चुनाव आयोग व सरकार के बीच अघोषित युद्ध…?

ओमप्रकाश मेहता

क्या नए मुख्य चुनाव आयुक्त के पदग्रहण के बाद चुनाव आयोग व केन्द्र सरकार के बीच ‘अघोषित युद्ध शुरू हो गया है? क्या केन्द्र की मंशाओं को भांपकर ही चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के सामने स्वायत्रता की गुहार लगाई है? और केन्द्र सरकार ने अपनी दलीलों के आधार पर चुनाव आयोग की मांग को खारिज कर दिया, जबकि सरकार यह स्वीकार भी कर रही है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संगठन है। यद्यपि इस मसले का स्वतंत्रता के आधार स्तंभों कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका से कोई सीधा संबंध नहीं है, किंतु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि चुनाव आयोग को अपने नियम-कानून बनाने का अधिकार इसलिए नहीं है, क्योंकि यह दायित्व तो सिर्फ और सिर्फ विधायिका व कार्यपालिका का है।
वास्तविकता यह है कि जबसे मध्यप्रदेश के वरिष्ठतम पूर्व भारतीय प्रशासनिक अधिकारी ओमप्रकाश रावत ने मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यभार सम्हाला है, तभी से उन्होंने विश्व के अनेक देशों से चुनाव कानून मंगवाकर उनका विस्तृत अध्ययन कर भारत में आदर्श और सर्वशक्तिमान चुनाव आयोग के गठन का फैसला लिया है, वे कुछ ऐसे चुनाव कानून बनाना चाहते है, जिससे देश में लोकतंत्र की नींव मजबूत हो सके और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर कोई ऊँगली न उठे, इसीलिए सर्वप्रथम चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय से चुनाव आयोग को स्वायत्रता प्रदान करवाने की गुहार लगाई। चुनाव आयोग चुनाव संचालन व चुनावों को पारदर्शी बनाने के लिए कुछ ऐसे नियम कानून बनाना चाहता है, जिससे कि कोई भी चुनाव आयोग को आरोपों के कटघरें में खड़ा न कर सके, और यह सब मोदी जी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार को कतई पसंद नहीं, वे चुनाव आयोग को आयोग से सम्बंधित भी नियम कानून बनाने की स्वतंत्रता मुहैय्या कराने के पक्ष में नहीं है, वे तो चाहते है कि सभी संवैधानिक संगठन भी केन्द्र के मंत्रालयों की तरह ही उनके अधीन रहे, जबकि भारतीय संविधान में स्पष्ट उल्लेख है कि प्रजातंत्र के तीनों स्तंभों को स्वतंत्र रूप से अपने दायित्व सम्पादित करने दिए जाए, जो कि मौजूदा केन्द्र सरकार को पसंद नहीं है।
इस पूरे मुद्दे की यदि अन्र्तकथा पता की जाए तो पता चलता है कि चुनाव आयोग जनप्रतिनिधियों के निर्वाचन और उनके दायित्व निर्वहन के साथ चुनाव सम्पादन सम्बंधि कुछ ऐसे सख्त कानून बनाकर लागू करना चाहता है, जिससे भारत में सभी चुनाव पारदर्शी हो जाए, चुनाव आयोग इसके लिए जहां नेताओं की भाषण शैली, आरोप-प्रत्यारोप, आदि को कानून के दायरें में लाना चाहता है, वहीं नेताओं के दो-दो सीटों से चुनाव लडऩे जैसी प्रवृत्ति पर भी रोक लगाना चाहता है, यह तो महज एक उदाहरण है, ऐसे कई नए नियम-कायदे बनाना चाहता है, जो नेताओं की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगा सकते है, इसलिए केन्द्र में सत्ता पर काबिज लोग नहीं चाहते कि चुनाव आयोग के हाथों में उसकी स्वायत्रता का ‘ब्रम्हास्त्रÓथमाया जाए।
केन्द्र सरकार को चुनाव आयोग से यह अघोषित युद्ध अब इसलिए लडऩा पड़ रहा है, क्योंकि वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त अपने नियम कायदों व आयोग की प्रतिष्ठा के अनुरूप चुनाव कार्य सम्पादित करना चाहते है, जबकि इसके पहले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त के समय केन्द्र सरकार अपनी मनमर्जी के कई कार्य करवा लेती थी, जैसे दिल्ली विधानसभा के बीस विधायकों को रातों-रात निष्कासन।
शायद इसी माहौल के चलते केन्द्र सरकार आधा दर्जन राज्य विधानसभाओं के साथ लोकसभा के भी चुनाव करवाने का अहम् फैसला नहीं ले पा रही है, जहां तक सुप्रीम कोर्ट का सवाल है वहां संविधान व नियम-कायदों की सीमा को अहमियत दी जाती है, इसी कारण केन्द्र सरकार की सुप्रीम कोर्ट से भी पटरी नहीं बैठ पा रही है। अब देखना यही दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग व सुप्रीम कोर्ट कानून-कायदों को अहमियत दिला पाते है या नहीं?