नोबेल पर कदाचार का कचड़ा

प्रभुनाथ शुक्ल
साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्ध्यिों के लिए वैश्विक स्तर पर दिये जानेवाले नोबेल पुरस्कार पर इस बार पेंच फंस गयी है। नोबेल पुरस्कार प्रदान करने वाली स्वीडिश अकादमी के 117 के इतिहास की यह सबसे बड़ी घटना है, जब दुनिया की सबसे बड़ी अकादमी संस्था के पुरस्कारों को इस वजह से रोकना पड़ा और संस्था से जुड़े करीबियों के संबंधियों पर यौन शोषण यानी कदाचार के आरोप लगे हैं। हलांकि यह आठवीं पर ऐसा हुआ है जब उस साल का पुरस्कार किसी को भी नहीं मिलेगा। पहले और दूसरे विश्वयु़द्ध की वजह से भी पुरस्कारों को रोकना पड़ा था। जबकि 1935 में अकादमी को विशिष्ट कार्य के लिए कोई नाम ही नहीं मिला था।
दुनिया के सबसे सर्वश्रेष्ठ पुस्कार पर भी कदाचार की काली छाया पड़ गयी। जिसकी वजह से साल 2018 के नोबेल साहित्य पुरस्कार को रोकना पड़ा। अकादमी बदनामी के इस धब्बे से बेहद चिंतित है। अब इसकी घोषणा 2019 में की जाएगी। क्योंकि पुरस्कार के नामों का चयन करने वाली जूरी की एक पूर्व महिला सदस्य के पति और नामचीन फोटोग्राफर पर कई महिलाओं ने मी-टू अभियान के जरिए यौन शोषण की शिकायत की है। महिला सदस्य के पति पर पुरस्कार के लिए चयनित नामों को लीक करने का भी संवेदनशील आरोप है। निश्चित तौर पर यह अक्षम्य अपराध हैं। कम से कम इतने बड़े प्रतिष्ठान से जुड़े होने और सार्वजनिक हस्तीे की वजह से यह सोचना चाहिए कि हमारे इस कदम से दूसरे लोग भी प्रभावित होने वाले हैं। उस स्थिति जब हम खुद किसी गरिमामयी संस्थान से प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से ताल्लुक रखते हों। हमारा यह व्यवहार हमें निजी जीवन में जहां नीचे गिराता है वहीं सामाजिक क्षति के साथ सार्वभौमिक संस्थानों की मर्यादा को चोट पहुंचती हैं। लेकिन बदले दौर में इस तरह की सोच बेहद कम देखने को मिलती है। दुनिया भर में नोबेल पुरस्कारों की अपनी एक अहमियत है। कम से कम इसके सम्मान का भी खयाल रखना चाहिए था। किसी के व्यक्तिगत चरित्र की वजह से अगर दुनिया की सबसे सम्मानित संस्था की खास और उसकीक विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा होता है तो इसका संदेश दूर तलक जाता है।
हलांकि नोबेल पुरस्कार देने वाली स्वीडिश अकादमी ने इसकी मूल वजह अपनी बदहाली बतायी है जबकि ऐसा नहीं है। क्योंकि मी-टू कैंपेंन की वजह से जूरी की एक पूर्व महिला सदस्य एवं लेखिका कटरीना के फ्रांसीसी पति और फोटोग्राफर ज्या क्लाउड अर्नाल्ट पर यौन शोषण का आरोप लगा है। जिसमें स्वीडिश राजकुमारी विक्टोरिया समेत कुल 18 महिलाएं शामिल हैं। पूर्व महिला सदस्य के पति एक क्लब भी चलाते हैं। इस विवाद पर पिछले साल नवम्बर में अकादमी में कटरीना को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए वोटिंग भी कराई गयी थी, जिसमें अकादमी ने लेखिका को निकाले जाने के खिलाफ वोटिंग की थी। जिसके बाद यह विवाद गहरा गया और एक वैश्विक स्तर की संस्था फाट में विभाजित हो गई। बाद में संस्थान की मुखिया प्रोफेसर सारा डेनियस के त्यागपत्र बाद इस ममाले ने इतना तूल पकड़ा की कई सदस्यों ने अपना इस्तीफा सौंप दिया। अब निर्णायक सदस्यों की जूरी में सिर्फ 11 सदस्य बचे हैं जिसमें एक महिला सदस्य सालों से निष्कासित हैं। विवाद की वजह से अकादमी खुद में इतनी उलझ गई है कि उसके लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए नाम चयन करना मुश्किल भरा पड़ाव है। क्योंकि जब पर्याप्त सदस्य ही नहीं है तो संवैधानिक तौर पर इसका निर्णय कैसे किया जा सकता है। हलांकि इस तरह का विवाद पहली बार नहीं हुआ है 1936 में भी उस वर्ष का नोबेल किसी को नहीं दिया गया। दूसरे साल इसकी घोषणा की गयी।
दुनिया में नोबेल पुरस्कार की अपनी एक विशिष्ट पहचान हैं यह साहित्य, शांति, रसायन, भौतिकी और चिकित्सा क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाने वाला सबसे उत्कृष्ट सम्मान है। लेकिन कदाचार की काली छाया की वजह से इसकी गरिमा को जहां ठेस पहुंची है, वहीं इसकी निष्पक्षता पर भी गैर प्रमाणिकता का एक संकट खड़ा हुआ है। जिसकी वजह से संस्थान को इस साल के साहित्यक के लिए दिये जाने वाले नोबेल पुरस्कारों की घोषणा को रोकना पड़ा है। महान वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल ने 1895 में अपनी वसियत से इस सम्मान को देने की घोषणा की थी। 1901 से इसकी ंशुरुवात की गई। अर्थ जगत में उल्लेखनीय कार्यों के लिए 1969 से इसकी शुरुवात की गई। अकादमी की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए तमाम मानक तय किए गए हैं। वैश्विक स्तर पर शांति और सद्भाव के लिए दिए जाने वाले नोबेल पुरस्कार का चयन स्वीडिश अकादमी नहीं करती है बल्कि इसका चयन नार्वे की समिति करती है। साहित्य का नोबेल पुरस्कार अकादमी के स्थापना साल से ही दिया जा रहा है। आपको जानकर हैरानी होगी कि जितना बड़ा यह पुरस्कार है उतनी बड़ी राशि भी नोबेल पाने वाले को दी जाती है। नोबेल पुरस्कार में सम्मान पत्र के साथ स्वीडिश अकादमी 14 लाख डालर की राशि भी उपलब्ध कराती है।
वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल ने 1869 अपनी मौत के पूर्व एक टस्ट बनाया और अपनी विसाल संपदा के एक हिस्से को संबंधित समिति को सौंप दिया। स्वीडिश बैंक में जमा उसी पैसे से नोबेल विजेताओं को यह राशि उपलब्ध करायी जाती है। गौरवशाली नोबेल अकादमी की स्थापना 1900 में की गयी थी। अकादमी का पहला नोबेल 1901 में हैरी दुनांत और फ्रेडरिक पैसी को एक साथ दिया गया था। 1913 में पहली बार गुरु रविंद्रनाथ टैगोर को उनकी बांग्लाकृति गीतांजलि के लिए नोबेल का साहित्य पुरस्कार दिया गया। अब तक नौ हिंदुस्तानी लोगों को यह पुरस्कार मिल चुका है जिसमें चंद्रशेखर वेंकटरमन, हरगोविंद खुराना, मदर टेरेसा, अमत्र्य सेन और कैलाश सत्यार्थी का नाम शामिल है। लेकिन इस विवाद की वजह से दुनिया की सबसे विश्वसनीय संस्था नोबेल अकादमी पर प्रश्न खड़ा हो गया है। संस्था से जुड़े लोगों को इसका खयाल रखना होगा। क्योंकि यह एक अकादमिक संस्था भर नहीं है। यह दुनिया को अपने-अपने क्षेत्र में नया मुकाम दिलाने वालों की आत्मा है। स्वीडिश सरकार को इस विवाद में हस्तक्षेप कर संस्थान की गरिमा और पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए आगे आना चाहिए। नोबेल फाउंडेन को भी इस तरह का काम करना चाहिए जिससे महान वैज्ञानिक अल्फ्रेड की आत्मा को कष्ट न पहुंचे और नामचीन ऐसी संस्थाओं की विश्वसनीयता हमेंशा बनी रहे। यह जिम्मेदारी केवल स्वीडिश अकादमी की नहीं है बल्कि दुनिया भर में स्थापित अकादमी संस्थानों के लिए भी यह विचारणीय बिंदु है। जिससे की उत्कृष्ट काम करने और वैश्विक समुदाय को एक अच्छे मुकाम पर ले जाने वाले साहित्यकारों, वैज्ञानिकों और चिकित्सकों का सम्मान बना रहे और प्रतिष्ठित अकादमी की साख काम रह पाए।