जनसंपर्क आयुक्त की लापरवाही के कारण, मुख्य सचिव जवाब नहीं दे सके

विशेष रिपोर्ट: विजय कुमार दास मो. 9617565371
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अच्छी खासी बेधड़क पूरी रफ्तार से चलती हुई सरकार पर अचानक एक तथाकथित पोषण आहार घोटाने ने ब्रेक लगा दिया, यूं कहा जाये कि सरकार का पक्ष रखने वाले प्रमुख नौकरशाह जनसंपर्क आयुक्त राघवेन्द्र सिंह की अज्ञानता एवं खबरों के प्रति लापरवाह रवैये के कारण मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव दोनों की फजिहत हो गई। यह बात अलग है कि जनसंपर्क विभाग के दूसरी कतार के एक अधिकारी ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को डिफेन्सिव होने की सलाह देकर मामले को ठंडा कर दिया लेकिन आग अभी पूरी तरह नहीं बुझी है। और तो और जब मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव मीडिया में किसी नाजुक मुद्दे को लेकर विवाद में उलझ जाते है तो जनसंपर्क आयुक्त की ज्मिेदारी होती है कि वह सरकार पक्ष रखने और डेमेज कंट्रोल करने के लिए मीडिया से बेहतर संवाद स्थापित करे ताकि सच का पता सबको लगे और तथाकथित घोटालों के आरोपों से मुख्यमंत्री को और मुख्य सचिव को नीचा ना देखना पड़े। आश्चर्य एवं चौंकाने वाली घटना यह है कि, एक राष्ट्रीय न्यूज चेनल द्वारा महिला बाल विकास विभाग में पोषण आहार घोटाले को लेकर 3 दिनों तक सनसनी फैली रही, कहा गया पोषण आहार योजना पर पलीता लगाते हुए ट्रकों का पोषण आहार मोटर बाईक से टनों में आंगनबाड़ी केन्द्रों पर तथा स्कूली बच्चों तक इसे पहुंचाया गया। सुर्खियों में आने के बाद पोषण आहार घोटाले की वजह से 5 दिन का विधानसभा सत्र साढ़े तीन घंटे में समाप्त करते हुए मुख्यमंत्री डिफे न्सिव हो गये लेकिन आज तक तथाकथित पोषण आहार घोटाले को लेकर महालेखागार को भेजा जाने वाला जवाब पूरा नहीं हो सका है क्योंकि जनसंपर्क आयुक्त को सरकार की छबि जाये तेल लेने, खबरों से और वास्तविक पत्रकारिता से कोई मतलब नहीं है। राष्ट्रीय हिन्दी मेल के इस प्रतिनिधि ने तथाकथित पोषण आहार घोटाले को लेकर सूक्ष्म अन्वेषण किया है, और यह लिखने में वह 200 प्रतिशत संतुष्ठ है कि उपरोक्त घटना को लेकर यदि जनसंपर्क आयुक्त अपनी भूमिका का निर्वहन ठीक से कर लेता तो मुख्यमंत्री को फजीहत होने से बचाया जा सकता था। यह बात अलग है कि महिला बाल विकास विभाग मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास ही है इसलिए उन्होंने बनते कोशिश सरकार की छबि को बचाने के लिए मुख्य सचिव की सलाह पर यह कहकर मामले को नासूर बनने से बचा लिया कि महालेखागार की रिपोर्ट प्रारंभिक जांच रिपोर्ट है। लेकिन सच्चाई यह है कि महालेखागार को इस खबर के लिखने तक संपूर्ण जवाब बनाकर भेजने में मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस के पास जानकारियों का आभाव तो नहीं है परंतु संबंधित संस्थाओं से भेजे गये तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया गया है, और जनसंपर्क आयुक्त को इन मुद्दों से कोई लेना देना नहीं है वे तो मध्यप्रदेश में सच्चाई से जुड़ी खबरों पर गंभीरता से पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों की दूरी सरकार से जितनी ज्यादा हो जाये एक सूत्रीय काम पर लगते हुए 2023 तक पूरी मटिया मेट करने में जुटे हुए है ऐसा मान लेने में किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। बता दें कि तथाकथित घर पहुंच पोषण आहार की योजना मध्यप्रदेश में 7 सरकारी पोषण आहार संयंत्रों द्वारा पूरा किया जाता है। सन् 2018- 19, 2019-20, 2020-21 वर्षाे का इस योजना को लेकर महालेखागार द्वारा एक जांच रिपोर्ट तैयार की गई है जिसमें महालेखागार ने संदेह व्यक्त किया है कि उपरोक्त सात पोषण आहार सरकारी केन्द्रों में योजना के क्रियांवयन में 5 बिंदुओं पर भयानक गड़बडी की आशंका है। महालेखागार ने अपनी रिपोर्ट में शिवराज सरकार से महिला बाल विकास की उपरोक्त योजना में वितरण की तथा उत्पादन की गुणवāाा दोनों मुद्दों पर सवाल खड़े किये है। महालेखागार ने कहा है कि पोषण आहार को जिन ट्रकों में पहुंचाये जाने का जिक्र किया गया है उनके न्बर ट्रकों के नहीं बल्कि मोटर बाईक के हैं, इसलिए मोटर बाईको से पोषण आहान टनों में पहुंचाया जाना संभंव ही नहीं है इसका जवाब मांगा है दूसरा। जिन संयंत्रों में जितने किलो वाट की बिजली जलाई गई है उसका उत्पादन उतने किसी वाट की बिजली से कई गुना ज्यादा कैसे हो गया है, मतलब यदि पाँच किलो वाट बिजली में एक टन पोषण आहार का उत्पादन होता है तो फिर इतनी ही बिजली में 3 टन पोषण आहार कैसे उत्पादित हो गया इसका उन्हें जवाब चाहिए। तीसरा बिन्दू अत्यंत ही संवेदनशील और गंभीर यह था कि संयंत्र के उत्पादन की क्षमता यदि 2,000 मैट्रिक टन प्रतिमाह है तो 3,000 से अधिक मैट्रिक टन का उत्पादन कैसे संभव हुआ मतलब सप्लाई की रसीदे काट दी गई थ और उतना उत्पादन था ही नहीं। चौथा मुद्दा यह था कि महिला बाल विकास द्वारा जितने बच्चों को टेकहोम पोषण आहार देने का जिक्र किया गया उतने बच्चे भी उपलब्ध नहीं थे तो स्कूल शिक्षा विभाग की लापरवाही या तो नजरअंदार किया गया या फिर भर्राशाही होती रही और महिला बाल विकास में आंखे मूंद ली। महालेखागार ने पांचवे बिंदू पर यह जिक्र किया कि पोषण आहार के उत्पादन में रॉ मटेरियल जितना उपयोग किया गया है। उससे कही दुगना तिगुना ज्यादा पोषण आहार उत्पादित हो गया, इसका मतलब गड़बड़ी तो है इसका जवाब महिला बाल विकास को मांगा गया है। इसी जवाब के उत्तर में अतिविल्ब होने की वजह से मामला पोषण आहार घोटाले में तब्दील हो गया और सरकार की नाक नीची हो गई। लेकिन जिन दो संस्थाओं द्वारा पोषण आहार को उत्पादन एवं वितरण किया जाता है उन संस्थाओं में महिला बाल विकास विभाग को तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए यह जानकारी दी है कि, महालेखागार ने जिन ट्रकों के न्बरों को गलत बताते हुए संदेह व्यक्त किया है वस्तुत: लिपिकीय त्रुटिवश आंशिक रूप से गलत अंकित होने के कारण बखेड़ा खड़ा किया गया है। इस तथ्य को मध्यप्रदेश कृषि उद्योग निगम के प्रबंध संचालक राजीब जैन द्वारा महिला बाल विकास विभाग को प्रस्तुत किया जा चुका है जहां तक 82.169 मैट्रिक टन फर्जी पोषण आहार के विāा स्पलाई का बाड़ी प्लांट में जिक्र किया गया है, वह आडिट टीम द्वारा स्टाक में ओपनिंग बैलेंस नहीं जोडऩे की वजह से आया है। जहां तक पोषण आहार के उत्पादन कि क्षमता का प्रश्र था उसकी तकनीकी विवरण खिचड़ी संयंत्र के उत्पादन क्षमता के साथ विस्तार से विभाग को भेज दिया गया है। सूत्रों के अनुसार वाहन पोर्टल में ट्रकों के न्बर कैसे गलत हुए है इसका भी विवरण विभाग दिया जा चुका है परंतु सच यह है कि सरकार के डेमेज कंट्रोल की ज्मिेदारी निभाने वाले बुद्धिमान जनसंपर्क आयुक्त राघवेन्द्र सिंह समय के भीतर मीडिया में उठे सवाल का हल ढूंढ लेते तो इतना बवाल भी नहीं मचता और मुख्य सचिव तथा मुख्यमंत्री की फजिहत नहीं होती। और तो और जिन 6 पोषण आहार सरकारी संयंत्रों को मध्यप्रदेश आजिविका मिशन द्वारा संचालित किया जाता है, वहां के भी मिशन संचालक बेलवाल ने भी सरकार को तथ्य परख जानकारी सौंप दी है जिसमें उन्होंने कम उत्पादन क्षमता संयंत्र में अधिक पोषण आहार बनने की कहानी का सिलसिलेवार खंडन भी किया है परंतु जनसंपर्क आयुक्त को इस तथाकथित पोषण आहार घोटाले से कोई लेना देना नहीं तो आखिर मुख्यमंत्री हो या मुख्य सचिव मामला विधानसभा में उठे, कमलनाथ की कांग्रेस सड़क पर उतरे तो बदनामी से बचना मुश्किल है। इस विशेष रिपोर्ट का लब्बो लुआब यह है कि तथाकथित पोषण आहार घोटाले के मामले में जनसंपर्क आयुक्त राघवेन्द्र सिंह की जानबुझकर अज्ञानता और लापरवाही से सरकार को बेवजह नीचा देखना पड़ा। सच यह है कि गरीब बच्चों, गरीब गर्भवती महिलाओं तथा समाज के अंतिम छोर पर खड़े रहने वाले किसी भी व्यक्ति को अनाचार, भ्रष्टाचार और लापरवाही का शिकार होना पड़े और सरकार दोषी भी ना हो तो इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ भी नहीं हो सकता है।