसे भाजपा के लिए भेद पाना नामुमकिन माना जाता रहा है। त्रिपुरा के राजनीतिक इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो मालूम चलता है कि सन्1978 के बाद से वाम मोर्चा सिर्फ एक बार 1988-93 के दौरान सत्ता से बाहर रहा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछली पांच बार से वाममोर्चा ही जीतता आया है और इससे भी बड़ी बात यह कि वर्ष 1998 से लगातार चार बार से माणिक सरकार त्रिपुरा के मुख्यमंत्री रहे हैं। बहरहाल किसी राज्य में लगातार सरकार में बने रहने के कारण आमजन में असंतोष उत्पन्न हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन 2013 के चुनाव में तो सीपीएम ने 50 सीटें जीती थी। कांग्रेस को 10 सीटें जबकि भाजपा को एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी। ऐसे में महज पांच साल में भाजपा का जनाधार खड़ा कर लेना अपने आप में सुनहरा इतिहास रचने जैसा ही काम हुआ है। इस जीत को दो तरह से देखा जा सकता है। पहला यह कि प्रधानमंत्री मोदी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला है और दूसरा, लेफ्ट फ्रंट का जीत के प्रति पूर्ण आश्वस्त रहते हुए अपने ही रास्ते पर चलते-चले जाना भी एक बड़ा कारण है। इस हार के बाद ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्कसवादी) के महासचिव सीताराम येचुरी ने मोदी सरकार पर निशाना साधा और यहां तक कह दिया कि पैसों के दम पर भाजपा ने त्रिपुरा में जीत हासिल की है। यह बयान देते हुए संभव है कि येचुरी को वो पल भी याद जरुर ही आए होंगे जबकि उन्होंने पश्चिम बंगाल के अनेक बड़े नेताओं से मुलाकात करके भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन की रणनीति पर काम करने की बात मजबूती से रखी थी। तब पार्टी की केंद्रीय कमेटी के कुछ लोगों ने येचुरी की इस मंशा का विरोध किया था। खबर यहां तक रही कि केरल यूनिट ने प्रकाश करात से इस संबंध में अपना विरोध दर्ज कराते हुए येचुरी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। तभी यह रिजोल्यूशन भी पास कर दिया गया था कि कांग्रेस के साथ किसी भी तरह का गठबंधन नहीं होगा। अब जबकि त्रिपुरा में पार्टी को शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा है तो येचुरी ने एक बार फिर खुलकर कहा है कि हम भाजपा का विरोध जारी रखेंगे। इस हार की हम समीक्षा करेंगे और इस जीत का फायदा भाजपा को बंगाल में नहीं मिलेगा। जनता ने हमें 25 साल तक मौका दिया। हम जनता की भलाई के लिए आगे भी काम करते रहेंगे। इससे हटकर वामदल के नेता और कार्यकर्ता मानते आए हैं कि उनकी सिद्धांतवादी राजनीति के आगे कथित सांप्रदायिक ताकतें टिक नहीं सकतीं और उनके किले को कोई भेद नहीं सकता क्योंकि उनकी हिफाजत खुद जनता-जनार्दन करती है। इस प्रकार की विचारधारा और उस पर जरुरत से ज्यादा भरोसा, इस समय हार के प्रमुख कारणों में गिनाए जा सकते हैं। फिर भी हार तो हार ही होती है, जिसे स्वीकार करना ही होगा। इसमें दोराय नहीं कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का सबका साथ सबका विकास वाला फार्मूला यहां पर काम आया है, प्रदेश की भोली-भाली जनता को लुभाने के लिए क्या कुछ नहीं किया गया फिर भी मतदाताओं ने तो पूर्वोत्तर के विकास की खातिर ही इस बार भाजपा को सत्ता संभालने का आदेश दिया है। इसे देखते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दिल्ली के पार्टी मुख्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कह जाते हैं कि यह जीत प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों की जीत है, जिसे नॉर्थ ईस्ट की जनता ने मुहर लगाई है। इसके साथ ही शाह अपनी चिरपरिचित शैली में यहां तक कहते हैं कि लेफ्ट भारत के किसी भी हिस्से के लिए राइट नहीं है। कुल मिलाकर जिस तरह से भाजपा ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देकर आम चुनाव जीता था, उसी तरह अब वह लेफ्ट पर शिकंजा कस रही है और बहुत जल्द इसके परिणाम भी देखने को मिलेंगे। अंतत: इससे पहले कि वाकई लेफ्ट का सफाया होना शुरु हो जाए वापस कांग्रेस से गठबंधन करके आगामी रणनीति पर काम शुरु किया जाना उचित होगा।