आग से झुलसने पर जनता सबक नहीं लेती सरकार गुजरात जैसा नियम नहीं बनाती…..?

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास
मो. 9617565371

मध्यप्रदेश की व्यवसायिक राजधानी इंदौर में कल एक घर आग के हवाले था और उस भीषण आग ने परिवार के 7 सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया। यह कोई पहली घटना भी नहीं होगी, ऐसी और भी आगजनी की घटनायें लापरवाही की वजह से पहले भी घट चुकी है परंतु इंदौर शहर में विजय नगर क्षेत्र में स्वर्णबाग कॉलोनी की घटना एक दर्दनाक हादसे में तब्दील हो गई। हालांकि सूत्र कहते हैं कि आग लगाने की पटकथा को उक्त मकान में रहने वाली युवती के प्रेमी ने लिखी थी जिसकी गंभीरता से सघन पुलिस आयुक्त कार्यालय द्वारा जांच भी जारी है। संजय नामक युवक की गिरफ्तारी हो भी गई, परंतु घटना से जनता को और सरकार दोनों को सबक लेने की जरूरत है। जनता क्या सबक ले और सरकार क्या नियम बनाये यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर दोनों के पास है। परंतु उक्त उत्तर को अमल में लाने के लिये ना तो जनता तैयार है और ना ही सरकार को इसकी फिक्र है। सूत्रों के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने भवनों में आग को लेकर नेशनल बिल्ंिडग कोड 2005 के अन्तर्गत सरकारी भवनों में ‘फायर फाइटिंग सिस्टम’ को अनिवार्य कर दिया है। यही अनिवार्यता शहरी क्षेत्रों में जहां पर सरकारी भवने हैं उसमें नेशनल बिल्ंिडग कोड 2005 भाग-4 एवं फायर सेफ्टी कोड आईएस 14435.1997 का पालन करने का आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने कठोरता से सुनाया है। परंतु जब तक सब कुछ भोपाल गैस कांड जैसा ना हो जाए मध्यप्रदेश में नौकरशाही स्वमोटो कुछ भी नहीं करती और खामियाजा आम जनता और सरकार दोनों को भुगतना पड़ता है। 4-4 लाख मुआवजा देकर आप किसी की जिंदगी लौटा नहीं सकते, परिवार का परिवार नष्ट हो गया उन्हें कोई खुशियां लौटा नहीं सकता। इसलिए एक ही रास्ता है जनता भी सबक ले और सरकार भी नियम बनाये। गुजरात में तो निजी आवासीय भवनों की अनुमति के लिये ही सख्त नियम बने है। बिना फायर फाईटिंग सिस्टम के गुजरात में नगरीय प्रशासन संपूर्णता का प्रमाण पत्र भी जारी नहीं करती, परंतु मध्यप्रदेश में ऐसा नहीं है। यहां तो पहले अवैध कॉलोनियां निर्मित होंगी, फिर उसको नियमित किया जायेगा और सर्वे कराया जाएगा, माफिया ढुठे जायेंगे उसके बाद भी फायर फाइटिंग सिस्टम की कोई अनिवार्यता का उल्लेख नहीं होगा गुजरात में तो उद्योग लगाने वाले को ही जिम्मेदारी होती है कि वह अपनी इकाई में सबसे पहले फायर सिस्टम लगवाये वरना घटना होने की सारी जवाबदारी उद्योगपति की होती है सरकार की नहीं। सरकार ने गुजरात में उद्योगों के लिए एनओसी भी सिंगल विंडो है, परंतु आवासीय भवनों में चाहे वह बहुमंजिला हो, एक मंजिला हो या अपार्टमेंटल भवन हो यदि ‘फायर फाइटिंग सिस्टम’ नहीं तो भवन अनुमति ही निरस्त कर दी जाती है। इसलिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैस और नगरीय प्रशासन विभाग के आयुक्त निकुंज श्रीवास्तव से यह अपेक्षा करना गलत नहीं होगा कि राज्य सरकार को नगरीय निकायों में भवन अनुमतियों के मामले में मूलभूत सभी अनिवार्यताओं के चलते ‘फायर फाइंटिंग सिस्टम’ के भी अनिवार्यता को गुजरात मॉडल की तरह अपना लेने में कोई हर्ज नहीं है। और तो और इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर जैसे मेट्रो शहर में नगर निगमो में लापरवाही और भ्रष्टाचार की सजा आम जनता क्यों भुगत रही है यह भी विचारनीय प्रश्न है। उदाहरण है इन बड़े शहरों में आज तक ‘सीवर लाईन’ के प्रोजेक्ट पूरे नहीं हुए, कही पर मंत्री नाली में उतर कर सफाई कर रहे हैं तो कहीं कहीं पर ‘सीवर लाइन’ के 400-500 करोड़ की योजनाऐं आई है परंतु पैसा कहां गया समझ में नहीं आ रहा हैं, भोपाल में तो एक ही सडक़ बार-बार बनती है, लेकिन क्यों कमिश्नर जाने। इसलिए इस विशेष संपादकीय का लब्बोलुआब यह हैं कि जनता भी सबक ले, सरकार भी सख्त नियम बनाये, अतिक्रमण विरोधी अभियान ही नगर निगमों का एक मात्र एजेंडा हो उचित नहीं है। अतिक्रमण विरोधी, माफिया विरोधी अभियान तो चलना ही चाहिये ताकि जनता को राहत मिले परंतु मूल भूत सुविधाओं में व्यापक सुधार हो सुनियोजित ढ़ंग से समय-सीमा में मास्टर प्लान आये तो बेहतर होगा, लेकिन मास्टर प्लान केवल अमीरों के लिए बने गरीबों को उसका लाभ नहीं मिले यह चिंता का विषय है।
विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।