मन मर्माहत है: आगाज ही ऐसा है तो अंत कैसा होगा

अनीता चौबे
हालांकि हिन्दू पंचांग के अनुसार नया साल 1 जनवरी से शुरू नहीं होता। हिन्दू नववर्ष का आगाज गुड़ी पड़वा से होता है। लेकिन 1 जनवरी को नया साल मनाना सभी धर्मों में एकता कायम करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है, क्यों इसे सभी मिलकर मनाते हैं। 31 दिसंबर की रात से ही कई स्थानों पर अलग-अलग समूहों में इक_ा होकर लोग नए साल का जश्न मनाना शुरू कर देते हैं और रात 12 बजते ही सभी एक दूसरे को नए साल की शुभकामनाएं देते हैं। विगत डेढ़ वर्षों से क्या आम, क्या खास सभी कोरोना जैसे वैश्वीक आपदा से इतने परेशान हो चुके हैं कि अपने जीवित होने को ही 2021 की सबसे बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं। नए वर्ष की शुरुआत भी हम कोरोंना के एक नए वेरिएन्ट के साथ ही प्रारंभ कर रहे हैं, अत: सभी अपनी तथा अपनों के खैरियत के लिए धार्मिक स्थलों पर बचे होने के लिए शुक्रिया और संभावित आपदा से सुरक्षा के हेतु अपने-अपने निजी आस्था के अनुसार धार्मिक स्थलों पर श्रद्धापूर्वक अपने को नतमस्तक कर देने को आतुर भी हैं। हालिया सर्वे के अनुसार भारतीय युवा बहुत ज्यादा धार्मिक हो गए हैं।
चूंकि साल नया है, इसलिए नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य, नए आईडियाज के साथ इसका स्वागत किया जाता है। नया साल मनाने के पीछे मान्यता है कि साल का पहला दिन अगर उत्साह और खुशी के साथ मनाया जाए, तो साल भर इसी उत्साह और खुशियों के साथ ही बीतेगा। कल मध्य रात्रि में नववर्ष के अवसर पर प्रसिद्ध माता वैष्णव देवी के दरबार में एक अफवाह एवं संभवत: प्रत्यक्षदर्शियों के टीवी पर दिए गये बयान कि भीड़ पर प्रांगण में उपस्थित सुरक्षा कर्मियों के द्वारा लाठी चलाए जाने के बाद मची भगदड़ में 14 लोगों की भीड़ से कुचले जाने से हो गई। प्रत्येक वर्ष देश के किसी न किसी कोने में इस तरह की घटनाएं घट रही है फिर भी न हम ही चेत रहे हैं न ही सरकार और जिला प्रशासन ही सब कुछ जानते हुए भी भीड़ पर नियंत्रण एवम् सुचारू रूप से कार्यक्रम संपन्न हो इसकी व्य्वस्था ही करती है। लोग पूजा-पाठ के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च अथवा अन्य धार्मिक स्थानों पर जाते हैं। उनकी इसी आस्था के कारण जगह-जगह पर अनेक धार्मिक स्थल मिल जाएंगे। चाहे कई-कई कोस तक कोई अस्पताल या स्कूल न हो, लेकिन कोई न कोई देवालय अवश्य ही मिल जाएगा। चाहे घर छोटा ही क्यों न हो, श्रद्धालु लोग अपने छोटे-छोटे घरों में भी कोई एक कोना पूजा-पाठ के लिए नियत कर लेते हैं। मूर्तियों को रखने के लिए जगह की कमी हो, तो एक दीवार पर कैलेंडर टांग कर उसी से मंदिर का काम ले लेते हैं। कुछ अमीर लोग घर के अहाते में अलग से पूरा मंदिर बनवाते हैं और उसमें सुंदर मूर्तियां भी स्थापित करवाते हैं। अपने देश में तो कई सरकारी कार्यालयों के परिसर में भी मंदिर बने देखे जा सकते हैं, जहां विशेष अवसरों पर भजन-कीर्तन और भंडारे का आयोजन होता है। बड़े-बड़े शहरों और महानगरों के उपासना-गृहों के तो क्या कहने! एक से बढ़ कर एक विशाल एवं भव्य भवन तथा कीमती पत्थरों से निर्मित व हीरे-मोतियों से जडि़त नयनाभिराम मूर्तियां। प्रश्न उठता है कि क्या पूजा-पाठ अथवा इबादत के लिए विशाल भव्य मंदिर व आकर्षक मूर्तियां अथवा अन्य पूजा-स्थल जरूरी हैं? मंदिर एक पावन स्थल माना जाता है, इसमें संदेह नहीं। लेकिन मंदिर को यह पावनता कौन प्रदान करता है? यह श्रद्धालुओं की भावना ही तो है, जो किसी पूजा-स्थल अथवा इबादतगाह को पवित्रता का दर्जा देती है।
यदि भावना शुद्ध हो तो ईंट-पत्थरों से बने निर्जीव ढांचे की क्या जरूरत है? वास्तव में कोई व्यक्ति शुद्ध भावना से जहां भी रहेगा, वही स्थल मंदिर की तरह हो जाएगा। जिस घर में सभी सदस्य शुद्ध भावना से निवास करेंगे, वह घर मंदिर सदृश हो जाएगा। मंदिर अथवा पूजा स्थल साधन हैं शुद्ध भावना विकसित करने के, साध्य नहीं। गृह, मकान, सदन, निकेत, भवन, प्रासाद, मंदिर आदि सभी शब्द घर के पर्यायवाची हैं। ये सभी शब्द कमोबेश मंदिर या पूजा-स्थल के भी पर्यायवाची हैं। हमारा घर किसी मंदिर से कम नहीं होता, लेकिन ईंट-गारे अथवा संगमरमर से निर्मित कोई मकान अथवा भव्य प्रासाद भी वास्तव में घर नहीं कहला सकता, जब तक कि उस स्थान पर रहने वालों के बीच सामंजस्य न हो। इस सामंजस्य का निर्माण कौन करता है? इस सामंजस्य का निर्माण करती है घर में रहने वाले सदस्यों की भावना, उनका प्रेम। साथ रहने वालों में सहयोग की भावना, उनका निश्छल प्रेम। एक दूसरे के प्रति समर्पण का भाव सिर्फ आलीशान कोठियों को ही नहीं, झोंपडिय़ों को भी घर बनाए रखता है। ऐसे ही किसी भी घर को मंदिर बनाया जा सकता है।
जब ईंट-गारे अथवा संगमरमर से निर्मित कोई मकान अथवा भवन घर नहीं हो सकता, तो मंदिर भी नहीं हो सकता। सात्विक भावों की सृष्टि ही किसी भवन को घर अथवा मंदिर या पूजा-स्थल बनाती है। कुछ लोग घर पर असहाय बूढ़े-बीमार माता-पिता को अकेला छोड़ कर पूजा-पाठ, सत्संग-साधना और तीर्थ-यात्रा में लग जाते हैं। ऐसी पूजा, सत्संग और तीर्थ यात्रा मात्र आडंबर है, अधार्मिकता है। उस घर से बड़ा कोई मंदिर नहीं, जहां संबंधों की गरिमा को महत्व दिया जाता हो। वास्तविक धर्म का पालन चार धाम की यात्रा में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य के पालन तथा घर को मंदिर सदृश बनाने में ही है। और घर को यदि सचमुच मंदिर बनाना हो तो पहले मन को मंदिर बनाना होगा। मन को मंदिर बनाने का अर्थ है उसे मंदिर की तरह पवित्र बनाना, उसे विकारों से रहित करना। मन मंदिर बनने के बाद किसी स्थूल मंदिर की आवश्यकता ही नहीं रहती, क्योंकि जिसका मन मंदिर हो गया, उसके लिए यह सारा ब्रह्मांड एक मंदिर हो जाता है। और इस में उपस्थित प्राणियों की सेवा व उनसे प्रेम करना उसका धर्म।
नया साल एक नई शुरूआत को दर्शाता है और हमेशा आगे बढऩे की सीख देता है। पुराने साल में हमने जो भी किया, सीखा, सफल या असफल हुए उससे सीख लेकर, एक नई उम्मीद के साथ आगे बढऩा चाहिए। जिस प्रकार हम पुराने साल के समाप्त होने पर दुखी नहीं होते बल्कि नए साल का स्वागत बड़े उत्साह और खुशी के साथ करते हैं, उसी तरह जीवन में भी बीते हुए समय को लेकर हमें दुखी नहीं होना चाहिए। जो बीत गया उसके बारे में सोचने की अपेक्षा आने वाले अवसरों का स्वागत करें और उनके जरिए जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करें। असमय काल के गाल में समाए सभी दिवंगत श्रद्धालुओं की आत्मा को शांति प्राप्त हो।