चुनाव जीतना लक्ष्य है तो चुनाव लडिय़े मत…

भारतीय लोकतंत्र में भीड़ तंत्र जबतक हावी रहेगा चुनावों में जन सेवा का उद्देश्य संभव ही नही है। प्रत्येक बड़ा नेता इस अनुमान से आम सभा में तैयारी कर के जाता है कि उसे सुनने वाले हजारों- लाखों में आते हैं, परन्तु जब उसे पता चलता है कि जहां-जहां हजारों-लाखों सुनने आये थे वहीं पर उन्हें वोट नहीं मिले और उनकी पार्टी बुरी तरह चुनाव हार गयी। यदि नेता यह मानकर चुनावों में बात करे कि जनता क्या चाहती है तो वह जवाब भी जनता की अपेक्षाओं के अनुकूल दे पाते और वहां सही अर्थों में सुनने वालों के मन में नेता के प्रति आदर का भाव पैदा हो जाता है और उसे या उसकी पार्टी को वोट भी अच्छे मिलते हैं, परन्तु अक्सर ऐसा होता ही नही। सत्तारूढ़ दल के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सोचते हैं कि उनकी सरकार ने कोरोना में सबकी जान बचाने के लिए 24ङ्ग7 काम किया है, विकास का कोई मुद्दा खाली नहीं छोड़ा है, किसान भी खुश है, जवान भी खुश है इसलिए भाजपा का जीतना तय और भाषणेां का अंदाज भी ठीक वैसा ही होता है। परन्तु लम्बे समय से घर पर एक कोने में बैठे-बैठे आम जनता की बुद्धि भी अस्थिर तनाव पर है क्योंकि वह अपने परिवार और बच्चों के भविष्य की चिंता से भयभीय सा है। जिसे संतुलन के साथ सुरक्षित जिदंगी की जरूरत है और इसलिए वह अब कुछ नहीं सुनना चाहता है, वह चाहता है कि आप गांव-गांव, शहर-शहर प्रत्येक पोलिंग बूत पर यह परचम लहरा दे कि सरकारी महकमें में भ्रष्टाचार नही होगा यदि किसी शासकीय अधिकारी एवं कर्मचारी ने दिया तो सिर्फ शिकायत मिलने पर ही उसे लटका दिया जायेगा, फिर देखिये वाह-वाह के साथ-साथ वोट कितने मिलते है। शिवराज जी आप हो या वीडी शर्मा जनता को अब भाषणों से नही पटाया जा सकता और नही कमलनाथ -दिग्विजय सिंह को सार्वजनिक रूप से गाली देने से कोई हल निकलने वाला है। गाली देने का काम कमलनाथ और दिग्विजय पर इसलिये छोडिय़े क्योंकि वे विरोधी पार्टी में अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार कर गये है, उनके तो आपको गाली देने के अलावा कुछ भी नही है, और तो और वे तो कई बार कमलनाथ सरकार को डुबोने के अपराध से ग्रसित होकर अपने आप को भी गालियां देेते होंगे। इसलिये यह मान लीजिये कि कमलनाथ हो या दिग्विजय उनका चुनाव जीतना लक्ष्य है ही नही, यदि ऐसा होता तो ओबीसी के रणबाकुरे अरूण यादव को मैदान से बाहर करके हाल ही में विधानसभा हारे हुये प्रत्याशी के पिता राजबहादुर सिंह को मैदान में नही उतारते। कमलनाथ-दिग्विजय का लक्ष्य है पार्टी में एकाधिकार जो उन्होंने प्राप्त कर लिया। ठीक इसके उलट पार्टी में आपके पास सर्वाधिकार है इसलिए चुनाव जीतना ही लक्ष्य नही होना चाहिये और चुनाव जीतने के लिये आपको कमलनाथ -दिग्विजय को बार-बार जनता के सामने कोसने की शैली से उनका महत्व ही बढ़ेगा और आप जीतेंगे परन्तु जीत में वोटों का अंतर कम करने के कारण बेवजह कमलनाथ-दिग्विजय श्रेय बटोरने के हकदार हो जायेंगे। इसलिए हम तो उनसे भी कहते हैं कोरोना के बाद होने वाले इस उप चुनावों को जीतने के लिए ना लड़ा जाये, बल्कि नई पीढ़ी के लिये इसे मर्यादाओं में रहकर चुनाव लडऩे के प्रशिक्षण के रूप में परोसा जाये। ताकि आपके बाद मध्यप्रदेश में ‘राजनीति’ की विरासत केसी होगी इसका निर्णय होने लग जाये और आपकी चुनावी शैली भारतीय लोकतंत्र के लिये ‘मिल का पत्थर’ बन जाये। इस वाक्या का यह मतलब नही है कि आपको मुख्यमंत्री पद से हटाया जा रहा है, सच यह है कि आज नहीं तो कल यह काम कोई और करेगा जो आज आपके हाथ में है। इसलिये जरूरत पड़े तो कमलनाथ से कहिये कि वे आपके साथ एक मंच पर आकर अपनी बात रखकर देखे, उनकी हिम्मत नही पड़ेगी और आप पीछे नही हटेंगे, परन्तु जनता में संदेश यही जायेगा आप चुनाव जीतने के लिए नहीं जनता का दिल जीतने के लिए अब भविष्य के सभी चुनाव लड़ेंगे। यकीन मानिये चुनावी फिजा ही बदल जायेगी, जहां-जायेंगे युवाओं की टोली आपके साथ होगी बस लोकतंत्र में भीड़ तंत्र और चमचावाद से राजनीति को दूर रखा जाये और प्रत्येक ‘भष्टाचार’ पर अंकुश लगाये जिसकी शिकार आज भी भोली जनता है। चौकियेगा मत आपकी ‘लोक सेवा गारंटी’ के बावजूद भी पटवारी से लेकर कलेक्टर पंचायत में सचिव से लेकर विकास आयुक्त तक गांव के लोग कहते बिना पैसे दिये कमलनाथ सरकार में काम नही होता था और अब बिना पैसे दिये शिवराज सरकार में भी काम नहीं हो रहा है यह अवधारणा बदलनी है। इसलिए चाल चरित्र और चेहरे वाली पार्टी में बदलाव के लिये यदि चुनाव लड़ा जायेगा तो खंडवा जीतेंगे, 3 विधानसभाएं भी शिवराज ही जीतेंगे ताकि यदि कभी शिवराज सिंह चौहान देश की राजनीति में कूद गये तो यहां विरासत में क्या छोड़ रहे हैं, इन्हीं उप चुनावों में तय हो जाना चाहिये।