घाटे में चल रहा है हस्तशिल्प विकास निगम

आरती शर्मा
भोपाल, 26 मार्च। कुटीर और ग्रामोद्योग विभाग का संत रविदास हस्तशिल्प विकास निगम घाटे में चल रहा है। एक तरफ तो प्रदेश सरकार कारीगरों और बुनकरों के लिए नई-नई जनकल्याणकारी नीतियां ला रही है तो वहीं निगम के अफसर इन योजनाओं को पलीता लगाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे है। आलम यह है कि विभाग की वित्तीय स्थिति गत वर्षों की तुलना में आधी रह गई है।
इतना ही नहीं हस्तशिल्प विकास निगम में पारदर्शिता लाने वाले सॉफ्टवेयर भी कई महीनों से बंद पड़े है। विभाग द्वारा ई-कॉमर्स के क्षेत्र में की गई गतिविधियों को भी वर्तमान में बंद कर दिया गया है। इन सबके चलते निगम में कर्मचारी अपनी मनमानियों पर उतर रहे हैं। हैरानी की बात है कि इन सब गड़बडिय़ों के चलते निगम के अफसर आंखें मूंदे बैठे है।
निगम के प्रतिवेदन के अनुसार वर्ष 2010-11 में निगम के उत्पादों की होने वाली बिक्री करीब 9 करोड़ रूपए सालाना थी, जिसकी वृद्धि के लिए विभाग ने कई योजनाएं तैयार की। निगम ने अपने देष भर के 22 आउटलेटस पर बार कोड स्कैनर लगाए। उनकी कनेक्टीविटी एक सॉफ्टवेयर से की, जिससे देशभर में निगम के मृगनयनी शो-रूम में होने वाली खरीदी और बिक्री की जानकारी ऑनलाइन तुरंत प्राप्त की जा सके।
ई-कॉमर्स को बढ़ावा दिया, लिहाजा विभाग की यह मेहनत रंग लाई और वर्ष 2015-16 तक निगम की सालाना आय बढ़कर 30 से 40 करोड़ के उपर पहुंच गई। विभाग ने कई कारीगरों को मार्केट लिंकेज से जोड़ा और बिक्री की राशि सीधे उनके अकाउंट में डलवाने की व्यवस्था की। इस पूरी व्यवस्था से खुश होकर विभाग के आला अफसरों ने निगम को बड़ा लक्ष्य निर्धारित कर दिया, लेकिन हुआ उसके उलट। हस्तशिल्प विकास निगम की व्यवस्थाएं कई माह से चरमराई हुई है।
अच्छे अफसरों का अभाव है और ध्यान देने वाला कोई नहीं है। निगम के ऑनलाइन सॉफ्टवेयर बंद होने से दुकानों और शोरूम में कर्मचारी जमकर धांधली कर रहे हैं। उनकी मॉनीटरिंग सही ढंग से नहीं हो पा रही है। आलम यह है कि इस वित्तीय वर्ष वर्ष 2016-17 में निगम की आय 19 करोड़ भी नहीं हो पाई है। इस संदर्भ में निगम की प्रबंध संचालक सोनाली वायंगकर से बात करना चाही तो उनसे बात नहीं हो सकी।