उत्पादन घटाएं तो बन सकती है बात

डॉ. भरत झुनझुनवाला
गन्ना किसान लगातार समस्याओं से जूझ रहे हैं। उनकी समस्या का एकमात्र हल यही है कि गन्ने का उत्पादन कम किया जाए। गन्ना किसान इस समय दो समस्याओं से जूझ रहे हैं। एक तरफ उन्हें गन्ने का भुगतान नहीं मिल रहा है और अगर मिल रहा है तो वह भी देरी से। वहीं भूजल स्तर में लगातार गिरावट आ रही है। इससे उत्पादन का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। किसानों को समय से भुगतान न मिलने का मुख्य कारण यह है कि गन्ने का दाम सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है, जबकि चीनी मिलों को चीनी बाजार भाव पर बेचनी पड़ती है। वर्तमान में बाजार भाव पर गन्ने का यह ऊंचा दाम अदा नहीं किया जा सकता। बिल्कुल वैसे जैसे किसी गृहिणी को कहा जाए कि अच्छी गुणवत्ता का आटा लाए, लेकिन उसका बजट न बढ़ाया जाए। ऐसे में समस्या पैदा हो जाती है। गन्ने का ऊंचा दाम होने से किसानों को अधिक लाभ मिल रहा है। इसलिए किसान गन्ने का उत्पादन बा रहे हैं, जबकि चीनी मिलें उससे उत्पादित चीनी को बेचने में असमर्थ हैं। चीनी मिलों को घाटा हो रहा है। फिलहाल गन्ने का दाम लगभग 2,800 रुपए प्रति क्विंटल है। वहीं अमेरिका में इसका दाम 2,200 रुपए प्रति क्विंटल है। विश्व बाजार में चीनी का दाम आज लगभग 22 रुपए प्रति किलो है, जबकि भारत में यह लगभग 35 रुपए प्रति किलो है। इससे अंदाजा लगता है कि भुगतान की समस्या मूलत: गन्ने के ऊंचे दाम निर्धारित किए जाने के कारण है। इस समस्या का एक हल यह हो सकता है कि चीनी के अधिक उत्पादन का निर्यात कर दिया जाए, परंतु यह भी कठिन है, क्योंकि विश्व बाजार में चीनी का दाम भारत से कम है। इसीलिए भारत में उत्पादित चीनी को बेचने के लिए सरकार को भारी मात्रा में निर्यात सबसिडी देनी होगी। इसमें विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ के नियम आड़े आएंगे और सरकार के ऊपर खर्च का बोझ भी पड़ेगा। सरकार पहले उर्वरक और बिजली पर सबसिडी देकर गन्ने का उत्पादन बढ़ा रही है और फिर उस बढ़े हुए उत्पादन पर निर्यात सबसिडी देकर उसका निष्पादन कर रही है। यह उसी प्रकार हुआ कि जैसे आप आलू का एक बोरा बाजार से खरीद लाएं और फिर कुली को पैसे देकर कहें कि उसे कूड़ेदान में फेंक दे। इस प्रकार की दोहरी मार सरकार पर पड़ रही है तो निर्यात का रास्ता सफल नहीं होगा।
दूसरा संभावित हल है कि उत्पादित गन्ने से चीनी बनाने के स्थान पर पेट्रोल बना लिया जाए। गन्ने से एथनॉल नाम का उत्पाद बनता है, जिसे पेट्रोल के स्थान पर उपयोग किया जा सकता है। ब्राजील ने इस नीति का सफल इस्तेमाल किया है। वह गन्ने का उत्पादन लगातार बढ़ा रहा है। विश्व बाजार में जब पेट्रोल महंगा होता है तो ब्राजील गन्ने का उपयोग एथनॉल के उत्पादन के लिए करता है और चीनी का निर्यात कम कर देता है। इसके विपरीत जब विश्व बाजार में चीनी का दाम अधिक होता है तो एथनॉल का उत्पादन कम करके चीनी का उत्पादन बढ़ा देता है और उस चीनी को निर्यात करता है। भारत सरकार भी ब्राजील की नीति को अपनाना चाह रही है। सरकार का प्रयास है कि देश में एथनॉल का उत्पादन बढ़ाया जाए, जिससे आयातित तेल पर हमारी निर्भरता भी कम हो जाए और चीनी के अधिक उत्पादन की समस्या से भी मुक्ति मिले। गन्ने का उपयोग जब एथनॉल बनाने के लिए होगा तो चीनी का उत्पादन कम किया जा सकेगा। इस नीति में संकट पानी का है। भारत में ब्राजील की तुलना में पानी की उपलब्धता बहुत कम है। ब्राजील में प्रति वर्ग किलोमीटर दायरे में केवल 33 लोग रहते हैं, जबकि भारत में 416 लोग। ब्राजील में औसत वार्षिक वर्षा 1250 मिलीमीटर होती है, जबकि भारत में 500 मिलीमीटर। इन दोनों आंकड़ों का सम्मिलित प्रभाव यह है कि ब्राजील में भारत की तुलना में प्रति व्यक्ति तीस गुना पानी अधिक उपलब्ध है। जब ब्राजील गन्ने का उत्पादन अधिक करता है तो वहां पानी की समस्या उत्पन्न् नहीं होती, क्योंकि वहां जनसंख्या कम है और वर्षा अधिक होती है। इसके अलावा वहां पानी की खपत भी कम है।
हमारे यहां गन्ने का उत्पादन बढ़ाकर उससे एथनॉल बनाने का सीधा परिणाम यह होगा कि वर्तमान में भूमिगत जल का जो स्तर गिर रहा है, वह और तेजी से घटेगा। भूमिगत जलस्तर गिरने से समस्याएं पैदा होंगी। गहराई से पानी निकालने में बिजली अधिक खर्च करनी होगा। यह देखने को मिल रहा है कि किसानों को हर दूसरे-तीसरे वर्ष अपने ट्यूबवेल की गहराई बढ़ानी पड़ रही है। वे अरसे से भूजल का दोहन करके ही गन्ने का उत्पादन कर रहे हैं, बिल्कुल वैसे जैसे कोई बैंक में रखे फिक्स डिपॉजिट को तोड़कर अपनी जीविका चलाए। अंतत: फिक्स डिपॉजिट की रकम खत्म होनी ही है। इसी तरह यदि सदियों से संचित भूमिगत जल को हम गन्ने उत्पादन के लिए उपयोग करते रहेंगे, तो वह भी जल्द ही खत्म हो जाएगा। तब देश के सामने खाद्य सुरक्षा का भी संकट उत्पन्न् हो जाएगा। गन्ने का उत्पादन करके हम उसकी खपत एथनॉल बनाने में कर लेंगे, परंतु देश के पास गेहूं और चावल उत्पादन करने के लिए पानी नहीं रह जाएगा। इसलिए एथनॉल बनाने के लिए गन्ने का उत्पादन भी बहुत कारगर विकल्प नहीं मालूम पड़ता। समस्या का तीसरा हल यह सुझाया जा रहा है कि भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई जरूरत से ज्यादा चीनी के उत्पादन को खरीदकर बफर स्टॉक बना ले। भारत में चीनी की सालाना खपत 2.6 करोड़ टन है। इसके लिए एक करोड़ टन का बफर स्टॉक हमारे पास पहले से ही उपलब्ध है और इस वर्ष 3.6 करोड़ टन चीनी उत्पादन होने का अनुमान है। इसका अर्थ है कि वर्ष के अंत तक हमारे पास दो करोड़ टन का बफर स्टॉक हो जाएगा। यदि हम गन्ने के उत्पादन की नीति पर डटे रहे तो अगले वर्ष यह और बढ़ता जाएगा। इसीलिए इस नीति के तहत चीनी के अधिक उत्पादन का हल नहीं खोजा जा सकता। गन्ना किसानों की समस्या का एकमात्र हल यह है कि गन्ना का उत्पादन कम किया जाए। इसके लिए जरूरी है कि सरकार द्वारा निर्धारित किए गए गन्ने के दामों में भारी कटौती की जाए। गन्ने का दाम कम होगा तो किसान स्वयं उत्पादन कम करेंगे। इससे पानी भी बचेगा, क्योंकि गन्ने के उत्पादन में पानी की खपत बहुत ज्यादा होती है। गन्ने की एक फसल का उत्पादन करने में लगभग 20 बार पानी दिया जाता है, जबकि गेहूं अथवा धान को दो या तीन बार सींचने से ही काम हो जाता है। एक और लाभ यह होगा कि सरकार द्वारा बिजली, उर्वरक और निर्यात पर जो सबसिडी दी जा रही है, उसकी भी बचत होगी। लेकिन समस्या यह है कि इससे किसान उद्वेलित होंगे। इसका उपाय यह है कि उर्वरक, बिजली और निर्यात के लिए दी जाने वाली सबसिडी को सरकार सीधे किसानों के खातों में हस्तांतरित कर दे। इससे किसान को सीधे रकम मिल जाएगी और उनके लिए गन्ने के अधिक उत्पादन का मोह समाप्त हो जाएगा।