संपादकीय – क्या डालर का वर्चस्व खतरे में….?

डॉलर का वैश्विक वर्चस्व खतरे में है। विभिन्न देशों के सेंट्रल बैंक सोना जमा करने में जुट गए हैँ। इसका नतीजा है कि सोने की तुलना में अमेरिकी डॉलर के भाव में तेजी से गिरावट आई है। गौरतलब है कि दस
साल पहले तक ट्रेंड अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अधिक से अधिक डॉलर जमा करने का था।
ये खबर अमेरिका के लिए चिंता बढ़ाने वाली है कि दुनिया भर के देशों के सेंट्रल बैंक अपने भंडार में सोने की मात्रा बढ़ा रहे हैँ। सोना जमा करने की बढ़ी ललक का नतीजा है कि सोने की तुलना में अमेरिकी डॉलर के भाव में तेजी से गिरावट आई है। ये तथ्य गौरतलब है कि दस साल पहले तक ट्रेंड अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अधिक से अधिक डॉलर जमा करने का था। तब सोने की खरीद मुख्य रूप से रूस और कुछ ऐसे देशों के सेंट्रल बैंक करते थे, जो अमेरिका से टकराव की वजह से डॉलर पर अपनी निर्भरता घटाना चाहते थे। लेकिन अब ये सूरत उलट गई है। अब सोना इसलिए खरीदा जा रहा है, क्योंकि विभिन्न देश मुद्रा बाजार में संभावित उथल-पुथल से खुद को सुरक्षित रखना चाहते हैँ। मुद्रा बाजार के जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि सेंट्रल बैंकों ने अपने सोने के भंडार में बढ़ोतरी 2009 में शुरू की थी। 2008 की आर्थिक मंदी के कारण तब सेंट्रल बैंकों की सोच बदली। ये मंदी अमेरिका से ही शुरू हुई थी। इस बीच विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर को रखना सोने की तुलना में नुकसान का सौदा हो गया है। 2020 में डॉलर का मुद्रा-दर-मुद्रा अनुपात 25 साल के सबसे निचले स्तर पर चला गया। 1971 तक विश्व की मौद्रिक व्यवस्था गोल्ड स्टैंडर्ड से चलती थी। लेकिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने तब डॉलर का सोने से रिश्ता खत्म कर दिया।
मगर उसका असर यह हुआ कि विश्व मुद्रा बाजार में डॉलर की उपलब्धता तेजी से बढऩे लगी। जब ये उपलब्धता काफी बढ़ गई, तो फिर उसकी कीमत घटने लगी। आज 1971 की तुलना में डॉलर का भाव सिर्फ 20 फीसदी रह गया है। इसीलिए सेंट्रल बैंकों के लिए ये मुद्रा अब पहले जितनी आकर्षक नहीं रह गई है। तो सेंट्रल बैंकों का ध्यान फिर से सोने पर गया है। 2021 में उनके पास मौजूद सोने की मात्रा 31 वर्ष के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक 2021 में विभिन्न देशों के सेंट्रल बैंकों ने अपने भंडार में 4,500 टन अधिक सोना जमा किया। बीते सितंबर तक तमाम सेंट्रल बैंकों के पास 36 हजार टन से ज्यादा सोना था।
1990 के बाद यह सबसे ज्यादा मात्रा है। अमेरिका के लिए चिंता की खबर यह इसलिए है कि उसके वैश्विक वर्चस्व का एक बड़ा कारण डॉलर का वर्चस्व है। यह अब टूटता दिख रहा है।