कोरोना काल में आधे दर्जन मंत्रियों ने सरकार की इज्जत बचाई…

विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास
मो.9617565371
मध्यप्रदेश में 15 महीनों की कमलनाथ सरकार का तख्ता उलटकर बनाई गई भाजपा की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार को पहले दिन अर्थात् 21 मार्च 2019 से ही चुनौतियों से भरा प्रशासन का संचालन करना पड़ा। शपथ लेते ही मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ा संकट कोरोना संक्रमण अर्थात् कोविड-19 से जूझना था तथा आम आदमी को इस बात का एहसास कराना था कि वे डरें नहीं, शिवराज सरकार है तो सब कुछ मुमकिन है, सबका इलाज होगा। सबसे बड़ी चुनौती थी कि अप्रवासी लाखों मजदूर आए, उन्हें भूख से जान गंवाने की नौबत न आए, इसका पुख्ता इंतजाम शिवराज सरकार ने किया और सफलता भी मिली। इसके अलावा वित्तीय संकट से जूझते हुए मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार जब चौथी बार सत्तारूढ़ हुई तो सभी जिला कलेक्टर्स और पुलिस अधीक्षक तथा जिला स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ 24ङ्ग7 समीक्षा और आम आदमी को राहत पहुंचाने के बेजोड़ फैसलों ने सरकार को हर प्रकार की फजीहत से बचाया। यूं कहा जाए कि शिवराज सरकार में आधे दर्जन मंत्रियों ने जिसमें गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा, कृषि मंत्री कमल पटेल, नगरीय विकास मंत्री भूपेन्द्र सिंह, खनिज मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. प्रभुराम चौधरी तथा चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग ने कमाल ही कर दिया, जिसकी वजह से सरकार की इज्जत तो बची ही और आम आदमी को इस बात का भरोसा हो गया कि कुछ भी हो सरकार न हो तो कोरोना काल में जीना ही मुश्किल हो जाता। यह लिखने में भी अटपटा सा लगता है कि कोरोना महामारी से भयाक्रांत आम आदमी जिन्दगी बचाने की जद्दोजहद में था तो कुछ मंत्री और नौकरशाह अपने कद और पद को व्यापारिक बनाने में निर्लज्जता से काम पर थे, और तो और मीडिया की जितनी उपेक्षा 15 महीनों के कमलनाथ सरकार में हुई, वह शिवराज सरकार के आने के बाद कुछ महीनों तक बदस्तूर चली जिसके कारण मुख्यमंत्री से संवादहीनता की एक नई परम्परा ने जन्म भी ले लिया, हालांकि इस कमी को गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने पूरी ईमानदारी से यह कहकर पूरा किया कि मुख्यमंत्री के पास चुनौतियों का पहाड़ है, चुनाव है और जनहित के फैसलों को संक्रमण काल में भी पूरी ईमानदारी से लागू करना है। यूं कहा जाए कि संकट का यह दौर शिवराज सरकार के लिए भी वित्तीय संकट के चलते मध्यप्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता के सामने सिर ढंककर चलने जैसा ही रहा है। इसलिए कुछ आधे दर्जन मंत्रियों से लगातार संपर्क में रहे राष्ट्रीय हिन्दी मेल की टीम ने यह महसूस किया है कि इन्हीं आधे दर्जन मंत्रियों ने कोरोना काल में कुछ ऐसे अविश्वमरणीय काम कर डाले, जिससे सरकार की इज्जत बची और आम जनता संतुष्ट रही, यह कहा जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। 28 विधानसभा उपचुनाव के परिणामों ने यही साबित किया है। हम जिन आधा दर्जन मंत्रियों की बात कर रहे हैं, उनमें 70 प्रतिशत आबादी के कृषि क्षेत्र में लाखों किसानों की फसल बीमा, गांवों की पट्टे वाली जमीन पर मालिकाना हक तथा उसे बैंक में रहन रखकर गांव का किसान कारोबार के लिए ऋण लेने की पात्रता जैसे कानून का प्रावधान करके कृषि मंत्री कमल पटेल ने किसानों का रिकार्ड दिल जीता है, वहीं गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने कोरोना मरीजों की सुरक्षा और देखरेख में पुलिस के चेहरे को जितना व्यवहारिक बनाया, एक अद्भुत प्रयोग साबित हुआ है। लव-जिहाद के खिलाफ भी कानून गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के अथक समर्पित भाव से किए गए प्रयास का ही परिणाम है, जिसे अब अध्यादेश के जरिए लागू किया जाएगा। इसी तरह नगरीय विकास मंत्री भूपेन्द्र सिंह ने नगरीय निकायों में विकास के कामों को रूकने नहीं दिया जिसके कारण बेरोजगारी के उमड़ते के खतरे से सरकार बची रही। प्रधानमंत्री आवास की योजनाएं और गृह निर्माण मंडल की सभी योजनाएं भी निर्बाध जारी रहे। जहां तक सवाल खनिज मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह का है तो उन्होंने गजब ही कर दिया। वित्तीय संकट से जूझते शिवराज सरकार को खनिज रॉयल्टी के 1000 करोड़ से अधिक की राजस्व की आय से आक्सीजन पहुंचा दिया और नई खनिज नीति में 75 प्रतिशत स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर के साथ 250 करोड़ ही अतिरिक्त आय का साधन जुटाने में ऐतिहासिक सफलता अर्जित की है। इसके बाद यदि हम स्वास्थ्य मंत्री डॉ. प्रभुराम चौधरी और चिकित्सा शिक्षा मंत्री डॉ. विश्वास सारंग की चर्चा न करें तो यह रिपोर्ट बेमानी हो जाएगी। डॉ. प्रभुराम चौधरी और विश्वास सारंग मुख्यमंत्री के बाद कोविड-19 के शिकार होने वाले मंत्रियों में भी रहे, लेकिन जिस तरह कृषि मंत्री कमल पटेल ने करतब दिखाए, इन दोनों मंत्रियों ने भी गजब किया। इन दोनों मंत्रियों ने कोरोना मरीजों की चिकित्सा व्यवस्था के संचालन में पल-पल की निगरानी रखी और सरकारी अस्पतालों को 24ङ्ग7 अपने रडार पर रखा, जिसकी वजह से आम आदमी ने माना कि सरकार है तभी वे बच पाए, वर्ना दहशत ही उन्हें खा जाती। डॉ. प्रभुराम चौधरी के खाते में तो यह भी महत्वपूर्ण रहा कि वे स्वास्थ्य मंत्री होकर कोरोना से भी लड़ रहे थे और अपने उपचुनाव में भी बहादुरी से डटे रहे। परिणाम रिकार्ड 60,000 से भी अधिक मतों से चुनाव भी जीत गए। इस विशेष रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को यह जानकर खुश होना चाहिए कि उनके आधे दर्जन मंत्रियों ने कोरोना काल में सरकार की इज्जत बचाई, बस कमी एक बात की रही कि मीडिया से संवाद का सिलसिला कोरोना काल के चलते अभी प्रारंभ नहीं हुआ है, इंतजार है मुख्यमंत्री शायद इस काम के लिए अपने किसी पसंदीदा मंत्री को जवाबदारी सौंपे तो शायद संवादहीनता का दौर समाप्त हो जाएगा।

विशेष रिपोर्ट के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।