मुआवजा भी नहीं दिया, नीति भी नहीं बनाई हजारों भूस्वामी परेशान, कलेक्टर हैरान

उच्च् न्यायालय द्वारा आदेशित सिलिंग से मुक्त जमीनों पर सरकारी कब्जा

मध्यप्रदेश में शहरी आबादी से सटे हजारों किसानों की सिलिंग से भूमि मुक्त करने के अनगिनत आदेश उच्च न्यायालय द्वारा पारित किये जा चुके है। परंतु सिलिंग से मुक्त हुए इन जमीनों को ना तो भू-स्वामियों के पक्ष में कलेक्टर नामांतरण करते हैं और ना ही उपरोक्त जमीनों पर जो कि राजस्व रिकार्ड में कालम-3 में सरकारी नाम दर्ज हो गया है उस सिलिंग से मुक्त जमीन का भूस्वामी को मुआवजा दिया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार उच्च न्यायालय द्वारा जिलों में कलेक्टरों को दिशा निर्देश दिया जा रहा है, कि सिलिंग से मुक्त होने वाले हजारों भूस्वामियों को नामांतरण किया जाए लेकिन ये बेचारे कलेक्टर कार्यालय के चक्कर लगाते-लगाते अपनी एक पीढ़ी का सफर तय कर चुके हैं। सूत्रों के अनुसार कलेक्टर तो साफ-साफ यह कह कर ऐसे भू-स्वामियों को भी गुमराह कर देते हैं कि अब वे सुप्रीम कोर्ट में जायेंगे लेकिन नामांतरण बिल्कुल नहीं करेंगे। सबका साथ सबका विकास के नारे सिलिंग से मुक्त होने वाले भू-स्वामियों के पक्ष में मध्यप्रदेश में कोई भी जिला कलेक्टर लागू करने को तैयार नहीं है। हजारों हजार एकड़ भूमि की सिलिंग से मुक्त होने के बावजूद विकास के पहिये रुक गये है। कलेक्टर्स भी परेशान हैं क्योंकि राजस्व विभाग ने सबको मूल मंत्र दे दिया है जिस जमीन पर कालम नं. 3 में सरकारी रिकार्ड दर्ज हो गया है, उक्त जमीन का उच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के बावजूद भी भूस्वमाी के पक्ष में नामांतरण नहीं करना है हालांकि कालम-12 में दर्ज सिलिंग से मुक्त भू-स्वामियों को कहीं कहीं पर नामांतरण कर दिया गया है। इसी के चलते कलेक्टर्स भी परेशान हैं, और यह परेशानी सबसे ज्यादा इंदौर, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, शिवपुरी, सागर तथा मालवा, निमाड़ के साथ-साथ विन्ध्य के अधिकांश जिलों में है। भू-स्वामियों का कहना है, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस को हस्तक्षेप करके सिलिंग से मुक्त जमीनी का भूस्वामियों के पक्ष में नामांतरण को नीति बनाई जाये या फिर ऐसी जमीनों की जिन पर उच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश है उन पर कलेक्टर गाइड लाइन अनुसार भू-स्वामियों की तत्काल मुआवजा दिया जाये। इसी तरह आदिवासियों की जमीनों के सामान्य वर्ग के पक्ष में विक्रय की अनुमति भी आदिवासियों को नहीं मिलती। जहां-जहां कलेक्टर अपने विवेक का उपयोग करते है वहां-वहां तो कुछ आदिवासियों को उनके परिवार की आकस्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनुमति दे दी जाती हैं, परंतु जहां-जहां पर कलेक्टर ने ठान लिया कि आदिवासी की समान्य वर्ग के पक्ष में जमीन बेचने की अनुमति नहीं देनी है तो कोई कुछ इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि सरकार ने उपरोक्त दोनों मामलों में कोई श्वेत पत्र जारी नहीं किया है। कलेक्टर तो जिले का मुख्यमंत्री होता है इसलिए उनकी मर्जी या उनसे मिलने वाला व्यक्ति पसंद आ जाये तो उच्च न्यायालय का आदेश सिर आंखों पर वरना उच्च न्यायालय के आदेशों की चुनौती देने कलेक्टर्स सुप्रीम कोर्ट जाने की बात करते है, तो भू-स्वामी घबरा जाता है। इस विशेष रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह है कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव दोनों को उपरोक्त दोनों मामले में ठोस नीति बनानी होगी वरना सूत्रों के अनुसार कई भूस्वामी तो नामांतरण का इंतजार करते-करते उपर चले गये आज तक ना ही नामांतरण हुआ नहीं मुआवजा मिला और आदिवासी अपने बेटा-बेटी पढ़ाई, लिखाई, विवाह कराने के लिए भी परेशान है क्योंकि अनुमति लेने में पीढिय़ा गवानी पड़ रही है और सरकार के पास ठोस नीति नहीं है। Toggle panel: Custom Fields