उम्मीदों के शिखर पर विश्वास, हर भारतीय की आकांक्षा: ‘वो सुबह कभी तो आएगी…?

ओमप्रकाश मेहता
आज जब देश की मोदी सरकार को अपनी ‘अग्निपरीक्षा से गुजरने में केवल तीन सौ दिन शेष बचे है, ऐसे में आज भी देश का हर नागरिक इस उम्मीद में है कि अगले तीन सौ दिनों में मोदी जी अपने उन सभी आकाशी सपनों (वादों) को धरती पर उतार लाएगें, जो उन्होंने आज से पचास महीने पहले देश को दिखाये थे, अब एक ओर जहां देश को आम वोटर ”वादों के मीठे आम के टपकने का बेसब्री से इंतजार कर रहा है, वहीं उस ‘आम को पेड़ पर ही राजनीति के तोतों ने पूरी तरह कुतर डाला है और इस तरह अब मीठे आम के टपकने की उम्मीद खत्म हो चुकी है, लेकिन भोलीभाली जनता से अभी भी यही कहा जा रहा है कि शीघ्र ही ‘मीठे आमों की बरसात होने वाली है और फिर देश की सभी आकांक्षाएं पूरी हो जाएगी।
यद्यपि पिछले सत्तर सालों में भारतवासियों को वादाखिलाफी के माहौल में जीने की आदत हो गई है और इसीलिए उसका धीरे-धीरे वर्तमान कथित लोकतंत्री व्यवस्था से विश्वास भी उठता जा रहा है, क्योंकि सत्ता चलाने के सभी के तौर-तरीके एक जैसे ही होते है, चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा या कोई और किसी ने भी आज तक चुनावी वादों को पूरी करने की परवाह नहीं की। यद्यपि देश की जनता राजनीतिक दलों की इस ‘दादागिरी से परेशान व नाराज अवश्य है, किंतु वह करे भी क्या? क्योंकि उसके सामने कोई तीसरा विकल्प भी तो नहीं है, हर चुनाव के समय कुकुरमुत्तों की तरह नए दल पैदा होते है और वे अपनी मौसमी स्वार्थपूर्ति के बाद खत्म हो जाते है, ऐसे में देश का वोटर भी आखिर करे तो क्या?
किंतु इस बार नजारा कुछ-कुछ बदला सा नजर आ रहा है, देश में सत्तारूढ़ दल को जहां अपना उज्जवल भविष्य ‘नाराजी की धुंधÓ में धुंधला नजर आने लगा है, वहीं देश के प्रतिपक्षी दलों ने भी ”अभी नहीं तो कभी नहीं का संकल्प लेकर एकजुट होने का मन बना लिया है, क्योंकि प्रतिपक्षी दलों की धारणा है कि जब तक वे एक जुट नहीं होगें तब तक मोदी की मंद होती लहर का भी सामना नहीं कर पाएगें, इसीलिए कर्नाटक के शपथमंच के बाद केजरीवाल काण्ड में प्रतिपक्षी मुख्यमंत्रियों ने एकजुटता दिखाने की कौशिश की।
दूसरी ओर ऐसा कतई नहीं है कि प्रधानमंत्री या भाजपा प्रमुख को वास्तविकता का ज्ञान नहीं है, उसे पता है कि उसका वोट बैंक खिसकता जा रहा है, देश का कोई भी मतदाता वर्ग उसके साथ नहीं है, फिर वह चाहे किसान हो या मजदूर, कर्मचारी हो या उद्योगपति, व्यापारी हो या कारोबारी, कोई भी भाजपा या मोदी के साथ नहीं हैं। इधर भाजपा या मोदी को देश साथ नहीं दे रहा है तो दूसरी ओर पिछले पचास महीनों में प्रधानमंत्री ने जिन पचास देशों की यात्राऐं की और उन पर पांच हजार करोड़ खर्च किए, उनका भी तो देश को कोई प्रतिफल नहीं मिल पाया। आज हर मोर्चे पर सरकार नाकाम नजर आ रही है, फिर वह चाहे देश की बाहरी सुरक्षा हो या आंतरिक, कश्मीर मुद्दा हो या चीनी सीमा मुद्दा, पिछले चार सालों में इन सभी मुद्दों पर हमारी समस्याऐं बढ़ी ही है, कश्मीर मुद्दा तो हमारे हाथों से पूरी तरह फिसलता नजर आ रहा है संयुक्त राष्ट्र ने भारत विरोधी रिपोर्ट देकर मुद्दें में और अधिक फिसलन पैदा कर दी, रमजान महीनें के हमारे एक तरफा सीजफ़ायर के फैसले ने न सिर्फ हमारे सैकड़ों सैनिकों की जान ले ली बल्कि पत्थरबाजों के आम माफीनामें ने हमारी समस्या को और अधिक बढ़ा दिया है। अब तो अमेरिका जैसा हमारा कथित सबसे बड़ा मित्र देश भी हमें आँखें दिखाने लगा है, तो ऐसे में हमारी विदेशनीति के सामने भी आर्थिक नीति की तरह प्रश्नचिन्ह तो लगना ही था। इस तरह कुल मिलाकर सत्तारूढ़ दल सहित पूरा देश यह जानता है कि उसे किस खतरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया गया है, सत्तारूढ़ दल यह भी जानता है कि उसके संगी-साथी गठबंधन के सहयोगी दल भी उससे दूर जा रहे है, जिसका सबसे ताजा उदाहरण जनता दल (यू) है, जिसने विशेष राज्य के दर्जे के मुद्दे पर अपना तम्बू अलग गाड़ लिया है। अगले दस महीनें कैसे गुजरेंगे? इस आशंका को लेकर सभी चिंतित है। किंतु देश की जनता को आज भी विश्वास है कि ”वह सुबह कभी तो आएगीÓÓ जब देश को सच्चे विकास की एक नई किरण दिखाई देगी।