चुनावी पार्टियों का काला सच…

संपादकीय: अनीता चौबे
राजनीति और चुनाव के नाम पर जो अंधेरगर्दी रही है, उस पर से आयकर विभाग ने परदा कुछ हटा दिया है। राजनीतिक दलों की आड़ में बहुत कुछ ऐसा होता आया है, जिस पर चुनाव आयोग या सरकार की निगाह नहीं थी। आयकर विभाग ने दिल्ली, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, हरियाणा और कर्नाटक में करीब 205 ठिकानों पर छापे मारे हैं और अनेक कथित राजनीतिक दलों का भंडाफोड़ किया है। यह शर्मनाक बात है कि झुग्गियों, गुमटियों से भी राजनीतिक दल चल रहे हैं और करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे कर रहे हैं। आयकर अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में एक ऐसी पंजीकृत, पर गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी का पता लगाया, जो घड़ी मर्मत करने की दुकान से संचालित होती थी और जिसने पिछले तीन वर्षों में चंदे के रूप में 370 करोड़ रुपये स्वीकार किए थे। जाहिर है, आयकर विभाग के लिए उस व्यक्ति का पता लगाना जरूरी हो गया, जो एक राजनीतिक पार्टी के नाम पर अरबों रुपये के वारे-न्यारे कर रहा है। घड़ी दुकान के मालिक के अलावा ऐसे राजनीतिक दल के मालिक की धर-पकड़ भी जरूरी है, जिसके लिए राजनीति या पार्टी एक कारोबार मात्र है। ऐसी पार्टियां न जाने कब से काला कारोबार चला रही हैं। वास्तव में, यह गंभीर अपराध है कि ऐसे अनेक कथित राजनीतिक दल काले धन के शोधन या आयकर बचाने के कारोबार में लगे हैं। पता यह चल रहा है कि ऐसे दलों को धन शोधन के एवज में तीन से पांच प्रतिशत कमीशन मिलता है। मतलब, जिस कथित पार्टी प्रमुख ने 300 करोड़ रुपये को चंदा स्वरूप लेकर काले से सफेद बनाया है, उसे नौ करोड़ रुपये का फायदा हुआ होगा। यदि कोई एक राजनीतिक पार्टी का पंजीकरण भर करा ले, चुनाव भी न लड़े, तब भी करोड़पति बन सकता है। फिर सवाल उठता है कि ऐसी गैर-मान्यता प्राप्त पंजीकृत पार्टियों से किसको लाभ है। ऐसी पार्टियां न तो जमीनी संघर्ष कर रही हैं और न ही नैतिकता का पालन। इनका एक ही काम है, समाज में भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप से मजबूत करना। मुंबई की एक झुग्गी से ऐसी पार्टी चल रही है, जिसे दो साल में 100 करोड़ रुपये चंदे में मिले हैं, मतलब इस पार्टी का मुखिया दो साल में तीन करोड़ रुपये कमा गया। यह गलत परिपाटी या आर्थिक भ्रष्टाचार उन लोगों के साथ अन्याय है, जो वास्तव में बहुत संघर्ष करके दो जून की रोटी जुटाते हैं। राजनीतिक दलों के पंजीकरण को इसलिए उदार नहीं बनाया गया था कि कोई पार्टी अपना धंधा चमकाने लगे। वास्तव में, राजनीतिक पार्टियों को जब कोई चंदा देता है, तो उतनी राशि पर उसे आयकर में छूट का लाभ भी मिलता है। काफी सारा पैसा राजनीतिक दलों के पास ऐसा आता है, जिसके स्रोत का खुलासा नहीं करना पड़ता है। दान या चंदे को राजनीतिक दल आसानी से छिपा सकते हैं, क्योंकि उनकी नकेल कसने का कोई विशेष इंतजाम नहीं है। जब भी चंदे को आधिकारिक या पूरी तरह से घोषित या पारदर्शी बनाने की चर्चा होती है, तब बड़े राजनीतिक दल आगे बढ़कर अपनी अबाध आर्थिक आजादी सुनिश्चित करते हैं। आयकर विभाग ने इस सिलसिले में छापे मारकर साहसिक काम किया है। यह प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। बड़े दलों के खातों की भी पड़ताल होनी चाहिए। यह न्यायोचित नहीं कि महज छोटे दलों को ही निशाना बनाया जाए। चुनाव आयोग को भी सक्रिय होना चाहिए, जब 55 पार्टियां ही मान्यता प्राप्त हैं, तो 2,000 से ज्यादा अन्य पंजीकृत पार्टियां किस काम में लगी हैं? और इनका पंजीकरण आखिरी किस आधार पर और किसने किया ,इसकी पड़ताल होनी चाहिए….।