…और अब विपक्ष का मंत्र ‘सबका साथ-सबका विकास…?

ओमप्रकाश मेहता
ऐसा लगता है, देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी व उसके आकाओं ने कवि रहीम के बताए रास्ते पर मजबूरी में चलना शुरू कर दिया है, कवि अब्दुल रहीम खानखाना ने लिखा था, ‘रहिमन चुप व्हे बैठिये, देखि दिनन को फेर और अब कर्नाटक काण्ड के बाद वाचाल भारतीय जनता पार्टी ने मौन धारण कर लिया है, और उत्तरप्रदेश-बिहार के उपचुनाव में जीत और कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता पर काबिज होने वाले गैर भाजपाई दलों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मंत्र ‘सबका साथ-सबका विकासÓ को अंगीकार कर उस माध्यम से 2019 का ‘महाभारत जीतने का संकल्प ले लिया है, अपने विवादित जन आकर्षक जुमलों और राज्यपालों के माध्यम से राज्यों पर कब्जे की कौशिशों में नाकाम धुरंधर भाजपा अब अपनी रणनीति नए सिरे से तैयार करने को मजबूर हो गई है, वहीं उत्तरप्रदेश उपचुनावों में मुख्यमंत्री व उप-मुख्यमंत्री के संसदीय क्षेत्रों तथा बिहार के उपचुनावों में जीत का सेहरा पहनकर क्षेत्रीय प्रतिपक्षी दलों के हौसले बुलंद है, कर्नाटक काण्ड ने प्रतिपक्षी दलों को एक साथ आकर भाजपा व प्रधानमंत्री जी के खिलाफ आक्रामक रणनीति तैयार करने की हौसला अफजाई की है।
देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की परेशानी केवल एक साथ खड़े होने का प्रयास करने वाले प्रतिपक्षी दलों के प्रति ही नहीं है, बल्कि वह सर्वोच्च न्यायालय के प्रति बढ़ते व्यापक जन विश्वास से भी काफी परेशान है, कर्नाटक काण्ड में यदि सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करता तो वहां भाजपा ही पांच साल सत्ता में रहती और कांग्रेस जदस को प्रतिपक्षी की भूमिका का ही निर्वहन करना पड़ता, अब सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ भाजपा व राज्यपाल के मंसूबों पर पानी फेर दिया, बल्कि अब भाजपा को मजबूर होकर यह सोचना पड़ रहा है कि प्रदेशों में सत्ता हथियाने में राज्यपाल सहायक नहीं हो सकते, इसलिए अब ऐसी कोई व्यूह रचना की तैयारी की जा रही है, जिसमें राज्यपाल की सिफारिश पर राज्य की विधानसभा व सरकारें भंग करा दी जाए और राष्ट्रपतियों की भूमिकाऐं भी इसमें तय हो जाए और कोई ऐसा भी रास्ता खोजा जाए जिससे कि सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप कम हो सके, क्योंकि आजकल अपने बैबाक फैसलों के कारण भी सुप्रीम कोर्ट के प्रति जनआस्था में विस्तार होने लगा है।
इन सब स्थितियों को देखते हुए राजनीतिक व कानूनी पंडित यह आशंका व्यक्त करने लगे है कि कहीं अब सीधी जंग न्यायपालिका व विधायिका के बीच शुरू न हो जाए? क्योंकि प्रजातंत्र का तीसरा स्तंभ कार्यपालिका तो विधायिका या सरकार का प्रमुख हिस्सा होती ही है, इसलिए कहीं इस जंग में न्यायपालिका अलग-थलग न पड़ जाए? यद्यपि प्रजातंत्र का अघोषित चौथा स्तंभ खबर पालिका व देश की आस्था न्याय पालिका के साथ-जुड़ी है, किंतु यह तय है कि अब देश की सरकार का पहला प्रयास येन-केन-प्रकारेण न्यायपालिका को अपने नियंत्रण में लेना होगा, क्योंकि न्यायपालिका द्वारा की जा रही हौसला-अफजाई के कारण देश के संवैधानिक संगठन भी सरकारी हस्तक्षेप के खिलाफ विरोध का झण्ड़ा उठाने लगे है।
अब चूंकि देश की सत्ता और सत्तारूढ़ दल पर एक ही शख्स (प्रधानमंत्री) का कब्जा है, उसके सामने सभी गौण है, इसलिए किसी के कुछ बोलने या सुझाव देने की हिम्मत ही नहीं है, फिर वह भाजपा का संरक्षक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ही क्यों न हो? अब तो उसकी भी मौन रहकर अपनी भूमिका के निर्वहन की मजबूरी हो गई है, और वह पुरी निष्ठा व अनुशासन के साथ अपने दायित्व की पूर्ति में जुटा हुआ है। इस तरह कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए कि कर्नाटक काण्ड ने भारतीय राजनीति में भूकम्प की भूमिका का निर्वहन किया है, तो कतई गलत नहीं होगा, क्योंकि इसके अगले दस महीनों तक देश महसूस करेगा और इसके साथ यदि प्रतिपक्षी एकता का ज्वालामुखी फट गया तो फिर पूरे देश में उलट-पुलट का वातावरण पैदा हो जाएगा और कई के सपने ‘मुंगेरीलाल के हो के रह जाएगें।