मीडिया के साथ खड़े हो गये, शिवराज आप बड़े हो गये

सेन्ट्रल प्रेस क्लब की पहल रंग लाई

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास
मो.9617565371

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विश्व में आए मानव इतिहास के सबसे बुरे दौर में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया के साथ खड़े होने का निर्णय आज अपने मंत्रिपरिषद की बैठक में अंतत: सुना दिया है। यानि मानिये शिवराज जी आपने मध्यप्रदेश में उन 8 हजार पत्रकारों के आंखों में जीवन की असुरक्षा की लेकर बह रहे आंसुओं की जो चिंता की वह मध्यप्रदेश में हजारों आक्सीजन प्लांट से कम नहीं है। आज सेन्ट्रल प्रेस क्लब के संस्थापक वरिष्ठ पत्रकार एन.के. सिंह, पद्मविभूषित विजय दत्त श्रीधर, विजय कुमार दास, राजेश सिरोठिया, वीरेन्द्र सिन्हा, मृगेन्द्र सिंह, के.डी. शर्मा, मनीष श्रीवास्तव और अक्षत शर्मा सभी ने एक स्वर में कहा है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिमान्य पत्रकारों, गैर अधिमान्य पत्रकार, प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के दफ्तरों में कैमरा मैन, फोटो ग्राफर्स, कम्प्यूटर आपरेटर, सोशल मीडिया संचालकों यहां तक कि रात-रात भर अखबारों के प्रिटिंग मशीन में काम करने वाले गैर मीडिया कर्मियों मतलब छपाई खाने के तकनीकि सहायक, प्लांट आपरेटर सबको कोरोना इलाज के लिए नि:शुल्क तथा कोविड से मृत्यु उपरांत उन्हें कोरोना योद्धा का मानकर अपना इतिहास रच दिया है। इन फैसलों को कोई माने या ना माने शिवराज को एक न्यायप्रिय मुख्यमंत्री बना दिया है, जिनके सामने कोई छोटा नहीं कोई बड़ा नहीं, परंतु सूचना तंत्र के बिना सरकार का वजूद यहीं यह बात स्थापित मध्यप्रदेश में विद्युत की करंट की तरह फैल गई है। मतलब मानव इतिहास के सबसे बड़े बुरे दौर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मीडिया के साथ खड़े हो गए, तो बड़े भी हो गए हैं। मध्यप्रदेश और देश में उनके राजनीतिक विरोधियों को भी मानना ही पड़ेगा कि राजा वही सच्चा है, जो सबके साथ सबका विकास करने में समर्थ है, परंतु अपने सूचना तंत्र नाक, कान और आंख को प्रदूषित होने से बचाने में महारथ भी उसे हासिल है। इसलिए वह चौथी बार भी सफलतम मुख्यमंत्री बनने की ख्याति अर्जित कर ले तो चौकिएगा मत। सवाल उठता है कि सेन्ट्रल प्रेस क्लब एवं विभिन्न पत्रकार संगठनों तथा मीडिया प्रतिनिधियों ने जब यह मांग उठाई कि अधिमान्य पत्रकार, फोटो ग्राफर्स, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कैमरा मैन, तकनीकि स्टाफ, संपादकीय में रात-रात भर काम करने वाले पत्रकार जो अधिमान्य नहीं है, उन्हें कोरोना योद्धा मानने से परहेज क्यों है, सवाल के इसी उत्तर में मीडिया संस्थानों के इन कर्मियों की जिस नौकरशाही ने कोरोना योद्धा मानकर प्रस्तावों पर मुहर लगवाई है, उनका जिक्र किए बिना शिवराज का ईमानदार शासक लिखा जाना बेमानी है या नहीं इस सवाल का उत्तर क्या है। जब राष्ट्रीय हिन्दी मेल के इस प्रतिनिधि ने प्रमुख सचिव जनसंपर्क डॉ. शिव शेखर शुक्ला, आयुक्त जनसंपर्क सुदाम खाड़े तथा संचालक जन संपर्क आई.पी.एस. अधिकारी आशुतोष प्रताप सिंह से गैर मीडिया कर्मी और गैर अधिमान्य पत्रकारों को कोरोना योद्धा वाली सभी सुविधाएं देने के प्रस्ताव पर चर्चा की तो मुझे यह लिखने में संकोच नहीं है कि सेन्ट्रल प्रेस क्लब के निवेदन को प्रमुख सचिव डॉ. शिवशेखर शुक्ला ने निर्देश की तरह लागू करने के लिए आयुक्त एवं संचालक दोनों को सहमत कर लिया, जिसका परिणाम सामने है। इसलिए शिवराज जी मैं यह लिखते हुए आज अपनी संपादकीय में कलम तोडऩा चाहता हूं कि आप मध्यप्रदेश में लोकतंत्र के सच्चे सेवक हैं और भविष्य आगे की ओर इशारा कर रहा है। आगे की परिकल्पना से किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि बिना महत्वाकांक्षा के राजनीति अधूरी है, लेकिन यह आपका एजेंडा है। हमारा तो इस विशेष संपादकीय का लब्बोलुआब यह है कि मीडिया के साथ इस बुरे वक्त में खड़े होने का जो दु:स्साहस आपने दिखाया है, वह अद्वितीय है, इसलिए मीडिया दोस्त भी आपके साथ खड़े रहने में कभी भी आपके संपूर्ण, जीवन यात्रा में कई पड़ाव आएंगे, उत्तरोत्तर राजनीति के पड़ाव आप तय करेंगे लेकिन आप पाएंगे कि मीडिया हर वक्त आपके साथ खड़ा हुआ है। आलोचनाओं के सैकड़ों अवसर तो हम मीडिया वालों के पास हजारों वर्ष तक उपलब्ध है, लेकिन राजा के न्याय को परिभाषित करने का अवसर हम नहीं गंवाते हुए अंत में यह अनुरोध भी करना चाहेंगे कि समाचार पत्रों की रीढ़ की हड्डी है हमारा ‘हाकरÓ इसे प्लीज सबसे पहले कोरोना योद्धा की श्रेणी में इसलिए शामिल करें, क्योंकि ठंड हो, बरसात या चिल-चिलाती धूप, यदि ‘हाकरÓ खबरों को लेकर अखबार पाठकों तक पहुंचाता है तो मीडिया की रणभूमि में इस हाकर की उपेक्षा नहीं हो सकती। यदि आप के फैसले में ‘हाकरÓ शामिल ना हो तो शामिल जरूर करें और मडिया के आकाश से लेकर जमीन तक आपकी निगाहें यह सब कुछ आपसे करवा देती है, जिसे आपको आप लायक समझते हैं भले ही कमलनाथ जी कभी लायक या कभी ना-लायक बोलने रहे समझ नहीं पाते और सबसे आगे फिर आप ही आप होते हैं, शुभकामनाएं…

विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।