कितनी सफल है गठबंधन की राजनीति?

भरत मिश्र प्राची
उत्तर प्रदेश उपचुनाव की इस ऐतिहासिक जीत ने देश में गठबंधन का एक नया स्वरूप तय कर दिया जो आनेवाले समय में होने वाले चुनाव में भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा। जहां एक बार फिर से देश के समस्त विपक्षी दल एक होकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लडऩे की पूरजोर कोशिश करेंगे। जिससे आगामी चुनाव में पूर्व की भांति विजय हासिल करना भाजपा के लिये टेढ़ी खीर साबित होगा। बिहार के उपचुनाव परिणाम भी भाजपा के लिये बेहतर साबित नहीं हो पाये जहां हुए लोकसभा एवं दो विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथ केवल भभुआ विधानसभा चुनाव की सीट हासिल हो पाई। अररिया लोकसभा सीट एवं जहानाबाद विधान सभा सीट पर प्रतिद्धन्दी पार्टी राजद ने जीत दर्ज कराई। यहां राजद से अलग हुये जदयू नेता एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का कोई करिश्मा काम नहीं आया जिसपर भाजपा को पूरा विश्वास रहा ।
देश में अभी हाल ही में हुए उत्तरप्रदेश राज्य के उपचुनाव में गठबंधन को मिली जीत ने आगामी लोकसभा चुनाव में गठबंधन राजनीति को फिर से नये सिरे से उभरने का सुअवसर दे दिया जिससे देश के भाजपा विरोधी दलों को एक मंच पर लाने की कवायद जोर-शोर से शुरू हो गई। पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा, एवं नागालैंड में मिली सफलता से मोदी नेतृत्व की धाक एक बार फिर से प्रबल हो चली जिससे भाजपा पूरे देश पर अपना शासन स्थापित करने का मानस बनाने लगी, पर उत्तर प्रदेश एवं बिहार के हुए लोक सभा उपचुनाव के आये विपरीत परिणाम ने उसके इस मंसूबे पर पानी फेर दिया। देश में भाजपा के बढ़ते कदम को रोकने की दिशा में भारतीय राजनीति क्षेत्र में फिर से गठबंधन की राजनीति को एक नया मुकाम मिला हैं ।
इस प्रयास की सफलता अभी उत्तरप्रदेश की राजनीति में हुए उपचुनाव में देखने को मिला जहां भाजपा के खिलाफ सपा एवं बसपा ने मिलकर चुनाव लडा और इस उपचुनाव में उसे अपार सफलता मिली। सपा ने उत्तरप्रदेश की दोनों लोकसभा सीट गोरखपुर एवं फूलपुर पर जहां भाजपा का कब्जा रहा, अपनी जीत दर्ज कर गठबंधन के प्रभाव को प्रमाणित कर दिया। उत्तर प्रदेश उपचुनाव की इस ऐतिहासिक जीत ने देश में गठबंधन का एक नया स्वरूप तय कर दिया जो आनेवाले समय में होने वाले चुनाव में भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा। जहां एक बार फिर से देश के समस्त विपक्षी दल एक होकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लडऩे की पूरजोर कोशिश करेंगे। जिससे आगामी चुनाव में पूर्व की भांति विजय हासिल करना भाजपा के लिये टेढ़ी खीर साबित होगा। बिहार के उपचुनाव परिणाम भी भाजपा के लिये बेहतर साबित नहीं हो पाये जहां हुए लोकसभा एवं दो विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथ केवल भभुआ विधानसभा चुनाव की सीट हासिल हो पाई। अररिया लोकसभा सीट एवं जहानाबाद विधान सभा सीट पर प्रतिद्धन्दी पार्टी राजद ने जीत दर्ज कराई। यहां राजद से अलग हुये जदयू नेता एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का कोई करिश्मा काम नहीं आया जिसपर भाजपा को पूरा विश्वास रहा । यहां भी भाजपा को मात ही खानी पड़ी। इन उपचुनावों में मोदी, योगी, नीतिश कुमार का प्रभाव प्राय: निष्प्राय रहा जिसपर भाजपा का भविष्य टिका हुआ हैं। मोदी एवं योगी का प्रभाव देश की राजनीति में जिस कदर बढ़ा, उसी अनुपात में कम होना भी शुरू हो गया। देश में जुमले की राजनीति ज्यादा दिन नहीं टिक सकती। देश की जनता तत्काल प्रभाव देखना चाहती हैं और जब उसे केवल झांसा की राजनीति नजर आती है, प्रतिकूल प्रभाव दिखा जाती हैं।
देश में हुए उपचुनाव के दौरान उत्तरप्रदेश में मिली गठजोड़ राजनीति की सफलता ने देश के विपक्षी राजनीतिक दलों को एक मंच पर लाने का एक नया परिवेश उजागर कर दिया है जहां लोकसभा चुनाव से पूर्व देश के सभी विपक्षी राजनीतिक दल भाजपा के खिलाफ एक मंच पर खड़े दिखाई दे सकते हैं। उपचुनाव पूर्व सपा एवं बसपा एक मंच पर खडे तो दिखाई दिये ही, विपक्ष की भूमिका में खड़ी कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी ने भी रात्रि भोज पर भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों को आमंत्रित कर एक साझा राजनीतिक पृष्ठभूमि खड़ा करने का प्रयास किया । इस तरह साझा प्रयास लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा को पराजित करने की दिशा में सकरात्क पृष्ठिभूमि उभार सकता है। देश के सभी भाजपा विरोधी राजनीतिक दल भी इस बात को समझने लगे है कि अलग – अलग खड़ा होकर भाजपा के खिलाफ जंग नहीं लड़ी जा सकती । भाजपा को चुनाव में मात देने के लिये वोटों के विकेन्द्रीकरण को रोकना बहुत जरूरी है। यह कार्य केवल गठबंधन से ही संभव हैं। गठबंधन से चुनाव के दौरान हुए लाभ का परिदृश्य पूर्व में बिहार चुनाव के दौरान देखने को मिला जहां लालू -नीतिश गठबंधन ने देश भर में मोदी लहर नकाम कर सत्ता हासिल कर ली और अभी हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश राज्य के उपचुनाव में सपा एवं बसपा गठबंधन ने भाजपा के पास से दोनो सीट छीन ली। इस तरह के हालात ने गठबंधन राजनीति को फिर से जागृत कर दिया हैं। देश में लोकसभा चुनाव पूर्व कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले है।
इन राज्यों में कर्नाटक को छोड़ तीन राज्य भाजपा शासित राज्य है जहां की राजनीतिक हालत सत्ता विरोधी दिखाई दे रही है। पूर्व चुनावों में देश में चली मोदी लहर का लाभ इन तीनों राज्यों को मिला जिससे भारी बहुमत से भाजपा अपना साम्राज्य स्थापित करने में सफल रही। इस बार होने वाले इन राज्यों के चुनाव में पूर्व की भांति मोदी लहर की हवा कहीं नजर नहीं आ रही है। जब मोदी हवा बिहार एवं उत्तर प्रदेश में कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई तो आगे क्या दिखायेगी जिसपर भाजपा का भरोसा टिका हुआ है। भापजा का कर्यकाल आमवर्ग को संतुष्ट नहीं कर पाया जिस उम्मीद से दे की अवाम ने मोदी के नेतृत्व में भरोसा जताकर सत्ता भाजपा को सौपी थी। आगामी चुनाव में गठबंधन की राजनीति का जोर रहेगा जहां भाजपा एक तरफ एवं दूसरी ओर देश क सारे विपक्षी दल।