शिवराज-कमलनाथ दोनों बेखबर, जयस की हो रही है जय जयकार

कड़वी खबर: विजय कुमार दास मो. 9617565371
“जनसंपर्क आयुक्त को मतलब नहीं, खुफिया तंत्र कमजोर”
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान भारतीय जनता पार्टीं को 2023 विधान सभा चुनाव में जीतने के लिए एड़ी चोटी का दांव लगा रहे है। और दूसरी और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ हर हालत में 2023 को कांग्रेस की दोबारा सāाा का वर्ष बनाते हुए फिर से मुख्यमंत्री बनना चाहते है। हालाकि ये दोनों नेता अति परिपक्व है लेकिन जब भी इन्हें नुकसान होता है, तो इनकी कोटरी की वजह से होता है। यह लिखने में संकोच नहीं है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश भर में आदिवासियों को अपना बनाने का अभियान चला रखा हैं, जिसके चलते उन्होंने सर्वोच्च पद पर आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को महिमा मंडित भी किया है। परंतु मध्यप्रदेश में भाजपा के शिखर पुरूष बन चुके अति परिपक्व नेता मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री बुजुर्ग एवं अनुभवी कमलनाथ इस बात को लेकर बेखबर हैं, कि आदिवासी संगठन जयस ने आदिवासी बाहुल्य इलाकों में अर्थात 2 करोड़ से अधिक मतदाताओं के बीच में अपने पैर पसार लिए हैं। जहां तक सवाल है मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का तो उनकी कोटरी में सरकार की छबि के लिए ज्मिेदार विभाग जनसंपर्क के आयुक्त राघवेन्द्र सिंह को जयस के विस्तार से होने वाले नुकसान के बारे में कोई अंदाज ही नहीं है। इस बात का प्रमाण इससे ही मिलता है कि जयस संगठन के नेताओं को आदिवासी मतदाता अपने परिवार का सबसे बड़ा हितैषी समझ रहे है और इसी के चलते आदिवासियों से शिवराज सरकार की दूरियां लगातार बढ़ते जाना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। और तो और जयस संगठन के विस्तार में युवाओं की संख्या 5 लाख से अधिक हो चुकी है। और मध्यप्रदेश सरकार का खुफिया तंत्र विस्तृत जानकारी जुटा नहीं सकने के कारण असहाय की मुद्रा में है। यदि आप जयस के द्वारा नीमच में हुई आदिवासी युवक के साथ घटना को लेकर शक्ति प्रदर्शन पर बारीकी से नजर डालें तो पता चलता है कि जयस की जय-जयकार करने के लिए मध्यप्रदेश का आदिवासी तैयार हो रहा है। आदिवासियों का जयस की तरफ झुकाव सरकार की आदिवासी योजनाओं के प्रचार-प्रसार में कोताही, लापरवाही और नासमझ बहुत बड़ा कारण है।क्योंकि जनसंपर्क विभाग मुख्यमंत्री की राजनीति से कोई मतलब रखने को तैयार हीं नहीं। यदि जनसंपर्क विभाग को मध्यप्रदेश की 47 आदिवासी विधानसभा क्षेत्रों के बारे में यह मालूम होता कि संवादहीनता के कारण वे सभी आदिवासी मुख्यमंत्री से दूर होते जा रहे है, जिनके लिए मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार की प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दिया है। तो उन्हे पता चलता कि मुख्यमंत्री की अच्छी छवि और अकारण होने वाली खराब छवि का मतलबक्या है। 2023 के विधानसभा चुनाव में अब यही जयस संगठन 87 सीटों पर आदिवासी मतदाताओं को नक्सलवादियों की तरह भले ही न सही लेकिन आदिवासियों के लिए दबंग और देवता की तरह उनका हितैषी बनकर भाजपा को नुकसान पहुंचाये तो आश्चर्य की बात नहीं होगी। हालाकि श्योपुर जिले में प्रधानमंत्री का चीता अभियान आदिवासियों को क्षणिक लुभावन के लिए प्रभावशाली दिखाई देता है, परंतु आदिवासी यह जानते है कि कूनो नेशनल पार्क में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए चीते बहुत अच्छे है। लेकिन चीतों की वजह से आदिवासियों के मन में शिवराज सरकार के लिए समर्पण का भाव जाग यह संवाद हीनता के कारण संभव तो नहीं है। यह संभव तो तभी होगा जब शिवराज सरकार का प्रत्येक महकमा भ्रष्टाचार के लिए जीरो टालरेंस पर काम करें। और उसके प्रचार-प्रसार के लिए जनसंपर्क विभाग का मुखिया राघवेद्र सिंह जैसे विवादित नौकरशाह सफल नहीं है। इस बात को आज नहीं तो कल समझियेगा। यह बात मुख्यमंत्री को बाद में समझ में आयेगी जब नुकसान हो चुका होगा। और तो और खुफिया तंत्र की नजर यदि आदिवासी बाहुल्य इलाके में जयस की हो रही जय-जयकारों के प्रति पैनी नहीं हुई तो कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ सैकड़ो बार यह दोहराये कि जयस के अध्यक्ष डॉ. हीरालाल अलावा उनके संपर्क में है कोई फर्क नहीं पड़ता। यह लिखने में संकोच नहीं है कि डॉ.हीरालाल अलावा का जय-जयकार आदिवासी बाहुल्य इलाके में जय-जय कलमनाथ से 100 गुना भारी है। राष्ट्रीय हिन्दी मेल की टीम ने श्योपुर से लेकर बड़वानी और मंडला से लेकर अनूपपुर और झाबुआ से लेकर अलीराजपुर सभी आदिवासी इलाकों में जयस के बारे में जो जानकारी जुटाई है, वह चौकाने वाली है। मध्यप्रदेश के 84 विधानसभा क्षेत्र आदिवासी मतदाताओं के प्रभाव से अछूते नहीं है। यदि आप 2013 से लेकर आज तक के जयस संगठन की गतिविधियों पर नजर डालते है तो पता चलता है कि जयस ने राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारियों को महाकौशल में कमलनाथ और मध्य भारत तथा मालवा निमाड़ में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चुनौती देने के लिए अपना व्यापक विस्तार कर लिया है। मान लेने मे हर्ज नहीं है, इस कड़वी खबर का लब्बो लुआब यह है कि सāाारूढ दल के मुखिया शिवराज सिहं चौहान के लिए खुफिया तंत्र का कमजोर होना और जनसंपर्क विभाग में विवादित नौकरशाह को अनावश्यक झेलना। जयस के मामले में भारी पड़ सकता है। जबकि दूसरी और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का भ्रम तोडऩे में जयस भारी पड़ जाये तो चौकिएगा मत।