हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो हमारे, उद्देश्यों, उम्मीदों, उमंगों और आदर्शों पर असफलता का प्रश्नचिन्ह लगा दें

नव वर्ष नव संकल्प
अनीता चौबे
यदि हमें 2047 तक विकसित देशों को पांत में शामिल होना है तो अधिक प्रति व्यक्ति जीडीपी की दरकार होगी। नई विश्व व्यवस्था में आगे बढऩे के लिए कोविड ने हमें अपनी प्राथमिकताएं और प्रणालियों को नए सिरे से तय करने की गुंजाइश प्रदान की है। सबसे पहले इस नए वर्ष में संकल्प लें कि 2047 तक भारत को विकसित देश बनाना है। हमारे पास शानदार प्रतिभाएं हैं। उनकी संभावनाएं भुनाने के लिए हमें एक तंत्र बनाना होगा। ऐसा तंत्र जो उन्हें भी आकर्षित करे, जो भारत वापस लौटकर अगले 25 वर्षो के दौरान देश को विकसित बनाने के सपने को साकार करने में मददगार बनें। भविष्य की वृद्धि काफी कुछ इस पर निर्भर करेगी कि हम उसके लिए क्या तौर-तरीके अपनाएंगे।
छोटे लक्ष्य भारतीयों को न तो कभी उत्साहित करते हैं और न ही एकजुट। हमने हमेशा ऊंचे लक्ष्य तय कर उन्हें हासिल किया है। फिर चाहे क्रूर साम्राज्यवादी शासन से स्वतंत्रता हो, धाराओं के किरूद्ध तैरकर जीतना हमें बखूबी आता है। इस बार हमारा एकनिष्ठ लक्ष्य होना चाहिए कि अगले 25 वर्षों के दौरान देश को विकसित राष्ट बनाना है। हम एक समृद्ध, सतत और खुशहाल भारत चाहते हैं। हमें अपनी दृष्टि, संस्थानों, प्रणालियों, नीतियों, संस्कृति और मानसिकता को परिभाषित कर योजनाबद्ध ढंग से इस मुद्दे का समाधान निकालना है। इन सभी को विकसित भारत मिशन के साथ जोडऩा चाहिए। विकसित भारत मिशन के अंतर्गत हम इसका खाका खींच रहे हैं। अपने आर्थिक मॉडल पर पुनर्दृष्टि के साथ ही हमारी मानसिकता में भी बदलाव आवश्यक है। हमें सभी मतभेद भुलाकर 2047 तक विकसित भारत मिशन में जुटना चाहिए। अगर हम इसे संभव नहीं कर सके तो उसमें किसी और का दोष नहीं होगा।
हम तो अहिंसा, नैतिकता एवं ईमानदारी की केवल बातें करते हैं, इनसे राजनीतिक या व्यक्तिगत लाभ उठाते हैं, कुछ तो शुभ शुरुआत करें। क्योंकि गणित के सवाल की गलत शुरुआत सही उत्तर नहीं दे पाती। गलत दिशा का चयन सही मंजिल तक नहीं पहुंचाता। दीए की रोशनी साथ हो तो क्या, उसे देखने के लिये भी तो दृष्टि सही चाहिए। वक्त मनुष्य का खामोश पहरुआ है पर वह न स्वयं रुकता है और न किसी को रोकता है। वह खबरदार करता है और दिखाई नहीं देता। इतिहास ने बनने वाले इतिहास के कान में कहा और समाप्त हो गया। नये इतिहास ने इतिहास से सुना और स्वयं इतिहास बन गया। बेशक, हर नया साल इन सम्भावनाओं से भी भरा हुआ होता है कि हम इस तस्वीर को बदल डालने की राह पर आगे बढ़ें। लेकिन अगर हम बस हाथ पर हाथ धरकर ऐसे ही बैठे रहेंगे और अपनी दुर्दशा के लिए कभी इस कभी उस पार्टी को कोसते रहेंगे या उनके बहकावे में आकर एक-दूसरे को अपनी हालत के लिए दोषी मानते रहेंगे तो सबकुछ ऐसे ही चलता रहेगा, जैसे पिछले सात दशकों से चल रहा है। हर घटना स्वयं एक प्रेरणा है। अपेक्षा है जागती आंखों से उसे देखने की और जीवन को नया बदलाव देने की।
नया वर्ष हर बार नया संदेश, नया संबोध, नया सवाल लेकर आता है कि बीते वर्ष में हमने क्या खोया, क्या पाया? पर जीवन की भी कैसी विडम्बना! तीन सौ पैंसठ दिनों के बाद भी हम स्वयं से स्वयं को जान नहीं पाये कि उद्देश्य की प्राप्ति में हम कहां खड़े हैं? तब मन कहता है कि दिसम्बर की अंतिम तारीख पर ही यह सवाल क्यों उठे? क्या हर सुबह-शाम का हिसाब नहीं मिलाया जा सकता कि हमने क्या गलत किया और क्या सही किया? उद्देश्य के आईने में प्रतिबिम्बों को साफ-सुथरा रखा जाए तो कभी जीवन में हार नहीं होती।
आंख का कोण बदलते ही नजरिया बदलता है, नजरिया बदलते ही व्यवहार बदलता है और व्यवहार ही तय करता है कि आप विजेता बनते हैं या फिर खाली हाथ रहते हैं। इसलिये नया साल जश्न मनाने का नहीं, नजरिया बदलने का अवसर है।
एक सुखद प्रत्याशाओं के साथ आने वाले ‘नये वर्ष 2022’ की हार्दिक बधाई……..