पटेल के हाथ से खिसकने से उलझी कश्मीर नीति

ई. प्रभात किशोर
अगस्त 2019 को संसद के द्वारा भारतीय संविधान की धारा 370 को निरस्त करने के साथ हीं जम्मू और कश्मीर का भारतवर्ष में एकीकरण हो गया तथा अब इस राज्य में भी सभी केंद्रीय कानूनों के साथ-साथ जन कल्याणकारी योजनाओं को लागू किए जाने का मार्ग प्रशस्त हो गया। तकनीकी रूप से, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती 31 अक्टूबर 2019 को केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में अस्तित्व में आए । वर्तमान एकीकृत भारत के वास्तुकार सरदार पटेल वास्तव में प्रथम प्रधानमंत्री हेतु प्रांतीय कांग्रेस समितियों के द्वारा प्रस्तावित थे, परन्तु गांधीजी के हस्तक्षेप के कारणवे राष्ट्र के नेतृत्व से अवैध ढंग से वंचित किए गए और आने वाले वर्षों में कश्मीर, चीन सीमा और कई अन्य समस्याएं बेवजह उत्पन्न हुई । सन 1946 से 1950 के बीच की घटनाओं के सिंहावलोकन से यह परिलक्षित होता है कि कश्मीर समस्या कुछ भी नहीं, बल्कि दूरदृष्टि, दृढ़ संकल्प, निर्णय, साहस की कमी और कतिपय महत्वाकांक्षी राजनेताओं के निहित स्वार्थ का परिणति है। हैदराबाद और जूनागढ़ की भांति कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भी 15 अगस्त 1947 कीनिर्धारित समय सीमा तक विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। प्रारंभ में सरदार पटेल बड़ी चतुराई से मामलों को निपटा रहे थे। जिन्ना ने कश्मीर में भोजन, पेट्रोल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में कटौती की नीति अपनाई तथा पाकिस्तान के द्वारा सीमा पर छापेमारी कर सैन्य दबाव भी बनाया गया। तब पटेल की पहल परभारतीय विमानों को दिल्ली-कश्मीर रूट पर डायवर्ट किया गया और अमृतसर और जम्मू के बीच संचार उपकरण स्थापित किए गए। पटेल ने 21 सितंबर 1947 को महाराजा को लिखा कि जस्टिस मेहरचंद महाजन आपको कश्मीर के हित को प्रभावित करने वाले सभी मामलों पर हमारी बातचीत का सार बताएंगे। मैंने उन्हें पूरा समर्थन और सहयोग देने का वादा किया है। पटेल ने वस्तुत: महाराजा को महाजन को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त करने का निर्देश दिया था। पटेल ने स्वतंत्र कश्मीर की निरर्थकता के संबंध में महाराजा का ब्रेनवॉश करने के लिए आरएसएस प्रमुख गुरु गोलवलकर को श्रीनगर भेजा और यह संदेश संप्रेषित किया कि पाकिस्तान आपकी स्वतंत्रता को कभी सहन नहीं करेगा और अंतत: विद्रोह करवाएगा। गुरुजी ने महाराजा को आश्वासन दिया कि सरदार पटेल कश्मीरी लोगों के हितों की रक्षा करेंगे। महाराजा द्वारा विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने की सहमति के पश्चात गुरुजी 19 अक्टूबर को दिल्ली लौट आए और पटेल को वस्तुस्थिति से अवगत कराया । 15 अक्टूबर 1947 को कश्मीर के प्रधानमंत्री ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री से पाकिस्तान के द्वारा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रोके जाने और सीमा पर बलात छापे की शिकायत की, परन्तु अंग्रेजों को अब इन मामलों से कुछ लेना-देना था। घाटी में दो राष्ट्रीय हस्तियों के बीच परस्पर विरोधी विचार थे। शेख अब्दुल्ला की साम्प्रदायिक दृष्टि एवं अति महत्वाकांक्षा के कारणउनके प्रति पटेल की नकारात्मक सोच थी; जबकि नेहरू महाराजा को पसंद नहीं करते थे और अब्दुल्ला के प्रति आत्मीय लगाव रखते थे। दरअसल, महाराजा ने नेहरू को जून 1946 में गिरफ्तार किया था, जब वह कश्मीर छोड़ो आंदोलन के दौरान अब्दुल्ला का समर्थन करने कश्मीर आए थे। नेहरू का एकमात्र उद्देश्य अब्दुल्ला को सत्तासीन करना और महाराजा को गद्दी से उतारना था। शेख अब्दुल्ला भारतीय देशभक्ति के कारण नहीं अपितु अपने निजी कारणों से कश्मीरके पाकिस्तान में विलय के खिलाफ थे। उनकी महत्वाकांक्षा कश्मीर का प्रधानमंत्री बनने की थी, लेकिन वे इस बात से पूरी तरह भिज्ञ थे कि जिन्ना के मुसलमानों कामसीहा होने के नाते पाकिस्तान में उनके लिए कोई अवसर नहीं है। सन 1947 में, भारत सरकार को खुफिया रिपोर्ट प्राप्त हुई कि पाकिस्तानी सेना कश्मीर पर आद्घमण की तैयारी कर रही है। नेहरू ने दबाव डाला कि अब्दुल्ला के सहयोग से कश्मीर का विलय होना चाहिए और कश्मीर के प्रधानमंत्री महाजन को एक पत्र लिखा कि अब्दुल्ला बाहरी खतरे से निपटने में सहयोग करने के लिए उत्सुक हैं, इसलिए महाराजा की अपनी स्थिति यथावत रखते हुए उनके साथ सत्ता साझा की जानी चाहिए।
हालाकि महाराजा हरि सिंह सरदार पटेल को विलय के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमति दे चुके थे और ऐसे किसी कदम की कोई आवश्यकता नहीं थी। महाजन को पत्र मिलने से पहले, पाकिस्तान सेना की छत्रछाया मेंलगभग 5000सशस्त्र कबायलियों ने कश्मीर में प्रवेश किया, मुजफ्फराबाद को जला दिया, लेफ्टिनेंट कर्नल नारायण सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी, महुरा में विद्युतगृह पर कब्जा कर लिया और श्रीनगर की बिजली बंद कर दी। राज्य के चीफ ऑफ स्टाफ ब्रिगेडियर राजिन्दर सिंह ने उरी में दो दिनों तक हमलावरों को उलझाये रखा, लेकिन अंतत: वे भी अपने सैन्य दलसहित वीरगति को प्राप्त हुए। पाक हमलावर श्रीनगर से मात्र 40 मील दूर बारामूला तक पहुंच चुके थे। नॉर्थ वेस्ट फ्रन्टियर प्रोविन्स के मुख्यमंत्री ने आदिवासियों को कश्मीर में प्रवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया और पाकिस्तान के जनरल अकबर खान ने खुले तौर पर पाकिस्तान की भागीदारी को स्वीकार किया। जिन्ना ने माउंटबेटन से कहा कि अगर उनकी शर्तें पूरी कर दी जाय, तो स्थिति सामान्य हो सकती है। गिलगित स्काउट के ब्रिटिश कमांडर मेजर ब्राउन ने कश्मीर सरकार से विद्रोह करते हुए गिलगित को पाकिस्तान के हवाले कर दिया। 23 अक्टूबर 1947 को, महाराजा ने पटेल को लिखा कि एक विशेष समुदाय की लगभग पूरी सेना या तो भाग गई है या सहयोग करने से इनकार कर दिया है। 25 अक्टूबर को, भारतीय कैबिनेट की रक्षा समिति की बैठक में, पटेल ने महाराजा की मदद करने की पेशकश की, लेकिन नेहरू की पहली प्रतिक्रिया थी कि सर्वप्रथम महाराजा को बिना प्रतिरोध के अब्दुल्ला को सत्ता में सहभागी बनाना चाहिए। 26 अक्टूबर को नेहरू के आवास पर महत्वपूर्ण बैठक में, महाजन और अब्दुल्ला ने भारतीय सैनिकों की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया।
पटेल ने महाजन को कश्मीर वापस जाने और महाराजा को यह बताने के लिए कहा कि भारतीय सेना कूच कर चुकी है। उसी दिन महाराजा ने जम्मू में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए और सैन्य सहायता के लिए लिखित रूप में अनुरोध किया। नेहरू के दबाव में, महाराजा ने प्रधानमंत्री महाजन के साथ-साथ अब्दुल्ला को प्रशासन के प्रमुख के रूप में रखे जाने पर सहमति दे दी। 27 अक्टूबर 1947 को सौ से अधिक विमान और एक सिख बटालियन श्रीनगर पहुंच चुकी थीे। पटेल ने पहली बार 3 नवंबर 1947 को श्रीनगर का दौरा कर स्थिति का अध्ययन किया और दुश्मन को खदेडऩे का आदेश दिया।
हरि सिंह-अब्दुल्ला फॉर्मूले के अनुसार, अब्दुल्ला को घाटी की देखभाल करनी थी और जम्मू को महाराजा के पूर्ण नियंत्रण में रखा जाना था। लेकिन महत्वाकांक्षी अब्दुल्ला ने जम्मू में भी दखल देना शुरू कर दिया। पटेल इस मुद्दे को संभालने के लिए श्रीनगर गए, लेकिन अब्दुल्ला पूरे राज्य के लिए प्रमुख बनने के लिए अड़े हुए थे। अच्चानक नेहरू ने महाराजा को पत्र लिखा कि शेख को प्रधानमंत्री बनाया जाय और उन्हें सरकार बनाने के लिए कहा जाना चाहिए। वर्तमान प्रधानमंत्री महाजन मंत्रियों में से एक हो सकते हैं और औपचारिक रूप से कैबिनेट की अध्यक्षता कर सकते हैं।