दो साल का सफर, ना थके-ना रूके, चलते रहे मामा लेकिन…

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास
मो. 9617565371

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर तब मिला जब 15 महीनों की कमलनाथ सरकार को उखाड़ कर ग्वालियर चंबल के महाराजा नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाई। लेकिन भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के पहले 20 मार्च को पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के इस्तीफे के दिन यह तय हो गया था कि मध्यप्रदेश में भी कोरोना की पहली लहर ने दस्तक दे दी है और कमलनाथ की पत्रकार वार्ता में ही 250 पत्रकारों के बीच दहशत फैलाने वाला एक कोरोना पाजिटिव मरीज भी उजागर हो गया था। इसी कोरोना के चलते आनन-फानन में 23 मार्च 2020 को चौथी बार मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी हुई और राजभवन से निकलकर शिवराज ङ्क्षसह चौहान ने सीधे वल्लभ भवन आकर कोरोना के नियंत्रण की पहली बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश में जानमाल की सुरक्षा के लिए उनकी सरकार पूरी तरह सजग है और किसी भी गरीब को ईलाज के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा क्योंकि कोरोना एक ऐसी महामारी है जिसे सरकार के साथ सबको मिलकर लडऩा है। यह लिखने में संकोच नहीं है कि 23 मार्च 2020 से लेकर आज 23 मार्च 2022 हो गया है अर्थात् शिवराज ने कोरोना काल में 2 वर्ष का सफर बहादुरी के साथ पूरा किया है। यह उनके अधम्य साहस का सबसे बड़ा प्रमाण है। यह लिखने में भी संकोच नहीं है कि शिवराज सिंह चौहान स्वयं भी कोविड के शिकार हुए लेकिन जनता की रखवाली कोविड रहते हुए भी उन्होंने वीडियों कांफ्रेंसिंग के जरिए की। ओर तो ओर कोरोना काल में जब दुनिया का हर इंसान डर-डर कर जी रहा था तब मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान 18-18 घंटे अपने प्रदेश की जनता के लिए जीते थे। शिवराज के दो साल के इस सफर को आंकड़ों में नहीं समेटा जा सकता, क्योंकि यह दो साल आम आदमी के जिन्दगी के लिए कितना विशाल था इसकी कल्पना भी सरकारी आंकड़ों से हजार गुना ज्यादा बड़ी है। आप ही बताइये इस मुख्यमंत्री ने अपनी परवाह नहीं की, अपने परिवार की चिन्ता नहीं की, भयाक्रांत कोरोना काल में सारे उप चुनाव संपन्न करा दिए और एक हादसा नहीं हुआ। हादसा तो केवल इतना था कि जब पूरा देश ऑक्सीजन के अभाव में जूझ रहा था रेमडी शिविर की कालाबाजारी होने लगी थी, तब मध्यप्रदेश में कोरोना पर नियंत्रण और जरूरत मंदों को ऑक्सीजन तथा रेमडी शिविर की उपलब्धता को बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री ने सबकुछ दांव पर लगा दिया था, लेकिन कोरोना को पागल हाथी बनने से रोकने में सफलता भी पाई इसमें संदेह नहीं है। दो साल में कोरोना महामारी पर संपूर्ण नियंत्रण भी हुआ और अन्य राज्यों की तरह मध्यप्रदेश में हम हाहाकार से बचे, इसके लिए शिवराज सिंह चौहान साधुवाद के पात्र है, इसमें संदेह नहीं है। यह बात भी सही है कि 2 साल के सफर में ना तो शिवराज थके, ना तो शिवराज रूके केवल और केवल जनता के लिए चलते थे, याने ‘मामा’ ने इंक्लाबी रहने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह माना जाए तो आश्चर्य की बात नहीं होगी। जहां तक सवाल उपलब्धियों का है तो मध्यप्रदेश में 5 बिन्दुओं पर सरकार के कदम नहीं डगमगाए, जिसमें पहला मुद्दा है स्वास्थ जिसे संपूर्ण जागरूकता के साथ कोरोना काल में संभल-संभल कर संजोया गया मतलब कोरोना मरीज के अलावा आम मरीजों की भी परवाह पूरी गंभीरता से की गई, इसके लिए स्वास्थ महकमें की टीम को हमें बधाई देना चाहिए, जिसका नेतृत्व अतिरिक्त मुख्य सचिव मोहम्मद सुलेमान ने किया है। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह था कि कोरोना काल में आम जनता में असुरक्षा की भावना घर करने लगी थी, जिसे पुलिस महकमें ने पलक झपकते ही संभाल लिया और सैकड़ों पुलिस कर्मियों ने जान भी गवाई। लेकिन पुलिस बल का मनोबल एक पल के लिए भी नहीं टूटा। इसके लिए तत्कालीन पुलिस महानिदेशक विवेक जौहरी का निर्देशन और मैदान में उनकी टीम ने पुलिस अधीक्षकों के नेतृत्व में जबरदस्त समर्पण का काम किया ओर तो ओर ऑक्सीजन की सप्लाई में परिवहन आयुक्त मुकेश जैन और पुलिस के मैदानी अमले ने समूच 52 जिलों में ऑक्सीजन की कमी को मात्र 72 घंटे में दूर कर दिया। यह कोरोना काल की एक बड़ी उपलब्धि रही है। तीसरा मुद्दा कोराना काल में कुछ जिलों के कलेक्टरों की वजह से अस्पतालों में मरीजों ने अपनी जान बचाई, जिसमें सबसे पहले पत्थर बाजी के साथ भी इंदौर कलेक्टर मनीष सिंह ने जबदस्त करतब दिखाए, जबलपुर कलेक्टर कर्मवीर शर्मा वर्तमान में ऊर्जा निगम के प्रबंध संचालक ग्वालियर के कलेक्टर कोशेलेन्द्र विक्रम, भोपाल के कलेक्टर अविनाश लवानिया, खंडवा के कलेक्टर अनय द्विवेदी, वर्तमान में विद्युत मंडल के प्रबंध संचालक और बुरहानपुर के कलेक्टर तथा कटनी के कलेक्टर प्रियंक मिश्रा जान की बाजी लगाकर लोगों की जान बचाई और अतिरिक्त मुख्य सचिव आई.सी.पी. केसरी, मलय श्रीवास्तव, एस.एस. मिश्रा तथा नीरज मंडलोई तथा तरूण पिथोड़े ने तो अप्रवासी मजदूरों को घर-घर पहुंचाकर जो पुण्य कमाया है वह एक स्वर्णिम इतिहास है। यह शिवराज सरकार की उपलब्धियां है। चौथा जो सबसे अहम और बड़ा मुद्दा है पूरे दो वर्ष के कोरोना काल में मध्यप्रदेश का विकास नहीं रूका। किसानों को उनके फसल की कीमत तो मिली लेकिन रिकार्ड अनाज का उत्पादन यह साबित करता है कि सरकार ने कोरोना काल में किसी भी किसान की समस्या को नजर अंदाज नहीं किया इसलिए आने वाले समय में मध्यप्रदेश में कोरोना काल के किसानों की मेहनत अब रंग लाने वाली है। तीन सौ लाख मीट्रिक टन स्टॉक गोदाम में रखा गेहूं कल दिल्ली में जब मुख्यमंत्री जायेंगे तब वे अपनी शर्तों पर गेहूं की कीमत निर्यातकों के साथ तय करेंगे और मध्यप्रदेश को अभी तक हुए लगभग 7 हजार करोड़ के घाटे से उबारने में सफल होंगे यह भी एक उपलब्धि है। पांचवा मुद्दा है मध्यप्रदेश में ना शिक्षा रूकी ना रोजगार रूका। कुछ समय के लिए शिथिल हुआ था लेकिन वापस पटरी पर आ गया है इसलिए मुख्यमंत्री जी आप बधाई के पात्र है। बस कमी इस बात की रही की पूरे कोरोना काल में दो वर्ष तक मीडिया से और पत्रकारिता से आपको जानबूझकर दूर रखा गया है। मुझे यह लिखने में संकोच नहीं है कि जब सब काम वर्चुअल हो सकता था तो मीडिया के साथ संवाद वर्चुअल भी नहीं होने दिया, यह कैसी मजबूरी थी। इस बात को समझना होगा। मुझे यह लिखने में संकोच नहीं है कि पूरे कोरोना काल में मध्यप्रदेश के सभी वर्गों की चिंता मुख्यमंत्री के रूप में आपने दो साल तक चिंता जताई है। आर्थिक ढ़ांचे को 1 लाख करोड़ से अधिक का कर्ज लेकर भी बचा कर रखा है लेकिन मीडिया के मित्रों को अपने से दूर रखने में भले ही जानबूझकर नहीं किया हो ऐसा लेकिन कमलनाथ की तरह जरूर किया है इसमें संदेह नहीं है। इसलिए इस विशेष संपादकीय का अंतिम पेराग्राफ आपकी कीर्ति पताका में काजल के टीके की तरह हो सकता है।