राष्ट्रवादी मुसलमान, मोहन भागवत को राष्ट्रपिता मानने लगे…

संडे डायरी: विजय कुमार दास (मो.9617565371)
हिन्दुस्तान की धरती पहली बार सांप्रदायिकता के आग में झुलसती हुई नजर आ रही है। और इस आग में घी डालने के लिए हिन्दू मुसलमान दोनों बराबरी के हिस्सेदार है। और दोषी वे लोग है जो अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के लिए देश की जनता के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे है। माना कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत कभी महात्मा गाँधी नहीं बन सकते लेकिन महात्मा गाँधी की पाठशाला में ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये, पीर पराई जाने रे के मूल मंत्र को अपनाने की कोशिश की है। तो उसमें ऐतराज जताने की राजनीति ठीक नहीं है। हमारा दुर्भाग्य है कि हम जननायकों के ईमानदार कोशिशों को भी मजाक में लेने लगे है। और नई पीढ़ी हमसे आरोप प्रत्यारोप की राजनीति के अलावा इतिहास के पन्नों को झांकने के लिए तैयार नहीं है। देश की पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी इस बात के लिए श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने हिन्दुत्व की रक्षा के लिए भले ही रथ यात्रा निकाली और पूरे देश से आये हुए कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद को बहाने हिन्दूत्व की आधारशिला रखी और इस बात पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी.नरस्हिाराव ने मौन स्वीकृति प्रदान की थी। मतलब हिंदूत्व के मुद्दे को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री नरस्हिाराव, लालकृष्ण आडवाणी और स्व. अटल बिहारी बाजपेयी हिन्दू राष्ट्र भावनाओं के खिलाफ नहीं थे इस कड़वे सच को देश के सभी राजनैताओं को समझना होगा। मुझे लगता है कि देर से सही लेकिन सही समय पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मदरसो एवं मस्जिदों में जाकर भारत के राष्ट्रवादी मुसलमानों के साथ मिल बैठकर समस्या का हल निकालना चाहते है, तो ऐसे सकारात्मक क्षणों में राजनीति को दूर रखना चाहिए। मैं आज यह बात पूरी शिद्दत के साथ लिखना चाहता हूं कि हिन्दुस्तान में कोई भी हिन्दू और कोई भी राष्ट्रवादी मुसलमान जिसे भारत देश से प्रेम है, वे भारत के लोगों को अपना परिवार मानते है ऐसे लोगों को एक साथ रहकर देश मजबूत करने कवायत में यदि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ईमानदार कोशिश कर रहे है। और राष्ट्रवादी मुसलमान उन्हें राष्ट्रपिता कहकर संबोधित कर रहे है। तो देशवासियों को खुश होना चाहिए। खुश इसलिए नहीं कि मोहन भागवत मुसलमानों की टोपी नहीं पहनते थे अब उनके मदरसों में जाने लगे है। खुश इसलिए होना चाहिए कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख ने अपनी इस पहल में यह संदेश देने की कोशिश की है कि आप भारत में रहने वाले तीस करोड़ लोगों का हक नहीं छीन सकते। मोहन भागवत ने यह महसूस किया है कि भारत के संविधान की शपथ लेने वालों को यह सोचना ही पड़ेगा कि हिन्दू हो या मुसलमान भारत का देश भक्त वह है या नहीं किसी भी व्यक्ति को इस बात की इजाजत नहीं दी जा सकती कि वह भारत में रहकर पाकिस्तान जिन्दाबाद करें और विध्वंस के लिए पापूलर फ्रंट ऑफ इंडिया का निर्माण करें। रहा सवाल राहुल गाँधी की भारत जोड़ों यात्रा का उनकी अवधारणा गलत नहीं लेकिन भारत जोड़ों यात्रा भारत में किसी एक समुदाय को संतुष्टी प्रदान करने के लिए की जा रही है तो उसके परिणाम अच्छे नहीं हो सकते इसलिए राहुल गाँधी के मन में जो कुछ भी हो भारत जोड़ों यात्रा भारत तोड़ो यात्रा नहीं बनेगी। पाँच दशकों की पत्रकारिता के सफर में मैंने पहली बार महसूस किया है कि भारत अंर्तकलह की बारूद की आग पर बैठा हुआ है बस एक चिंगारी की जरूरत है। जिसे ढूंढने में मीडिया में सुर्खियों पर रहने वाले सभी बड़े नेता अपनी जेबों में लेकर घूम रहे है। भारत का मैदान-ए-जंग आज भी गंगा जमुनी संस्कृति से तहजीब से आच्छादित है। और इस फिजा को ध्वस्त करने के पहले प्रत्येक नेता को अपने गिरेबान में झांककर हमेशा सोचना चाहिए। वर्ना आग लगते देर नहीं होगी आप तो बयान देकर चले जायेंगे और भारत जैसा विश्व गुरू देश ढेर हो जायेगा। इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और मोहन भागवत ने यदि मुसलमानों के हित में सोचने की गुंजाईश भी निकाल ली है तो उसका स्वागत कीजिए साहब। मोहन भागवत के मदरसे में जाने की घटना को लेकर राजनीति से बचा जाये तो बेहतर होगा। हमारी संड़े डायरी का लब्बो लुआब यह है कि 140 करोड़ की आबादी वाले इस देश से 30 करोड़ मुसलमानों को पराया समझकर आप देश नहीं चला सकते यह बात मोहन भागवत को या भारतीय जनता पार्टी देर से समझ में आई है। तो इस अवधारणा का सब मिलकर स्वागत करें, अभिनंदन करें तो आने वाली नई पीढ़ी को आग में कभी भी झुलसना नहीं पड़ेगा। हमारा यह मतलब कतई नहीं है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हो या फिर कांग्रेस के मणीशंकर अय्यर क्यों ना हो अपने बयानों से विचार धारा की आड़ में अपनी ही पार्टी को कमजोर करते है। यह बात भी उन्हें समझना होगा। और यह भी समझना होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विपक्ष के नेता के रूप में केवल राहुल गाँधी की ही आवश्यकता है किसी और की नहीं…