मध्यप्रदेश में 28 विधानसभा उप चुनाव कालयवन- कृष्ण के बीच का युद्ध…

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास
मो.9617565371

मध्यप्रदेश में यह इतिहास लिखा जाएगा कि मात्र सत्ता हथियाने के लिए नेताओं ने अपनी जुबान से जहर क्यों निकाला और यही जुबानी जहर आने वाले समय में कहर बनकर टूट सकता है। यंू कहा जाए कि सत्ता से बेदखल हुए कमलनाथ अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए भाजपा सरकार के 15 वर्षों का हिसाब बार-बार मांग रहे हैं। गनीमत है कि शिवराज सिंह चौहान ने सहजता का आवरण ओढ़कर केवल 15 महीनों का हिसाब मांगा है, क्योंकि उन्हें पता है कि यदि मात्र 28 विधानसभा उप चुनावों के लिए 60 सालों का हिसाब गांधी परिवार की तीन पीढिय़ों के साथ काम करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ से मांगा जाएगा तो वे अपना आपा भी खो सकते हैं, जैसा कि आज उन्होंने एक सभा में खोया भी और जनता के असल मुद्दों को छोड़कर उनके समर्थकों ने महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया पर कुत्ते की समाधि को बेचने का आरोप मढ़ दिया है। आरोपों में राजनीति कैसे ढूंढ़ रहे हैं इतने अनुभवी और बुजुर्ग नेता कमलनाथ का यह अंदाज जनता समझ नहीं पा रही है। ‘राष्ट्रीय हिन्दी मेलÓ कांग्रेस नेताओं के वाक् युद्ध और शिवराज-महाराज की सहजता का जब ऑकलन करता है तो ऐसा लगता है कि मध्यप्रदेश में 28 विधानसभा उप चुनाव के नाम पर महाभारत लड़ा जा रहा है। यहां जनता भगवान कृष्ण की भूमिका में है, इसलिए वह स्वयं अपनी रक्षा पर उतारू हैं और कालयवन को हराने की बजाय पहले उसे रथ से मैदान में उतारते हैं, ललकारते हैं और कहते हैं कि लडऩा है तो मुझसे अकेले में लड़ो, यह चुनौती जब कृष्ण ने भी दुष्ट राजा कालयवन को देते हैं तो वह चुनौती स्वीकार भी करता है, अपनी सेना को छोड़कर कृष्ण के पीछे दौडऩे लगता है। शायद यही हो रहा है, जनता यहां 28 विधानसभा चुनाव में भगवान कृष्ण की भूमिका में है और कालयवन उसे हराने के लिए पीछे-पीछे दौड़ रहा है। यहां कृष्ण के रूप में जनता कालयवन से कह रही है दौड़ो-दौड़ो बुढ़ापे में गर्मी आएगी तो युद्ध करने के लिए ताकत मिलेगी और जनता है तो भाग रही है। कालयवन कह रहा है ‘रण छोड़Ó भाग रहे हो, युद्ध करने की हिम्मत नहीं है तो जनता तो यहां कृष्ण ही है, उसे अपने नए नामकरण पर गौरव की अनुभूति है। जनता जानती इसलिए है गुफे के अंदर जब मुछकुंद महाराज को कालयवन नींद से जागाएगा तो महाभारत की तरह यहां पर भी जनता याने कृष्ण अपने सामने दुश्मन को मारना नहीं चाहती, उसके इरादों को भस्म करना चाहती है। शायद इसीलिए कालयवन दौड़ रहा है, वोट के समय मुछकुंद महाराज को जब वह नींद से जगाएगा तो स्वयं भस्म हो जाएगा। यह जरूर है कि मुछकुंद महाराज अपने पापों की सजा का पश्चाताप करने किसी हिमालय में जाकर तपस्या करेंगे, जीत यहां पर जनता की ही होगी। मतलब भगवान कृष्ण की ही जीत होगी। हमें लगता है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘रणछोड़Ó को पहचान लिया है, वे लगातार इसलिए कह रहे हैं जनता ही मेरी भगवान है और आज तो संकल्प ही ले लिया कि हर सभा में हर भाषण के पहले वे घुटने के बल बैठकर जनता को प्रणाम करेंगे फिर अपनी बात कहेंगे। हमने इस संपादकीय में शिवराज सिंह चौहान को अर्जुन नहीं कहा है और हमने पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को कालयवन भी नहीं कहा है। और ना ही हम नींद में सोए मुछकुंद की तुलना किसी पूर्व मुख्यमंत्री से कर रहे हैं। परन्तु जो दृश्य बेशर्म भाषणों के मर्यादा विहीन तर्कों के हैं उससे यह जरूर आभास हो गया है कि यह चुनाव मुद्दों का नहीं है, जनता को मूर्ख समझने का बन गया है जिसकी राजनीति से नई युवा पीढ़ी असहज है, जिसे ‘शिवराज-महाराजÓ और कमलनाथ-दिग्विजय सभी में सहजता का इंतजार है। ‘मीडियाÓ तो मझधार में है उसे जान-बूझकर कालयवन और कृष्ण में अंतर ही नहीं दिखाई पड़ रहा है। परन्तु ‘मीडियाÓ को यह मालूम है कि कालयवन कौन है, कृष्ण के रूप में जनता किसके साथ जाएगी, इसलिए इंतजार कीजिए कालयवन के इरादे वाली राजनीति के अंत होने का, ताकि परिणामों के बाद तह तक जब आप विश्लेषण करेंगे, सच-सच कह पायेंगे और सच-सच लिख पायेंगे, तब उस समय निष्पक्षता और जनता की आवाज बनने के सबब में एकाकीपन महसूस जरूर होगा। जहां तक सवाल हमारे विशेष संपादकीय के लब्बोलुआब का है तो किसी को कालयवन बनने की जरूरत नहीं है, किसी को घुटने टेकने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि सहजता हमेशा ताकतवर होती है और गुस्से में गुब्बारे की तरह उड़ान चाहे जितनी भरी जाए, जमीन पर उसे आना ही पड़ता है।
विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।