सीज फायर पर ब्रेक सही फैसला

राजेश माहेश्वरी
गृह मंत्रालय ने रमजान के महीने में कश्मीर में लागू किये गये एकतरफा संघर्ष विराम को विस्तार न देने का जो फैसला किया है, वह बिल्कुल सही है। राज्य में अनुकूल माहौल मुहैया कराने के मकसद से रमजान के महीने में केंद्र सरकार द्वारा सीजफायर की घोषणा की गयी थी, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि यह प्रयोग अपने घोषित उद्देश्यों में सफल रही हो। इस दौरान घाटी में बीस से अधिक जानें गयीं, जिनमें कम-से-कम चौदह सेना के जवान थे। राइजिंग कश्मीर के संपादक पत्रकार शुजात बुखारी का कत्ल हो अथवा एक निहत्थे सैनिक औरंगजेब की आतंकियों द्वारा की गयी कायरतापूर्ण हत्या, ये दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं यह बतलाने के लिए काफी हैं कि पाकिस्तानपरस्त ये आतंकवादी सिर्फ गोलियों की भाषा समझते हैं। ताजा घटनाक्रम में भाजपा ने जम्मू कश्मीर सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है। भाजपा के इस फैसले को घाटी में बढ़ती आंतकी घटनाओं की मद्देनजर बड़ा कदम माना जा रहा है। संकेत इस बात के हैं कि राज्यपाल शासन की छाया में केन्द्र सरकार आंतकियों को बख्शने के मूड में नहीं है! कश्मीर घाटी में इकतरफा युद्धविराम समाप्त होते ही सुरक्षा बलों ने 4 आतंकवादियों को मारकर जो शुरुआत की उससे पूरे देश का मनोबल बढ़ा है। इसके अलावा पत्थरबाजी करने वाला एक युवक भी सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारा गया। थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत का औरंगजेब नामक उस सैनिक के घर जाने से भी एक अच्छा सन्देश गया। सेना का कहना है कि अमरनाथ यात्रा के पहले वह घाटी के भीतर सक्रिय आतंकवादियों और उन्हें प्रश्रय देने वाले अलगाववादियों की कमर तोडऩे की रणनीति पर चलेगी जिससे यात्रा में आने वाले यात्रियों पर हमले की कोई घटना न हो सके। इसमें दो मत नहीं है कि रमजान के पूरे महीने में सैन्य बलों को युद्ध विराम के लिए मजबूर कर देने का कोई अच्छा नतीजा नहीं निकला। आम कश्मीरी की मानसिकता में इससे कोई सुधार या बदलाव आया हो ये भी नहीं जा सकता। प्रतिवर्ष केन्द्र सरकार रमजान के दौरान युद्धविराम जैसी सौजन्यता दिखाती आई है लेकिन अलगाववादियों पर इसका राई-रत्ती असर पड़ा हो ये कोई नहीं बता सकता। इस वर्ष तो युद्धविराम के दौरान पूरे एक माह तक पथराव और आतंकवादी घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई। जिस वजह से केंद्र सरकार पर पूरे देश में उंगलियां उठीं। यहां तक कि भाजपाई तक अपनी सरकार के उक्त फैसले पर खुश नहीं दिखे। सीज फायर पर ब्रेक से सुरक्षा बलों को केंद्र सरकार ने फिर से खुला हाथ दे दिया और उन्होंने भी पहले दिन ही चार आंतकियों को मारकर अपने इरादे दिखा दिए। एक पत्थरबाज को भी दुनिया से रवाना कर दिया गया। इसमें कोई दो मत नहीं है कि बीते एक माह में यदि सुरक्षा बलों को न रोका जाता तो ऑपरेशन ऑल आउट काफी आगे बढ़ गया होता।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि सेना द्वारा चलाये जा रहे ऑपरेशन ऑलआउट ने कश्मीर में, विशेषकर दक्षिण कश्मीर में, आतंकियों के मॉड्यूल्स को लगभग खत्म कर दिया था। सीजफायर की समाप्ति के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि सेना अब बेरोकटोक ऑपरेशन आल ऑउट को उसके अंजाम तक पहुंचा पायेगी.अंतत: गृह मंत्री राजनाथ सिंह को जम्मू-कश्मीर में संघर्ष विराम समाप्त करने की घोषणा करनी पड़ी। यह निर्णय कुछ दिन पहले ही लिया जा चुका था। हमने उसी के आधार पर संघर्ष विराम खत्म किए जाने का विश्लेषण किया था। चूंकि अब रमजान का पाक महीना गुजर चुका है और ईद भी मना ली गई है। इन्हीं का बहाना था, जो घोषणा को कुछ दिन टाला गया। अब कश्मीर में किसी भी तरह का संघर्ष विराम नहीं है। सेना और सुरक्षा बलों को भारत सरकार का आदेश प्राप्त हो चुका है कि अब उनके पांवों में किसी भी तरह की बेडिय़ां नहीं हैं और न ही हाथ बंधे हैं। ‘आपरेशन आल आउट पार्ट-2Ó को शुरू करने के आदेश दे दिए गए हैं। अब हमारे जांबाज सैनिक चुन-चुन कर, ढूंढ-ढूंढ कर आतंकियों को मारेंगे। कश्मीर में सक्रिय पाकपरस्त पत्थरबाजों का भी ‘इलाजÓ किया जाएगा। अलगाववादियों पर भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी। पाकिस्तान को भी सबक सिखाया जाएगा और उसकी साजिशें नाकाम की जाएंगी। खून-खराबे और लाशों का एक और दौर ! यह तो रमजान के दौरान संघर्ष विराम के पहले भी था। बेशक सेना और सुरक्षा बलों के ‘आपरेशन आल आउटÓ ने पाकपरस्त आतंकियों को न केवल ढेर किया था, बल्कि उन्हें खदेड़ा भी था। कमांडर किस्म के आतंकी इस कदर मारे जा रहे थे कि आतंकी संगठनों को नए, वैकल्पिक कमांडर मिलने मुश्किल हो गए थे। लेकिन रमजान के दौरान संघर्ष विराम में आतंकी हमले तीन गुना से ज्यादा बढ़े। बीती 17 अप्रैल से 17 मई तक (रमजान शुरू होने की तारीख तक) 18 आतंकी हमले हुए थे, लेकिन संघर्ष विराम के दौरान 60 से भी ज्यादा हमले हुए। ग्रेनेड अटैक भी चार गुना बढ़े।
ईद के दिन भी हत्याएं की गईं। लिहाजा सहज सवाल है कि क्या कश्मीर वाकई ‘जन्नतÓ बन सका? क्या अमन-चौन, भाईचारा, भारतीय भावना आम लोगों में महसूस की गई? बिलकुल भी नहीं ! आतंकवाद जारी रहा, नई भर्तियां भी होती रहीं, आतंकियों के जनाजे में हजारों की भीड़ उमड़ती रही, मृत आतंकियों को भी ‘गन सैल्यूट दिए जाते रहे और हमारे जवान, आम नागरिक मारे जाते रहे। सवाल है कि इन हालात में भी एकतरफा संघर्ष विराम क्यों लागू किया गया? क्या मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की जिद और सियासत के मद्देनजर कश्मीर को मौत और आतंक के कुएं में धकेलना उचित निर्णय था? संघर्ष विराम के दौरान हमारे 14 जांबाज जवान ‘शहीद हुए। सिर्फ सुरक्षा बलों पर ही 42 आतंकी हमले किए गए, कुल हमलों की संख्या तो अधिक है। घुसपैठ का आंकड़ा भी 20 रहा। इस दौरान 18-20 आतंकी भी मार दिए गए। नागरिक भी हलाक हुए। आतंकी वारदात में 100 फीसदी इजाफा हुआ। हमारे कश्मीरी पत्थरबाजों ने भी सेना और सुरक्षा बलों पर घातक पथराव किए।
ईद के पवित्र त्योहार के दिन भी ऐसा ही हुड़दंग देखा गया। यानी एकतरफा संघर्ष विराम के दौरान भी माहौल जंग का ही रहा। तमाम भावनाएं एकतरफा थीं। यह मत गिनाओ कि हमारे जवानों ने पाकिस्तान के कितने बंकर तोड़े, कितनी चौकियां बर्बाद कीं और कितने रेंजर्स को ढेर किया? संघर्ष विराम का औचित्य ही बताओ, जबकि भारत सरकार की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने संघर्ष विराम लागू नहीं करने की स्पष्ट दलीलें दी थीं। उसके बावजूद एकतरफा संघर्ष विराम लगाया गया। आखिर उसकी जिम्मेदारी किस पर तय की जाए? चूंकि ऐसे मामलों के प्रभारी गृह मंत्री राजनाथ सिंह हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को सही सलाह और हकीकत की जानकारी नहीं दी होगी, लिहाजा गृह मंत्री की ही बुनियादी जिम्मेदारी तय की जाए।
विभिन्न केंद्र सरकारों ने कश्मीरी जनता के प्रति मानवीय दृष्टिकोण दिखाते हुए उनका मन जीतने का भरसक प्रयास किया लेकिन उसका सतही असर ही देखने मिला। उसके कारणों का विश्लेषण और अब तक उठाये गए कदमों की समीक्षा का तो ये सही वक्त नहीं है क्योंकि उससे सिवाय विवाद के और कुछ हासिल नहीं होगा। इसलिए बेहतर यही है कि सीधी उंगली से काम नहीं बनने पर उसे टेढ़ा किया जाए और ये काम राजनीतिक शक्तियां नहीं कर सकतीं। उनकी नजर में हमेशा वोटों का गुण भाग ही चला करता है। कोई माने या न माने लेकिन कड़वा सच यही है कि कश्मीर घाटी के अंदरूनी हालात जिस स्थिति में आ गए हैं उनमें संवाद और सौजन्यता जैसे उपाय निरर्थक हैं। सैन्य बल ही समस्या की जड़ों तक पहुंचकर उन्हें खोद सकते हैं बशर्ते उन्हें समुचित अधिकार और परिस्थिति अनुसार तात्कालिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी जावे। सुरक्षा बलों की कार्रवाई में यदि अनावश्यक हस्तक्षेप न किया जाए तो आने वाले कुछ महीनों में अच्छे संकेत मिल सकते हैं। पाकिस्तान को भी इसके जरिये कड़ा संदेश दिया जा सकता है।
मुद्दा संघर्ष विराम को समाप्त करने के साथ ही खत्म नहीं होता। आखिर निर्दोष और तटस्थ पत्रकार शुजात बुखारी और औरंगजेब, विकास गुरुंग सरीखे ‘शहीदों की वापसी कैसे होगी? कश्मीर पर लगातार मीडिया की निगाहें रहती हैं, हर रोज टिप्पणियां की जाती रही हैं, लेकिन हालात जस के तस हैं। आखिर मोदी सरकार की नीति क्या है? पाकिस्तान को हररोज गालियां देने या धमकाने अथवा कोसने से हासिल क्या होगा? हम कश्मीर घाटी में ही सीमित आतंकवाद को जड़ से उखाड़ नहीं पाए हैं, तो पाकिस्तान का क्या बिगाड़ लेंगे? यदि हम और हमारी सेनाएं पर्याप्त ताकतवर हैं, तो उन्हें खुली छूट दीजिए और लक्ष्य तय कर दीजिए कि हमें पाकिस्तान का सफाया चाहिए। बीच में संघर्ष विराम सरीखी सांप्रदायिक सियासत मत खेलिए। चलो, सेना और सुरक्षा बलों के आपरेशन का नया दौर शुरू हुआ है। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की छाया में कश्मीर में आतंकवाद का यह आखिरी दौर होना चाहिए!
-लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।