संसदीय इतिहास में पहली बार मप्र विधानसभा में विज्ञापन प्रकाशित करके हो रही है भर्तिया

विशेष रिपोर्ट: विजय कुमार दास (मो. 9617565371)
मध्यप्रदेश विधानसभा का इतिहास यदि आप 1956 से लेकर आज तक का देखें तो विधानसभा तृतीय श्रेणी के कमर्चारियों की भर्ती कभी भी अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित करके पारदर्शी प्रक्रिया के आधार पर नहीं होती थी। 70 वर्षों का इतिहास है विधानसभा अध्यक्ष और विधानसभा के सचिव, प्रमुख सचिव दोनों मिलकर तदर्थवाद के आधार पर भर्ती कर देते थे लेकिन मामला चूंकि विधानसभा का होता था इसलिए कोई सवाल ही नहीं उठाता था। और तो और विधानसभा के अध्यक्ष जिस इलाके से आते थे उस इलाके के पढ़े लिखे बेरोजगारों को तदर्थवाद मेरे अच्छी जगह भी मिल जाती थी, मतलब तृतीय श्रेणी का कर्मचारी अस्थाई नयुक्ति लेकर विधानसभा प्रमुख सचिव के पद पदोन्नत होकर झंडा लहरा गया, लेकिन किसी ने चूं-चपट भी नहीं की, क्योंकि जमाना सफेद फेज कहलाने वाले स्व. श्रीनिवास तिवारी के अध्यक्ष काल का स्वर्णीम इतिहास था। हालांकि स्व. श्रीनिवास तिवारी के अध्यक्ष के रूप में उनके बौद्धिक आंतक के सामने तत्कालीन मुख्यमंत्री गुरूदेव-गुरूदेव कहकर घुटने टेक देते थे। और बताते हंै कि मंत्रियों की नोटशीट तिवारी जी के सचिवालय में टाइप हो जाती थी और मंत्रियों को तो उनके कक्ष में आकर नोटशीट में खाली दस्तखत करना होता था। तिवारी जी के जाने के बाद जब स्व. ईश्वर दास रोहाणी का कार्यकाल आया तो उन्होंने भी तदर्थवाद का सहारा लिया और भर्तियां तो की लेकिन तिवारी जी की तुलना में नहीं के बराबर थी। परंतु नीतियों में भ्रष्टाचार को लेकर लांछन से कोई बच नहीं पाया। जहां तक सवाल है वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष गिरिश गौतम और अवधेश प्रताप सिंह का तो बताया जाता है इन दोनों ने मिलकर बेरोजगारों के साथ न्याय करने के लिए और नियुक्ितयों में पारदर्शिता लाने के लिए कुल जमा 50 पदों को लेकर अखबरों में इश्तहार छपवा दिये। सूत्रों के अनुसार अब बकायदा लिखित परीक्षा होगी साक्षात्कार होगा। और जो मैरिट में आयेगा उसका ही चयन किया जायेगा। आश्चर्य एवं चौंकाने वाला वाकया यह है कि सुरक्षागार्ड से लेकर क्प्यूटर ऑपरेटर तक के मात्र 50 पदों के लिए अभी तक 1,50,000 बेरोजगारों के आवेदन प्राप्त हो चुके है। इस विशेष खबर का लब्बोलुआब यह है कि मध्यप्रदेश में बेरोजगारी का दंश कितना खतरनाक है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों के पद के लिए 1,50,000 बेजरोगारों ने आवेदन लगाये और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि मध्यप्रदेश की विधानसभा में आज तक का संसदीय इतिहास इस बात का गवाह है कि भर्तियों में उच्चस्तरीय जातिवाद, भाई-भतीजावाद और पक्षपात के आधार पर भर्तियां होती रही और जनता की आवाज बनने वाले किसी विधायक ने हल्ला नहीं मचाया। इसलिए यदि पहली बार कामरेडनुमा विधानसभा अध्यक्ष गिरिश गौतम और गाय की तरह सीधा- सादा प्रमुख सचिव अवधेश प्रताप सिंह पारदर्शिता के आधार पर कर्मचारियों की भर्तियों को साफ-सुथरा बनाने की कोशिश कर रहे है तो अब पहली बार भर्तियों को लेकर विधायक हल्ला मचाने लगे, तो चौंकिएगा मत…।