जरुरत है संगठित अपराधों को शक्ति से रोका जाये वरना मध्यप्रदेश को छबि खराब होने से कोई बचा नहीं सकता …?

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास
मो. 9617565371

मध्यप्रदेश में भले ही शिवराज सरकार की चौथी पारी के तेवर सातवें आसमान पर है, परंतु अपराधियों के खिलाफ, रेत माफियाओं के खिलाफ, भू माफियाओं के खिलाफ, अतिक्रमण के खिलाफ, शराब माफियाओंं के खिलाफ मिशन मोड पर हमेशा नहीं रहा जा सकता, क्योंकि रेत माफिया गिर$फ्त में आते है, शराब माफिया गिरफ्त में आते है, अतिक्रमण करने वालो पर बुलडोजर चलता है, और शराब माफियाओं के ऊपर जब एसटीआई बैठ जाती है, तब दो चार महीनों के लिए ये सारे माफिया अपने-अपने बिलों में जहरीले सांप की तरह घुस जाते है। और सरकार को बदनाम करने के सारे षडयंत्रों में पिछले दरवाजें से शामिल हो जाते है। और तो और सरकार को पता तब चलता है, जब गुना के अरोन जंगल में शिकारियों द्वारा पुलिस वालों की हत्या जैसी घटना को अंजाम दे दिया जाता है। ये कड़वें शब्द लिखने का मतलब यह है कि सरकारें चाहे जितनी बार बदल जाये, अपराधियों को पनाह देने वाला आखिर वह वर्ग कौन सा है, इसकी पड़ताल में हम पीछे क्यों रह जाते है, और जब अलोकप्रिय और अप्रिय घटनाओं से हमें रूबरू होना पड़ता है तब वही होता, जो गुना के अरोन मेें हुआ। आपने आई जी बदल दिये, आप कलेक्टर बदल देंगे, आप एस पी बदल देंगे, लेकिन अपराधियों के साथ सांठ-गांठ से चलाये जाने वाली समानांतर सरकार को बदल डाले तो समझियेगा, सफलताओं की दिल्ली अब दूर नहीं है। जी हां हम जिक्र कर रहे है एनटी माफिया अभियान, बुल्डोजर अभियान, भू माफिया विरोधी अभियान, शराब माफिया विरोधी अभियान और शिक्षा माफिया विरोधी अभियान के इतर कुछ संगठित अपराधियों द्वारा अभियान ऐसे चलाये जा रहे है जो मध्यप्रदेश में किसी सरकार को चुनौती देने वाला, सरकार की छबि बिगाडऩे वाला प्रतिपल प्रतिदिन के अपराध से जुड़ा हुआ एक समानांतर सरकार जैसा शक्तिशाली गिरोह काम कर रहा है, जो नक्सलवादियों और आंतकवादियों से भी ज्यादा खतरनाक है। इस बात को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैस और पुलिस महानिदेशक मध्यप्रदेश डॉ. सुधीर सक्सेना के साथ-साथ खुफिया तंत्र को भी बेहतर ढंग से समझना होगा। इस विशेष संपादकीय का मुख्य अंश है, संगठित अपराध पर सरकार के नियंत्रण में चूक। मुख्यमंत्री की नाक के नीचे सीहोर जिले से शुरू होकर आष्टा, देवास, मंदसौर, नीमच तक इन संगठित अपराधियों का दबाव कुछ बिहड़ के कंजरो जैसा है जो आधी रात को भरे ट्रकों को काट कर ले जाते है, इस इलाके में इन्हें, बेटियों की शादी के पहले पैसा पहुंचाना पड़ता है, ठेकेदारी और विकास के काम करने के नाम पर इन्हें पैसा न दिया जाये तो आपका जीना हराम हो जाता है। यह तो एक वाक्या है दूसरा वाक्या तो अपराधों के कहर जैसा है, अन्य राज्यों से अनजाने आने वाली भारी वाहनों व बड़े-बड़े ट्रक बाइस चक्के, 18 चक्के, 16 चक्के, 12 चक्के, परिवहन चौकियों पर सब कुछ ठीक होते हुए, कागजात ठीक होते हुए, नियमों के अंतर्गत संचालित होते हुए भी, आठ से 9 घंटे तक खड़े हो जाते है। सारे ड्रायवर बेचारे अपने दो जून की रोटी का पैसा तक नहीं बचा पाते, भूखे मर जाते है, लेकिन कोई कटर इन्हें नहीं छोड़ता। 2000 रूपए से लेकर 10,000 रुपए तक प्रति ट्रक वसूल लिए जाते है। हर गरीब ड्रायवर सिर्फ एक ही बात कहता है कि शिवराज सरकार में यह एक ऐसा अंधेर है, जो कल्पना से बाहर है। लेकिन उनकी बात संगठित अपराधियों के मिलीभगत के कारण सरकार के शिखर तक पहुंचती नहीं और बदनाम सरकार होती रहती है। और बदनामी का बीड़ा उठाकर बेचारे गरीब ड्रायवर बमुश्किल अपने मंजिल पर पहुंचते है। माना कि परिवहन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत और परिवहन आयुक्त मुकेश जैन इस तरह की गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं करते लेकिन जब सांठ-गांठ होती है तो वे भी क्या करें। इसी तरह तीसरा वाक्या है मेडिकल माफियाओं का, भोपाल के ही डॉ. सुनील कपूर ने फर्जी वाड़े के माध्यम से साढ़े तीन सौ करोड़ की कीमती सरकारी जमीन एडवांस मेडिकल कॉलेज के नाम पर हथिया ली है और सरकार कुछ नहीं कर पाई। दूसरी और किसानों को ठगने वाले खाद बीज माफियाओं ने कहर बरपा रखा है, जिनके खिलाफ एफआईआर हुई वे ही लोग फिर से खाद बीज की दलाली करने में सफल हो गए और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े ईमानदार लोगों की टीम को बाहर निकाल दिया गया है। इस विशेष संपादकीय का लब्वोलुआब यह है कि उपरोक्त दर्शाये गए कुछ संगठित अपराधों के उपर सरकार के नियंत्रण में चूक की कीमत मध्यप्रदेश की भोली भाली जनता को चुकाना पड़े तो चौकिएगा मत।
विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।