संसद भवन में कानून हीनता आखिर कब तक…

संडे डायरी- अनीता चौवे ( मो. 9893288371 )
राष्ट्रपति चुनाव की गहमागहमी में हम शायद ये भूल बैठे है कि संसद का
मानसून सत्र भी चल रहा है और लगातार किसी ना किसी अवरोध के
कारण अभी तक के सत्र में कोई भी कार्यवाही नहीं हुई, और पूरा सत्र हंगामें कि
भेंट चढ़ गया है, आज की इस संडे डायरी में हम बाधित होती संसदीय कार्यवाही
का जिक्र इस लिए कर रहे है क्योंकि मौजूदा सत्र में भी कोई काम अभी तक नहीं
हो सका है, हर बार की तरह इस बार भी सत्र में सिर्फ हंगामा ही देखने को मिल
रहा है। हम संसदीय कार्यवाही को कवर करने के लंबे सालों में भी यह नहीं समझ
पाए हैं कि विरोध की तख्तियां, रसोई गैस के सिलेंडर, दूध, दही, छाछ के पैकेट
और डिब्बे या कटआउट आदि संसद परिसर में कैसे घुस जाते हैं? सदन के भीतर
भी ये चीजें कैसे लेकर जा सकते हैं? क्या सांसद सदन के भीतर कुछ भी ले जा
सकते हैं? ऐसा तो कोई नियम-कानून नहीं है। परचा, इश्तहार, कोई प्रचार सामग्री
तक पर पाबंदी है। संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास विरोध-प्रदर्शन
आदि बदस्तूर जारी हैं, जबकि सर्कुलर के जरिए उन पर पाबंदी के दिशा-निर्देश
दिए गए थे। क्या संसद भवन में कानूनहीनता और अराजकता की पूरी अनुमति है?
बहरहाल अभी तक कार्यवाही स्थगित किए जाने से करीब 45 करोड़ रुपए पर पानी
फिर चुका है। एक मिनट की कार्यवाही पर करीब 2.6 लाख रुपए खर्च होते हैं।
चूंकि एक पूरे दिन की कार्यवाही औसतन 7 घंटे की होती है, लिहाजा दोनों सदन स्थगित करने
पड़ें, तो औसतन 15 करोड़ रुपए स्वाहा हो जाते हैं। तीन दिन में यह राशि 45 करोड़ रुपए तक जाएगी। यह देश के करदाताओं का पैसा है, जिसे विपक्ष अपनी राजनीति के लिए
फूंकने पर आमादा है। अब विरोध-प्रदर्शन, धरने, हंगामे आदि प्रवृāिायां बन गई हैं,
बेशक लोकतंत्र में विरोध का भी संवैधानिक स्थान है, लेकिन यह मर्यादित, समयबद्ध
और प्रतीकात्मक होना चाहिए। संसद की कार्यवाही जब भी हंगामों और स्थगन का
शिकार हुई है, हमने उसका बुनियादी विरोध किया है। यह लोकतंत्र और संसद की
गलत व्याख्या है कि गतिरोध भी लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा है। जब भाजपा विपक्ष
में थी और विभिन्न घोटालों तथा विवादों के मद्देनजर उसने 15-15 दिन तक संसद
की कार्यवाही नहीं चलने दी थी, तब भी देश की प्रतिक्रिया नाखुश और विरोध में
थी। संसद बाधित होती है, तो देश के औसत नागरिक को आघात लगता है, क्योंकि
संसद का यह जनादेश नहीं है। लोकतंत्र और गणतंत्र के सबसे पवित्र, महान और
गरिमापूर्ण मंदिर संसद का मकसद सिर्फ यही नहीं है कि सदन में हंगामेदार हरकतें
की जाए। अध्यक्ष या सभापति अथवा पीठासीन अधिकारी के आसन के करीब
वेल में जाकर नारेबाजी, बैनरबाजी की जाए और कार्यवाही को स्थगित करने को
विवश किया जाए। क्या इस पर कभी कोई हल खोजा जायेगा या फिर बार बार
संसद की कार्यवाही ऐसे ही हंगमों की भेंट चढ़ता रहेगा।